अपने ही देश में बेगाने

लोकतंत्र के उत्सव ‘आम चुनाव 2014’ का आगाज हो चुका है। चारों ओर वोट और वोटरों की बात चल रही है। राजनेता वोटरों को अपनी ओर लुभाने के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रहे हैं। आम चुनाव आते ही राजनीतिक दलों द्वारा ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल करने की जुगत में एक बार फिर मुफ्त उपहार व लोक लुभावन वादों का दामन पकड़ना शुरू कर दिया है। इतिहास गवाह है, मतदाताओं को लुभाने की होड लगी है जिसमें तमाम नीति, सिद्धान्त, विचार तथा मान्यताएं पीछे छूट जाती हैं।Image

राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के चयन में योग्यता से ज्यादा धार्मिक व जातिगत समीकरणों को प्राथमिकता दी जा रही है। नेताओं को अब जनता की समस्याएं व मुद्दे नजर आने लग गए हैं (जिनको चुनाव के बाद लगभग भूल ही जाते हैं)। पांच साल में एक दिन वोटर का भी आता है, तो आम आदमी के लिए ये वही दिन हैं। चुनाव आयोग ने भी ‘यूथ चला बूथ’ या ‘आपका वोट आपकी ताकत’ जैसे स्लोगनों से वोटरों को चुनाव में उनके वोट से उनकी ताकत का अहसास करा रहा है। परन्तु इस सब में उनका क्या जो इसी देश के नागरिक होते हुए भी किसी प्रकार की नागरिकता का प्रमाण प्राप्त नहीं कर पाते हैं और इसी से चलते लोकतंत्र के अहम हथियार ‘वोट के अधिकार’ से वंचित रह जाते हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के अनुसार भारत के सभी नागरिकों को समान अवसर व आजीविका कमाने का अधिकार है। अतः काम न होने की स्थिति में लोग अन्य स्थान जिसमें ब्लाक से बाहर से लेकर देश के किसी भी कोने में और कई बार तो देश के बाहर जहां पर व जैसा अवसर मिले काम की तलाश में निकल पड़ते हैं। कई बार तो लोग उन्हीं स्थानों पर स्थाई रूप से बस भी जाते हैं। क्योंकि काम की उपलब्धता सर्वोपरि है।

चुनाव आयोग के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी स्थान पर पिछले छः माह से निवास कर रहा है तो उसे वहां की मतदाता सूची में नाम जुडवाया जा सकता है। परन्तु थावरा राम, गहरा राम, ममराज, तथा मोहनराम जैसे लगभग 175-180 परिवार पिछले 28-30 वर्ष से सिन्दररू, सुमेरपुर में रह रहे हैं और इनमें के किसी का भी मतदाता सूची में नाम नहीं है। यहां तो क्या कहीं की भी मतदाता सूची में नाम नहीं है। दुर्गाराम, भिंया राम धर्माराम, पारथा राम तथा हीरा राम जैसे सैकड़ों ही नाम हैं जो कि पैदा ही इसी गांव में हुए हैं और 25 से 28 वर्ष की आयु के बीच के नवयुवक है बावजूद इसके इन्हें वोट देने का अधिकार नहीं मिला है। इन्हें इस बात का आभास भी नहीं है कि वे कितने बड़े अधिकार से वंचित हैं पूंछने पर बताया कि ‘म्हा वोट रौ काई करां म्हाने तो आपरे कामूं मतलब, महारा पुरखा बाहरनी आया तै अठै महारी कई सुनवाई कोनी।’ (कोई बात नहीं हमें तो अपने काम से मतलब है वोट का क्या करना है। और हमारे पुरखे बाहर से आये थे इसलिए यहां हमारी कोई सुनता नहीं है।)

पाली जिले के व्यापारिक कस्बे सुमेरपुर से सटा ही सिन्दरू गांव है यहां पर कई सारे पत्थर पीसने वाले क्रेशर लगे हुए हैं। इन क्रेशरों पर कार्य करने वाले ये अधिकतर आदिवासी मजदूर उदयपुर जिले की कोटडा व गोगुन्दा तहसील के रहने वाले हैं। अरे हैं क्या थे, क्योंकि अब तो इन्हें अपना गांव छोड़े भी हुए लगभग 30 से 35 साल बीत गए हैं। वर्षों पहले चन्द परिवार ही यहां पर कार्य के लिए आए थे परन्तु अब ये लगभग 175-180 परिवार हो गए हैं जो कि 2 किमी. की परिधि में लगे 8-10 क्रेशरों  पर मजदूरी करते हैं। इन परिवारों के पास आज यहां निवासी के दस्तावेज के नाम पर कुछ भी नहीं है। अगर इन्हें यह चुनौती मिले कि आप भारत के नागरिक नहीं हो तो इनमें से एक भी परिवार इस बात को असत्य सिद्ध कर पाने में सक्षम नहीं है। क्योंकि पहचान के नाम पर एक भी दस्तावेज इनके पास नहीं है। मतदाता पहचान पत्र, राशनकार्ड, जमीन का पट्टा, ड्राईवर लाईसेंस, बैंक खाता पासबुक यहां तक कि आजकल पहचान का प्रतीक आधार कार्ड, कुछ भी नहीं है। क्योंकि इन सभी को पाने के लिए कोई न कोई एक पहचान का सबूत देना पड़ता है और इनके पास कुछ नहीं होने से किसी भी सेवा या इस प्रकार के जुड़ाव की शुरूआत ही नहीं हो पाती है। यहां पर कई लोगों के पास मोबाइल हैं और मैंने जब उनसे सिम कार्ड  के बारे में पूंछा तो बताया कि कुछ ने तो रिशतेदारों के नाम पर लिए हैं और ज्यादातर ने बताया कि दुकानदार ज्यादा पैसा लेकर किसी और के नाम की सिम दिलवा देते हैं। चलो सिम का तो जुगाड़ हो गया परन्तु राशनकार्ड के बिना सस्ता राशन नहीं मिल पाता है, वोट का अधिकार नहीं होने से किसी नेता या सरकार पर अपनी समस्याओं के समाधान के लिए दबाव नहीं बना पाते हैं और किसी भी प्रकार की सरकारी योजना का लाभ नहीं ले पाते हैं।

यह एक अजीबो-गरीब स्थिति है जिसमें आप अपने ही देश में सारे अधिकारों से वंचित हैं साथ ही स्थानीय जन प्रतिनिधियों की नजरों में भी दूर हैं। यहां के सरपंच को तो यह तक पता नहीं है कि इस स्थान पर इतने परिवार रहते हैं। उनके अनुसार ये लोग भी कभी उनके पास नहीं आते हैं तो पता कैसे चले। और इन लोगों के वोट तो हैं नहीं जिससे कोई जनप्रतिनिधि भी अपने आप से इनकी ओर नहीं देखता है। 2011 में ‘प्रवासी श्रमिकों के वोट दे पाने के व्यवहार व उनसे सेवाओं को प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयां’[1] विषय को लेकर आजीविका ब्यूरो द्वारा ही पांच राज्यों (राजस्थान, उत्तरप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र व विहार) में किए गए अध्ययन के अनुसार प्रवासी श्रमिक सबसे अधिक पंचायत के चुनाव में ही वोट करने आते हैं। विधानसभा व लोकसभा के चुनाव को अधिक महत्व नहीं देते हैं। पंचायत चुनावों में भागीदारी का एक बडा कारण उम्म्मीदवारों की व्यक्तिगत पहचान व पंचायत में ही ग्रामीण जनता का सबसे अधिक काम पडता है अतः वो उसी जनप्रतिनिधि को अधिक महत्व देते हैं। परन्तु यहां तो जनप्रतिनिधि के साथ वो रिश्ता ही नहीं है।

 
Santosh Poonia 
Co-coordinator, Centre for Migration and Labour Solutions (CMLS),
Aajeevika Bureau, Udaipur. 

[1] Sharma A. Poonia S. Babar M. Singh V. Singh P. Jha L. K. 2011. Political Inclusion of Migrant Workers: Perceptions, Realities and Challenges, Paper presented at Political Inclusion Workshop and their Access to Basic Services, Lucknow 10th-11th March, 2011

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Happy International Women’s Day!

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Woman is the companion of man, gifted with equal mental capacity…

If by strength is meant moral power, then woman is immeasurably man’s superior.

 

These lines by Mahatma Gandhi several decades ago ring true even today. Today on the occasion of International Women’s Day, we bring you the moving story of one such woman with remarkable strength.

Nojki (name changed), 22, is a young tribal woman from the Salumbar block of south Rajasthan. At the age of 18 years she was married to Laxman lal (name changed). By the time she turned 21 years, she was a mother of two little girls. Laxman lal used to migrate to Mumbai for work and returned to the village a couple of times during the year.

3 months ago, Nojki fell very ill. She suffered from loose motions, blood in her stool and a persistent fever. With her husband away, she was unable to take care of her daughters and herself in such a delicate condition. She then moved to her parent’s home in Manpur with her daughters, where her parents could look after them. While she was there, she heard of the AMRIT clinic in Manpur. When she approached them, she was in such a weak state that she required several bottles of intravenous fluids and antibiotics to nurse her back to health. Given her symptoms, the team at AMRIT clinic insisted that she get herself tested for HIV.

Nojki and both her daughters tested positive for HIV. She was counseled on the implications of being HIV positive; however she found it very difficult to understand the full impact of her situation. To make matters worse, Laxman lal disowned her and their daughters and refused to take them back. The AMRIT staff escorted her to the District Anti-Retroviral Therapy (ART) Center, where she was put on ART drugs. The team assisted Nojki by taking her to a home for HIV affected children. Nojki now works at the home looking after other HIV affected children, while her daughters too are taken care of. Nojki wants to go back to her village to celebrate the Indian festival of Holi. However, she is facing strong resistance to return, even from her own family due to existing stigma associated with HIV.  We truly admire the strength with which Nojki is battling not just HIV, but society’s perceptions about it; and we wish for a bright future for her daughters and her!

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बॉबिन ऑपरेटर “नंदू ”

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Yarn- Bobbin

प्रवास के मायने अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग हैं। पर इतना तो जरूर है कि प्रवास चाहे किसी भी कारण से हो-स्वेच्छा से या परिस्थितियों से बाध्य होकर, अपने पीछे पीड़ा और अवसाद का एक बहुत ही भारी बोझ छोड़ जाता है। और फिर जब हम इसका लेखा जोखा करने बैठते हैं तो कभी तो खुश होते हैं और कभी आंसुओं से नहा जाते हैं।

 

आजीविका की तलाश में होने वाले प्रवास के साथ भी कुछ इसी तरह की बातें होती हैं। कुछ लोग तो प्रवास पर जाने से खुश होते हैं और इसलिए जगह छूटने का दर्द उनके लिए अस्थायी होता है। और फिर प्रवास पर जाने से आने वाली खुशी को याद कर व्यक्ति सब कुछ भूल जाता है। पर सभी लोग ऐसे भाग्यशाली नहीं होते और देश के एक बड़े वर्ग के लिए प्रवास तो पीड़ा और दर्द का सतत स्रोत है। भले ही यह प्रवास रोजीरोटी की तलाश में ही क्यों न हो।

 

बहुत कम लोग होते हैं जो पूरे परिवार के साथ प्रवास पर जाते हैं। अमूमन लोग अकेले ही निकलते हैं और इस तरह का प्रवास काफी तकलीफदेह होता है। पर काम की तलाश में देश या विदेश के किसी भी कोने की रुख करना और खुद को काम में झोंक देना फिर भी शायद इतना परेशान करने वाला नहीं होता है जितना अपने अवयस्क बेटे को रोजगार की भट्ठी में असमय ही झोंक देना।

 

रोजगार की तलाश में लगभग सभी प्रदेशों के लोग कभी तो सिर्फ अपने प्रदेश और कभी कई प्रदेशों की सीमाएं लांघ जाते हैं। ओड़ीशा के मजदूर भी पिछले कई दशकों से यही कर रहे हैं। वे पूर्वी तटक्षेत्र से पश्चिमी तटक्षेत्र तक की यात्रा तय कर गुजरात के सूरत पहुँच रहे हैं आजीविका की तलाश में।

 

16-17 साल का नंदू (नाम बदला हुआ) भी ऐसा ही एक बेटा है जिसका बाप आजीविका की तलाश में गंजाम से कई साल पहले सूरत आ गया। नंदू और उसकी बड़ी बहन यहीं सूरत में पैदा हुए और पले-बढ़े। वे अपने गाँव से जितना परिचित हैं उससे कहीं ज्यादा सूरत को जानते हैं। वे गुजरती बोलते हैं और अगर सड़क पर उन्हें कोई देख ले तो शायद ही यह कह सके कि वे गुजराती नहीं है। पर वे गुजराती नहीं हैं यह एक सत्य है। अपने पिता की तरह ही वे लोग भी प्रवासी हैं और जहां वे रह रहे हैं वह उनका अपना घर नहीं है। अपने माँ-बाप से उन्होने सुन रखा है कि वे यहाँ पैसा कमाने की मकसद से हैं और जिस दिन यह मकसद पूरा हो जाएगा वे अपने घर लौट जाएँगे। पर यह सब सोचते-सोचते 30 वर्ष का लंबा अंतराल गुजर गया। और अब नंदू के बाप ने तो अपने घर लौटने की बात करना भी बंद कर दिया है।

 

नंदू की बहन की शादी हुई। नंदू को भला इस बात से क्या लेना देना कि उसकी बहन की शादी में उसके माँ-बाप को क्या क्या दिक्कतें उठानी पड़ी। पर उसे इस बात का पता तब लगा जब बहन के ससुराल चले जाने के बाद एक दिन उसके बाप ने उसे अपने साथ चलने को कहा। वह नहीं समझ पाया कि आज उसका बाप फैक्ट्री जाते हुए क्यों उसे भी अपने साथ ले जाना चाहता है। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था। वह अपने पिता के साथ कपड़ा फैक्ट्री में आया। उसे यह देखकर अच्छा लगा कि वहाँ पर उसकी भाषा बोलने वाले कई लोग थे। पर वह उनमें से किसी को जानता नहीं था। एक व्यक्ति जो उससे कुछ ज्यादा उम्र का था, उसे लकड़ी के कई सारे बॉबिन दिखाये और उसे बताया कि कैसे इनको उसकी ही ऊंचाई के बराबर लोहे की मशीन में उसे फिट किया जाता है और फिर उनमें धागों को कैसे फंसाया जाता है। बस इतना करने के बाद उस मशीन को चला देना है। इसके बाद फिर जब धागों का बंडल खतम हो जाएगा तो उसे दूसरा बंडल उस पर लगाना होगा। बस इतना भर काम उसे करना था।

 

नंदू को यह सब बहुत ही आसानी से समझ में आ गया और वह मन ही मन खुश भी था। खुश इसलिए था कि उसके लिए सब कुछ नया था।

 

नंदू को बॉबिन का यह काम करते हुए दो साल हो गए हैं। वह अब गुटका खाने लगा है। अपनी बालसुलभ चंचलता वह खो चुका है। वह उम्र से पहले जवान हो गया है। सूरत के जगन्नाथ नगर इलाके में हमसे बातचीत के दौरान वह हमेशा ही अपनी नज़रों से जमीन खोदता हुआ दिखा। उसका चेहरा ज़र्द हो रहा था। तेल से चुपड़े अपने बालों को जिस तरह से उसने कंघी किया था उससे लग रहा था कि अपने बचपन से अब भी उसके रिश्ता पूरी तरह खत्म नही हुआ है। कई बार बातचीत के दौरान वह ऐसी बातें करता जैसे पूरे घर की ज़िम्मेदारी उसने अपने सिर पर उठा रखा हो। पर नंदू अपने पिता की तरह अपने गाँव जाने की बात नहीं करता। कैसा गाँव…कौन सा गाँव? वह किसी गाँव को नहीं जानता-किसी गाँव से उसका कोई रिश्ता नही है। उसे सबसे पहले कर्जे चुकाने हैं।

 

वह अपने बारे में क्या सोचता है? अपने बारे में? वह यह प्रश्न वापस मेरी ओर उछाल देता है।

 

अपने बारे में सोचने के लायक शायद वह अभी नहीं हुआ है।   

 

अशोक झा

आजीविका ब्यूरो

उदयपुर 

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Thinking 2013…

Dear Friends

I really should finish writing this piece before thinking about the last year, and greeting the new, becomes totally redundant. Somehow the transition to the new year becomes truly real by now – the (few) greeting cards start to arrive in post, complementary calendars begin to unfurl, diaries and planners start appearing on the table and most of all Jitendra comes with a fresh list of holidays to be approved for the year!! As in the past few years I hosted our annual new year Vimarsh meeting at home where a lot of us sat around with hot chai and snacks and talked about the year gone by and the year ahead for Aajeevika. This has become one of the really important conversations we have as a team – liberated as it is from a fixed structure or agenda but still full of purpose.

As always it is difficult to sum up the year gone by but I guess “satisfying” comes closest the overall sense it leaves behind. Three new initiatives stand out and have brought great excitement and energy all around.

Firstly, our work with women of migrant households where they are organised as Ujala Samoohs became truly significant. Every rural block where Aajeevika works, witnessed the IMG_5187emergence of Ujala Samoohs that become rapidly visible on the landscape of typically male governed Panchayats and local administration. An inspiring cadre of women leaders – Ujala Kirans – have become prominent and assertive in demanding MGNREGS work, ensuring ration shops are being run properly, Anganwadi-s are opening and Panchayat meetings are not being held without active presence and participation of women. The mobilisation of women is particularly strong in Aspur, Gogunda and Kelwara and it has started to grow rapidly in Salumbar and Kherwada where this work only just began. Most women who are enrolled as members of Ujala Samooh are also wage workers even though they do not themselves migrate long distance. MGNREGS is a very important potential contributor to their household economy, which is heavily dependent on remittances from the male migrant worker in Gujarat or further afield. I believe the Ujala Samooh mobilisation will become a solid framework for our “source end” work – and not just merely as an instrument of delivering “project services” for the well-known and often misused ease of bringing women together!

Secondly, in the year gone by we were able to launch our much awaited health services initiative – now known as AMRIT. AMRIT bridges a huge gap between shocking DSC_0230health and nutrition status in high migration areas and the almost negligible availability of public health services. The model is new for our region – it provides high quality yet low cost clinical services in remote tribal villages in addition to addressing the very causes of recurrent sickness and hunger, especially among children. AMRIT has been made real with the arrival of our friend and colleague (who is also a Trustee of Aajeevika’s) Dr Pavitra Mohan who brings with him solid public health experience as well as a single minded devotion to getting the health piece right. Within a short period of one year AMRIT is on a high road – starting from tribal Salumbar it has already made an entry in Idar (north Gujarat) where vast numbers of poor agriculture workers live dispersed and unattended. AMRIT can well become a game-changer in years to come, not just on Aajeevika’s playing field of serving migrant households but also in making an impact on the health status of impoverished communities.

Thirdly, and on a slightly different note, we undertook our most ambitious offering to other civil society organisations. The CMLS team successfully designed and ran a full 9 day Certificate Course in Migration Services and Labour Protection in partnership with the Tata Institute of Social Sciences (TISS) in Mumbai. The certificate programme went far beyond being a training course – it dwelled on theoretical perspectives, political economy and approaches in response to the phenomenon of seasonal migration for work. The programme selected a group of 15 participants from NGOs across the country and brought to them a range of reputed faculty from academia, practice and policy. The TISS partnership – and the Tata Trust’s generous support – made the programme a terrific success and has given us the confidence of doing this regularly, every year, refining of course its content and delivery as we go along.

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Several other promising developments made their mark on the year – STEP Academy came out of a period of sluggish numbers and went viral in Saabla – a far off location on the border of Dungarpur and Banswara where a large number of youth (especially girls) have already started to walk in to be trained; LEAD cell’s cadre of para-legal workers are becoming a powerful presence in the community otherwise bereft of legal advise and aid; RSSA’s financial services work got off to a much awaited and healthy start in Salumbar having reached an assured stability in Gogunda, the Ahmedabad team finally completed the registration of the strong Hamaal Union, Kherwada created a huge collective of construction workers within a few months and so on so forth. The Finance and Admin team made its processes even more efficient despite the extraordinary load and came through impeccably in external audits and reveiws.

Our losses were humbling too – we could not save our relationship with the Jaipur Construction Workers’ Union and couple of key field centres became bereft of their Coordinators bringing great uncertainty to the team and core operations.

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As always the year was made special by our team – whose single-mindedness at work, modesty and ability to adapt is as inspiring as their lusty singing and dancing! Several found new things to do in other locations – and some departures were as unexpected as they were frustrating – yet Rahul’s, Kapil’s and Mahesh bhai’s presence in the staff camp told me that we have a community everywhere. Our Trustees came together Staff camp picsfor what must be our most significant meeting in recent years – we presented to them the plans and perspectives for the next 5 years and got stern warnings, rich feedback and insightful suggestions. Thanks to you all – but I have to mention Jagdeep and Vanita particularly whose regular return to Udaipur this year brought a sense of strong assurance and advise to me.

So much to do this year too – we’re falling behind on our policy work, Jaipur needs urgent attention, several new and eager colleagues are here and will require careful induction and mentorship, older colleagues need to re-energise themselves and we need to reach out to several other organisations and alliances to create a louder and more powerful voice for migrant workers.

We’ve been bestowed with a uniquely supportive group of donors – Sir Dorabji Tata Trust, Sir Ratan Tata Trust, Human Dignity Foundation, Paul Hamlyn Foundation, EdelGive Foundation and most recently the IKEA Foundation have helped us remain faithful to our script. Many thanks to them – Sanjiv and Poornima, Amrita Patwardhan and Uma Krishnan, Kasia and Mary Healy, Vidya Shah and Nayana Chowdhury and their teams.

And there are several friends – old and new – who’ve continued to raise the bar for us – Dr Ramani Atkuri, Dr Neelam, Dr Tarun, Jyotsana, Sanjana and the entire group of AMRIT advisors, Manisha and her team at Start Up; Ravi, Ashraf and the CYC team, Rakesh whose report put our Idar work in perspective, Prof Debi Prasad Misra, Prof Janat Shah and Priyanka Singh who took our ASCEND programme to an amazing plane of enquiry and insight; Prof Ramesh Bhat and Prof Kajri Misra who generously volunteered their time to teach and train our teams; Sushil ji Dwivedi, Umi Daniel and Dr Biswaroop Das whose presence in our CMLS meetings is sheer wisdom; Dr Ravi Srivastava, Rukmini Datta and Uday Kagal whose sessions at the certificate programme were incredibly done; Prof Amita Bhide and Prof Manish Jha at TISS without who the certificate course would have been impossible to execute, Preeti Sahai and Jaipal Singh who’ve been there solidly for RSSA and many, many others whose name I may miss just as I write this but to who I remain deeply indebted for their support to Aajeevika, its team and its mission.

Greetings to all for 2014!

Rajiv

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मेहनत की कमाई, क्षण में डुबाई

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Khatu Ram (Victim)

खातुराम अहमदाबाद शहर में पिछले पांच वर्षों से मार्बल व टाईल फिटिंग का कार्य करता है। सभी श्रमिकों की भाति दीपावली त्यौहार मनाने के लिए गांव जाने के लिए वह भी उत्सुक था। उसने शहर के सरखेज क्षेत्र की साईट पर अपना काम खत्म करके वही से गांव जाने की तैयारियां की। शाम के सात बजे खातु राम अपने साथ दीपावली का सामान और दस हजार रूपये व मोबाईल लेकर निकला। अपनी साईट से वह सरखेज हाईवे वाले रोड पर पहुंचा और एक शटल रिक़्शा में गीता मंदिर बस स्टैण्ड जाने के लिए बैठा। उस रिक़्शा में ड्राईवर के अलावा तीन और व्यक्ति बैठे हुए थे। कुछ दूर जाने के बाद अचानक रिक़्शा में पीछे की तरफ बैठे हुए अन्य तीन लोगों ने उस का मुंह दबा दिया और साबरमती नदी के तट पर स्थित एक कुआं पर उसे ले गऐ। खातुराम से पैसे मांगे तो उसने अपनी गाढ़ी कमाई का पैसे देने से मना किया व स्वबचाव किया, पैसे देने से मना करने पर उन्होंने खातुराम की जोरदार पिटाई की। खातुराम के प्रतिक्रिया करने पर उसे चाकू दिखाकर डराया। उसके बाद उससे मारपीट की और जबरन मोबाईल, दस हजार रूपया व पर्स आदि छीन लिया और फिर उसे वहीं झाडियों में छोडकर भाग गये। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें। फिर कुछ देर बाद वहा से वह जैसे-तैसे पैदल चलते-चलते वापस अपनी साईट पर रात बारह बजे के आसपास पहॅुचा। जब खातुराम घर तो उसकी तबीयत बहुत खराब हो चुकी थी और मारपीट के कारण उसे बहुत सारी चोटें भी आई थी। इलाज व दवाई करवाने में भी लगभग 6000 रुपये और खर्च हो गये। खातुराम इस घटना से बहुत दुखी था और इस बात पर पछता भी रहा था कि उसके पास बैंक खाता होने के बावजूद भी वह पूरा पैसा साथ में लेकर गया और उसका नुकसान हो गया।

खातु राम की तरह बहुत सारे श्रमिक इसी तरह की घटनाओं के शिकार होते हैं। जरूरत है उन्हें वित्तीय व्यवहारों के बारे में समझाने और जागरूकता लाने की, ताकि ये श्रमिक कभी भी इस प्रकार की घटनाओं का शिकार न बने।

- Mayur Pandya, Aajeevika Bureau, Ahmedabad

(Mayur has been with Aajeevika for four years, and he is part of the destination operations of the organization at Ahmedabad. This case study has been documented by his as part of the field experience and financial literacy service offered by the organization.)

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खेल-खेल में

पारंपरिक रुप से कठपुतली का खेल बच्चों के मनोरंजन के लिये जाना जाता है पर इस खेल के माध्यम से कुछ गंभीर मुद्दों पर जानकारी प्रदान करने का विचार भले ही सुनने में कुछ अटपटा सा लगे पर हाल ही मेरा अनुभव यह बताता है कि यह काफी असरदार साबित हो सकता है।

कुछ ही दिन पहले हमारी टीम (केलवाड़ा) ने कणुजा गाँव की हलाई की भागल का भीलवाड़ा में एक कानूनी शिक्षण बैठक का आयोजन किया। यह भीलवाड़ा काफी अन्दर स्थित था। और यहाँ तक पहुँचने का रास्ता बड़ा कठिन था। फिर पिछले कुछ दिनों में हुई भारी बारिश के कारण रास्ता और भी खराब हो गया था। उस भीलवाड़ा में 20-25 घर थे। खराब मौसम, कम आबादी, कठिन रास्ता – यह सब हमारे लिये एक चुनौती थी।

फिर भी हमने कठपुतली के खेल के माध्यम से भीलवाड़ा के लोगों को कानूनी जानकारी प्रदान करने का फैसला किया। जब हम भीलवाड़ा में पहुँचे तो हमने माइक और स्पीकर के माध्यम से लोगों को इस मीटींग के लिए बुलाया। कठपुतली के खेल के बारें में सुनकर वहाँ के बच्चे इकट्ठे हो गए। फिर हमने बच्चों को उनके माता-पिता को बुलाने के लिए कहा। पहले तो वहाँ पर महिलाएँ इकट्ठी हुई। कठपुतली के खेल के शुरु होने के कुछ ही मिनट बाद हमने देखा कि वहाँ के पुरुष भी मीटींग की जगह पर आ गए। उस छोटे से भीलवाड़ा में कम से कम 50 लोग हमारी मीटींग में आये। 

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कठपुतली के खेल के शुरुआत में हमने गाँव के कुछ लोगों को एक-एक करके बुलाया और उनसे कठपुतली के माध्यम से बातचीत की और हल्का-फुल्का मजाक किया। इसका गाँव वालों ने बहुत लुफ्त उठाया। फिर बाद में हमने एक कहानी के माध्यम से कठपुतली के खेल के जरिये लोगों को बताया कि कैसे मजदूर ठेकेदार द्वारा शोषित किये जाते है और मजदूरों के पास इससे बचाव एवं समाधान के लिए क्या विकल्प मौजूद है। हमने श्रमिक सहायता एवं सन्दर्भ केन्द्र के बारे में जानकारी दी। साथ ही लोगों को लेबर लाइन से भी अवगत कराया और हाजरी डायरी के जरिये लोगों को हाजरी भरने के महत्त्व के बारे में समझाया।

कठपुतली का नाटक खत्म होने के बाद लोगों से हमने पूछा कि उन्हें कितना समझ आया। सभी लोगों ने हाँ में उत्तर दिया और कुछ लोगों ने तो विस्तार से यह भी समझाया कि उनके साथ भी ऐसा होता है या हो सकता है, उन्हें क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए और उनके पास क्या विकल्प मौजूद है।

नाटक खत्म होने के बाद हमने लोगों को कानूनी दिवस के पर्चे और लेबर एक्सप्रेस (संस्था द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक न्यूज लेटर) वितरित किए। करीब 10 लोगों ने हमसे हाजरी डायरी खरीदी। और एक कानूनी विवाद भी निकलकर आया।

मैने यह पाया कि कठपुतली का खेल सूचना प्रदान करने का अनूठा एवं बेहद असरदार तरीका है। यह हर उम्र के गाँववासियो को आकर्षित करता है। गाँव वाले अभी भी इस खेल से जूड़ा हुआ महसूस करते है और अपनी जिन्दगी को खेल के किरदारों से मिला पाते है। इसी कारण से कठपुतली के खेल के माध्यम से हम जो भी संदेश या जानकारी प्रदान करना चाहते है, गाँव वाले उसे आसानी से समझ लेते है। मैने यह भी महसूस किया कि कठपुतली का खेल दिखाने वाले और देखने वाले, दोनो का ही उत्साह का स्तर काफी ऊँचा रहता है।

इसलिए कठपुतली का खेल मनोरंजक रुप से शिक्षण प्रदान करने के लिये ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लाना चाहिये।

- Manu Sakunia, Aajeevika Bureau

 

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शाईनिंग इंडिया – कचरा ही है आजीविका का सहारा

तड़के 5-6 बजे अपनी पीठ पर बोरा लादे निकल पड़ती हैं आजीविका के लिए। जहां गंदगी या कचरा देखा बस घुस गईं कचरे के ढेर में बिना सोचे कि इससे उनके स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कचरे के ढेर में जो हाथ लगा डाल लिया बोरे में। इकट्ठे किए गए कचरे को बेचकर जो कमाई होती है उससे अपने परिवार चला रही हैं.…… कचरा बीनने वाली ये महिलाएं। यदि ये काम करने वाली महिलाएं ना हों तो हम कल्पना भी नहीं सकते कि शहरों में गंदगी का कितना ढेर लग सकता है। शहर की सफाई का आधा काम तो ये महिलाएं दिनभर में कचरा बीनकर ही निपटा देती हैं। Shweta2

जयपुर के चारों कोनों में ऐसी कई बस्तियां हैं जिनमें हजारों की तादाद में कचरा बीनने का काम करने वाले परिवार रहते हैं। इन परिवारों की लगभग सभी महिलाएं कचरा बीनने का काम करती हैं। ये महिलाएं सुबह जल्दी उठकर बिना कुछ खाए पिए ही अपने काम पर निकल जाती हैं। दोपहर 1-2 बजे तक कचरा बीनती हैं। उसके बाद घर आकर अपने घर के काम निपटाती हैं। उसके बाद दिनभर की मेहनत से इकट्ठे किए हुए कचरे को बोरे से निकालकर बिखेर लेती हैं। अब शुरू होता है इनका छंटनी का काम। प्लास्टिक की थैलियां, कागज एवं गत्ते, कांच की बोतलें, लोहा आदि की छंटनी कर सबको अलग-अलग बोरों में भर दिया जाता है। इसके बाद यह कचरा कबाड़ी वाले के यहां बिकने जाता हैं। 10 रुपए किलो के भाव से प्लास्टिक व 5 रुपए किलो के भाव से कागज एवं गत्ते बिकते हैं। पिछले कई सालों में महंगाई ने आसमान छू लिया लेकिन इन महिलाओं के लिए कचरे भाव ज्यों के त्यों हैं। इनमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। पूरे दिन भर की मेहनत के बाद इन्हें मिल पाते हैं मात्र 100 से 150 रुपए।

इनके पति भी इसी तरह का काम करते हैं। और अधिकतर महिलाओं के पति अपनी कमाई की शराब पी जाते हैं। शराब पीकर उनसे मारपीट और गाली-गलौच करते हैं। लगभग सभी महिलाएं निरक्षर हैं। और उनमें कोई हाथ का हुनर नहीं होने की वजह से उन्हें मजबूरन ऐसा काम करना पड़ रहा है।

हाल ही में विविधा संस्था, जयपुर तथा आजीविका ब्यूरो द्वारा शहर रोटी तो देता है’ नामक अध्ययन में Shweta3निकल कर आया कि इनमें से 90% महिलाओं के बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल नहीं जाते हैं और ना ही परिवार वाले इनके पोषण का ध्यान रख पाते हैं। और तो और आंगनबाड़ी केंद्र पर भी नहीं भेज पाते हैं। इन महिलाओं की माली हालत इतनी खराब है कि वो अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की तो सोच भी नहीं सकती हैं। कुछ महिलाओं ने बताया कि सरकारी स्कूल वाले उनके बच्चों को भर्ती ही नहीं करते हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस कभी भी आकर उनकी बस्तियों को उजाड़ देती है। यह भी एक मुख्य कारण है कि उनके बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं क्योंकि उनके रहने का कोई पक्का ठिकाना नहीं है। इस कारण बच्चे भी उनके साथ कचरा बीनने वाले काम में लग जाते हैं। छोटे बच्चों को महिलाएं काम पर जाते वक्त अपने साथ ही ले जाती हैं। कचरा बीनते वक्त बच्चों को कचरे में ही सुला देती हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे बीमार हो जाते हैं। कई बार उन्हें चोट भी लग जाती है। इस काम में महिलाओं को कई बार चोट भी लग जाती है। कांच और लोहे की नुकीली चीजें चुभ जाती हैं। वायरल व मलेरिया जैसी खतरनाक बिमारियां भी हो जाती हैं। सांस लेने में तकलीफ की शिकायत रहती है। इलाज के लिए अधिकतर महिलाएं प्राइवेट अस्पतालों में जाती हैं। पूंछने पर पता चला कि सरकारी अस्पताल में उनका ठीक से इलाज नहीं किया जाता है। उन्हें अच्छी दवाइ्र्रयां नहीं दी जाती हैं। समाज में हर जगह उन्हें अपने इस काम की वजह से जिल्लत का सामना करना पड़ता है।

इनके परिवार कई सालों से जयपुर में रह रहे हैं उसके बावजूद इनके पास मतदाता पहचान पत्र, बीपीएल Shweta4कार्ड, राशन कार्ड आदि नहीं हैं। वृद्धा, विधवा एवं विकलांग महिलाओं को पेंशन नहीं मिल रही है। बस्तियों में बिजली, पानी व ट्वायलेट जैसी कोई मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं है। पानी की कमी की वजह से कई-कई दिन तक ये लोग नहा नहीं पाते हैं। पीने का पानी तक नहीं मिल पाता है। सरकारी योजनाओं की तो इन तक अभी पहुंच ही नहीं है।

ये शाईनिंग इंडिया का दूसरा चेहरा है जहां महंगाई के इस दौर में तंगी में जिंदगी गुजार रहे इन परिवार के लोगों के लिए स्वयं का मकान बना लेना तो एक सपने जैसा है। किसी एक में भी यह कहने का साहस तक नहीं है कि वो अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा लेंगे। बहरहाल जिल्लत की जिंदगी जी रहे ये परिवार पेट पालने के लिए अथक कचरा बीनने का काम कर रहे हैं।

- Shweta Tripathi, Aajeevika Bureau, Jaipur

(Shweta is one of the recent additions to the Aajeevika battalion. She has a background of working on women’s rights and within the AB team she has chosen to work with women workers in the unorganized sector. This piece comes from a study that she was a part of. Notably, she is also leading an intervention which came up as a result of this study.)

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किसका क्या भरोसा: मालिक मजूदर के बीच कम होता विश्वास

“मालिक लोगों का क्या वे तो कभी भी काम से निकाल दें, ऐसे में दूसरा काम कैसे मिलेगा।”चम्पा बाई ने एक मीटिंग में ये कहा तो मैं कोई चैंका नहीं बल्कि अपनी समझ को और स्पष्ट करने का प्रयास किया।

kiska kya bharosaश्रमिकों द्वारा मालिकों के बारे में ऐसी बातें आमतौर पर सुनने को मिलती हैं, जो कि वास्तव में सही भी हैं। भोपाल में प्रवासी कार्यक्रम में तकनीकि सहयोग विजिट के दौरान घरेलू बाई के रूप में कार्य करने वाली चम्पा ने ये चर्चा के दौरान अपनी बात रखी। इस बैठक में घरों में कार्य करने वाली बाईयों से उनके काम के बारे में चर्चा करते हुए यत बात चल रही थी कि कितने घरों में काम करते हैं तथा कितना पैसा मिलता है। पता चला कि एक बाई 6-8 घरों में कार्य करती है और एक घर से 600-700 रूपये प्रतिमाह मिलता है। इस प्रकार से एक बाई 3500-4500 प्रतिमाह कमा पाती है। इसी पर जब मैंने उनसे कहा कि आप घर में होने वाले सारे काम को अच्छे से सीख लें और एक ही घर में काम करें तो वहां पर भी 5000 से 6000 रूपये तक मिल जाऐंगे और इतने घरों की भागदौड़ भी मिट जाएगी। तब अपने लम्बे कार्यानुभव से चम्पा बाई ने ऐसी बात कह दी कि मैं निरूत्तर हो गया। उनके अनुसार“यह तरीका अच्छा है और कई बार हम भी सोचते हैं परन्तु घर मालिक को अगर काम पसन्द नहीं आया या कुछ ऊंच-नींच हो गई तो वह फटाक से काम से निकाल देते हैं। हमारे घर का चूल्हा जो इसी कमाई से जलता है फिर ऐसे में हम क्या करेंगे।” आगे उन्होंने बताया कि “ज्यादा घरों में काम करने से भाग-दौड़ तो जरूर रहती है परन्तु एक घर से काम छूटने पर बेरोजगार तो नहीं होते और कई घरों में जाते रहने से उन्हीं सम्पर्कों से नए काम के बारे में पता चल जाता है। एक घर में काम करो और वह छूट जाए तो दूसरा काम मिलना मुश्किल हो जाता है।”

कई बार हम यह सोचते हैं कि श्रमिकों के तौर तरीके सही नहीं हैं, अपने गलत तरीकों के कारण ही इनको परेशानी होती है। और हम जो अच्छा सुझाव दे रहे हैं (अपने स्वयं के अनुसार) वे उसके क्यों नहीं मान रहे हैं। परन्तु नहीं श्रमिक भी अपने तरीके अपने अनुभवों व मालिकों/नियोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले व्यवहार के अनुसार बनाते हैं। अपने आस-पास जो होता हुआ देखते हैं उसी के अनुसार वे प्रतिक्रिया देते हैं। घरेलू बाईयों द्वारा एक घर में स्थाई काम करने के बजाए अधिक घरों में अस्थाई काम करना, युवाओं द्वारा टिकाउ कार्य के अवसरों को छोड़कर अस्थाई व अनौपचारिक कार्यव्यवस्था में कार्य करना, ईड़र में काम के लिए जाने वाले खेत श्रमिकों द्वारा फसल में अधिक भाग के स्थान पर एड़वांस को अधिक महत्व देना और भी कई ऐसे उदाहरण हैं जो कि मालिक/नियोक्ताओं के प्रति अविश्वास को दर्शाते हैं। श्रमिकों द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के व्यवहार के सभी आयामों को गहराई से समझने की आवश्यकता है।

मालिक/नियोक्ता कुशल, निष्ठावान, समर्पित तथा ईमानदार कार्मिक की अपेक्षा तो हमेशा रखते हैं परन्तु स्वयं उनके प्रति जबावदेह नहीं होते हैं। यह स्थिति कोई क्षेत्र विशेष या कार्य विशेष की नहीं है बल्कि असंगठित श्रम बाजार में व्यापक रूप से यह देखने को मिलती है। कार्मिकों की दक्षता को बढ़ाने व सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए तो नियोक्ता कोई जिम्मेदारी नहीं लेते हैं परन्तु कुशल व टिकाउ कार्मिक की अपेक्षा जरूर करते हैं। इसका प्रमुख कारण है हमारे श्रम बाजार का असंगठित व अनौपचारिक स्वरूप, जो श्रमिकों के जुड़ाव में स्थिरता लाने में असमर्थ है। नियोक्ता भी श्रमिक को उस समय में अधिक से अधिक काम लेने की सोच रखते हैं। इसी के चलते श्रमिक भी अपनी जिम्मेदारी से विमुख होते जा रहे हैं वे भी अपने कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभाते हैं और कई बार तो मालिक/नियोक्ता का नुक्सान करने से भी नहीं चूकते हैं। हां ये जरूर है कि भूतकाल में इस प्रथा का आरम्भ मालिक/नियोक्ताओं की ओर से हुआ और अब दोनों के लिए यह मौका परस्ती बन गया है। जब जिसका मौका लगता है वही अपना दांव चढ़ा देता है। एक-दूसरे के प्रति अविश्वास के माहौल से दिन-प्रतिदिन श्रमिकों व मालिक/नियोक्ताओं के आपसी सम्बंध तथा कार्य के रिश्तों का अवमूल्यन हो रहा है।

श्रमिकों के साथ कार्य करते हुए हमारे जैसे कार्यकर्ताओं का झुकाव तो स्वभाविक रूप से हमेशा ही श्रमिकों के प्रति रहता है परन्तु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एक-दूसरे के बिना इनका काम चलना नामुमनि है। अतः इस व्यवस्था में सुधार करना तथा श्रम बाजार में संतुलन बनाना ही हमारा प्रमुख ध्येय होना चाहिए न कि किसी एक पक्ष में मीन-मेख निकालकर उनकी आलोचना करना। इसके लिए श्रमिकों को उनकी जिम्मेदारी व कर्तव्य का अहसास कराने का कार्य तो हम कभी कभार करते हैं जिसको प्रमुखता पर लेने की आवश्यकता है। साथ ही मालिक/नियोक्ताओं को श्रमिकों के प्रति संवेदनशील करना व जबावदेह बनाना अपने प्रयासों में शामिल करना हमारी प्राथमिकताओं की सूची में होना चाहिए।

- Santosh Poonia, Aajeevika Bureau

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वक्त की मार से हारे मजदूर को श्रमिक केन्द्र का सहारा

विक्रमसिंह रामसिंह जाटव यमुना ब्रिज, आगरा का रहने वाला है। विक्रमसिंह की आयु 42 वर्ष है। कई सालोंon site 1 तक विक्रमसिंह ने आगरा के कारखानों में मिस्त्री का काम किया। मोहनलाल जो कि अहमदाबाद में ठेकेदारी करता है ने विक्रमसिंह को अहमदाबाद मे अच्छे पैसे देने का लालच दिया। यहां विक्रम सिंह अप्रेल महीने से रेडियन्स वेल्व प्रा. लि. नारोल अहमदाबाद में कारीगर का काम करने लगा। विक्रमसिंह के कुछ दिन अहमदाबाद मे अच्छे बीते, मालिक ने रहने के लिये कमरा दे रखा था और गांव के कुछ परिचित मजदूर भी इसी फैक्ट्री में ही काम करते थे।

हर रोज की तरह 24 अप्रेल के दिन भी विक्रमसिंह अपना काम कर रहा था। कार्य करते हुए उसका हाथ मशीन पर रखा था, ऊपर से क्रेन हाथ पर आकर गिरी। क्रेन गिरने से विक्रमसिंह के बाये हाथ के अंगूठे पर गंभीर चोट लगी, नजदीकी अस्पताल में इलाज करवाया गया। चोट गहरी होने के कारण अंगूठे पर टांके लगाए गए। प्रथम इलाज का खर्च तो नियोक्ता द्वारा उठाया गया परन्तु बाद में मालिक के द्वारा दवाई का कोई खर्च नहीं दिया गया। चोट लगने के बाद विक्रमसिंह को एक दिन का आराम भी नसीब नहीं हुआ।

चोट लगने के बावजूद भी वह काम करता रहा। एक दिन हाथ में दर्द अधिक होने से उसने अपने सुपरवाईजर से कहकर एक दिन की छुट्टी ली। थोडा आराम करके शाम को बाहर घूमने चला गया। जब वह रात को वापस आया तो देखा कि उसके कमरे के दरवाजे पर दूसरा ताला लगा हुआ था। विक्रमसिंह ने सुपरवाईजर से बात की तो सुपरवाईजर ने कहा की तुझे नौकरी से निकाल दिया गया है और अब तेरे लिए यहां पर कोई जगह नहीं है। विक्रमसिंह ने बड़ी मिन्नतें की कि एक रात रूकने के लिये जगह दे दो, परन्तु सुपरवाईजर ने एक न सुनी और उसका सामान उसको पकडा दिया गया। विक्रमसिंह ने वह रात सड़क पर ही गुजारी। अपने सामान को तकिया बनाकर वह रोड़ पर सो गया। जब सुबह नींद खुली तो पता चला कि सामान चोरी हो चुका है।

Labour Line Sticker

हताश, निराश विक्रम सिंह को तभी एक दुकान पर लगे स्टिकर से श्रमिक सहायता संदर्भ केन्द्र का फोन नंबर मिला। फोन कर उसने अपनी आप-बीती सुनाई और मदद के लिये कहा। केन्द्र पर उसका विवाद दर्ज किया गया। विेक्रमसिंह के विवाद के समाधान के लिये मालिक के पास जब गये तो मालिक ने बताया 10 दिन का पैसा तो मोहनलाल ठेकेदार ले गया है। मोहल लाल ठेकेदार से बात करने पर पता चला कि वह अभी मध्यप्रदेश में है और उसने कहा कि मैं तो विक्रम सिंह से और पैसे मांगता हूं अतः उसे कोई पैसा मत दिलवाओ। श्रमिक के अनुसार उसने कुछ पैसा खर्चे के लिए ठेकेदार से लिया है इसके अलावा उसको काई भुगतान नहीं किया गया है। बचे हुए दिनों की मजदूरी के लिए मालिक से बातचीत कर दूसरे दिन विक्रमसिंह को 3615 रू. का भुगतान करवाया गया। विक्रम सिंह ने केन्द्र का बहुत आभार व्यक्त किया कि अगर इस समय में श्रमिक केन्द्र मेरी मदद न करता तो मेरे लिए मजदूरी का पैसा लेना तो दूर गांव वापस जाने के लिए किराया तक नहीं भी नहीं मिल पाता।

- Rina Parmar, Aajeevika Bureau

(Rina has been with Aajeevika for two years, and she heads the destination operations of the organization at Ahmedabad. A fire-brand labor-enthusiast, that’s how we know her…dedicated to the cause of laborers and migration, she inspires many like me with her dynamism and verve…This case study has been documented by her as part of the legal aid  services offered by the organization.)

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A letter to Aajeevika team…

श्रमिक साथियों,

आप व आपकी टीम को मजदूर दिवस की हार्दिक शुभकामनाए !

आप सोच रहे होगें कि आज मैं आपको ऐसा (श्रमिक) क्यो बोल रहा हूं ? चलो आप सब शायद इससे थोडा IMG_4675कम सहमत हो लेकिन आज के दिन मै अपने आप को एक श्रमिक मानते हुए आप सबसे कुछ कहना चाहूंगा।

तो साथियों मै तो एक श्रमिक हूं और किसी ना किसी रूप में श्रम करता हूं। स्वयं श्रमिक होने के साथ साथ मैं उस जरूरतमंद वर्ग को सलाह, सुरक्षा व समाधान प्रदान करने का प्रयास करता हूं जिसे वर्तमान में समाज द्वारा अधिकतर मौकों पर गरीब व श्रमिक मानकर समाज की मुख्यधारा से अलग थलग रखा जाता हैं। मै श्रमिक वर्ग के साथ काम करता हू और साथ ही कहीं ना कहीं अपने आप को श्रमिक हितैषी संस्था का कार्यकर्ता भी मानता हूं तो अपने आप को श्रमिक क्यो नहीं मानू घ्

जबकि कौटिलय व अन्य विद्वानो का मानना है कि भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके व्यक्तित्व, गुण व कर्मो के आधार पर तय होती हैं उसके व्यवसाय व आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं। और इस बात से शायद हम सब पूर्ण रूप से सहमत हैं। अगर इतिहास पर नजर डाले तो हमें संत रैदास, कबीर दास से लेकर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल तक हजारो उदाहरण मिल जाऐगे जिन्हे श्रमिक होने के बाद भी समाज में उनके कर्मो के आधार पर स्थान दिया गया। और मेरे अनुसार यही कारण है कि हमारे भारतीय समुदाय में अभी तक वर्ग संघर्ष उस रूप में उभरकर सामने नही आ पाया है जैसा कि इतिहास में पष्चिमी देषो में लगातार होता आया हैं। क्योकि समाज में हम जब भी किसी व्यक्ति विषेष या समुदाय को किसी संज्ञा विषेष से पुकारते है तो वह उसे बाकी लोगो से अलग तो करता है ही सीथ ही समुदाय में विघटन और वर्ग संघर्ष के बीज भी बोता हैं। लेकिन दोस्तो आज जब मै सोचता हंू तो मुझे लगता है कि अब हमारे यंहा भी वर्ग विघटन को लेकर स्थितिया बदल रही है और समाज में धीरे धीरे वर्गभेद का पेड बढता जा रहा हैं। और हम सब यह भी मानते है कि इतिहास अपने आप को दोहराता हैं। तो साथियो यह हम सब पर निर्भर करता है कि हम इतिहास को किस रूप में दोहराते हुए देखना चाहते हैं। वरना वो कहावत तो है ही ना कि आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी! इसलिए आज इस दिन व मौके पर मैं सबसे कहना चाहूंगा कि हम सब जरूर सोचे कि हम भी श्रमिक हैं या…… क्या हम इस वर्ग भेद को कम कर रहे है या…..

और दोस्तो मुझे यह भी लगता है कि श्श्रम और प्रवास पर निर्भर समुदायो के जीवन को बेहतर, सुरक्षित ओर गरिमामय बनाने के लिए अग्रणी और विषेषज्ञ संस्थान के रूप में सथापित हानेष् के लिए हमें इस बात पर भी शायद गौर और चर्चा करने की जरूरत हैं। मै आज एक श्रमिक होने के नाते इस विषय पर आप सबके विचार सादर आमन्त्रित करता हूं। अन्त में किसी कवि की इन पंक्तियों के साथ मै अपनी बात को विराम देता हूं कि…..

कुछ भी बनो तुम,
पर श्रमिक की अपनी पहचान न खोना।
तुम श्रमिक महान,
तुम्हारी मेहनत से मिट्टी भी सोना।।

आप सभी को शुभकामनाओ व आदर के साथ।

आप सबका श्रमिक साथी
राजेन्द्र

(Rajendra Sharma works with Aajeevika Bureau, leading its oldest centers at Gogunda, Udaipur. A great team leader, a thorough professional, a role model for youngsters visiting Gogunda and most importantly a powerhouse of energy…he can inspire anyone…even the most disinterested with loads of passion)

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