A letter to Aajeevika team…

श्रमिक साथियों,

आप व आपकी टीम को मजदूर दिवस की हार्दिक शुभकामनाए !

आप सोच रहे होगें कि आज मैं आपको ऐसा (श्रमिक) क्यो बोल रहा हूं ? चलो आप सब शायद इससे थोडा IMG_4675कम सहमत हो लेकिन आज के दिन मै अपने आप को एक श्रमिक मानते हुए आप सबसे कुछ कहना चाहूंगा।

तो साथियों मै तो एक श्रमिक हूं और किसी ना किसी रूप में श्रम करता हूं। स्वयं श्रमिक होने के साथ साथ मैं उस जरूरतमंद वर्ग को सलाह, सुरक्षा व समाधान प्रदान करने का प्रयास करता हूं जिसे वर्तमान में समाज द्वारा अधिकतर मौकों पर गरीब व श्रमिक मानकर समाज की मुख्यधारा से अलग थलग रखा जाता हैं। मै श्रमिक वर्ग के साथ काम करता हू और साथ ही कहीं ना कहीं अपने आप को श्रमिक हितैषी संस्था का कार्यकर्ता भी मानता हूं तो अपने आप को श्रमिक क्यो नहीं मानू घ्

जबकि कौटिलय व अन्य विद्वानो का मानना है कि भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके व्यक्तित्व, गुण व कर्मो के आधार पर तय होती हैं उसके व्यवसाय व आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं। और इस बात से शायद हम सब पूर्ण रूप से सहमत हैं। अगर इतिहास पर नजर डाले तो हमें संत रैदास, कबीर दास से लेकर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल तक हजारो उदाहरण मिल जाऐगे जिन्हे श्रमिक होने के बाद भी समाज में उनके कर्मो के आधार पर स्थान दिया गया। और मेरे अनुसार यही कारण है कि हमारे भारतीय समुदाय में अभी तक वर्ग संघर्ष उस रूप में उभरकर सामने नही आ पाया है जैसा कि इतिहास में पष्चिमी देषो में लगातार होता आया हैं। क्योकि समाज में हम जब भी किसी व्यक्ति विषेष या समुदाय को किसी संज्ञा विषेष से पुकारते है तो वह उसे बाकी लोगो से अलग तो करता है ही सीथ ही समुदाय में विघटन और वर्ग संघर्ष के बीज भी बोता हैं। लेकिन दोस्तो आज जब मै सोचता हंू तो मुझे लगता है कि अब हमारे यंहा भी वर्ग विघटन को लेकर स्थितिया बदल रही है और समाज में धीरे धीरे वर्गभेद का पेड बढता जा रहा हैं। और हम सब यह भी मानते है कि इतिहास अपने आप को दोहराता हैं। तो साथियो यह हम सब पर निर्भर करता है कि हम इतिहास को किस रूप में दोहराते हुए देखना चाहते हैं। वरना वो कहावत तो है ही ना कि आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी! इसलिए आज इस दिन व मौके पर मैं सबसे कहना चाहूंगा कि हम सब जरूर सोचे कि हम भी श्रमिक हैं या…… क्या हम इस वर्ग भेद को कम कर रहे है या…..

और दोस्तो मुझे यह भी लगता है कि श्श्रम और प्रवास पर निर्भर समुदायो के जीवन को बेहतर, सुरक्षित ओर गरिमामय बनाने के लिए अग्रणी और विषेषज्ञ संस्थान के रूप में सथापित हानेष् के लिए हमें इस बात पर भी शायद गौर और चर्चा करने की जरूरत हैं। मै आज एक श्रमिक होने के नाते इस विषय पर आप सबके विचार सादर आमन्त्रित करता हूं। अन्त में किसी कवि की इन पंक्तियों के साथ मै अपनी बात को विराम देता हूं कि…..

कुछ भी बनो तुम,
पर श्रमिक की अपनी पहचान न खोना।
तुम श्रमिक महान,
तुम्हारी मेहनत से मिट्टी भी सोना।।

आप सभी को शुभकामनाओ व आदर के साथ।

आप सबका श्रमिक साथी
राजेन्द्र

(Rajendra Sharma works with Aajeevika Bureau, leading its oldest centers at Gogunda, Udaipur. A great team leader, a thorough professional, a role model for youngsters visiting Gogunda and most importantly a powerhouse of energy…he can inspire anyone…even the most disinterested with loads of passion)

Posted in Listening to Grasshoppers | Leave a comment

हर जीवन, जीवन जीने का इक समझौता है

केसा राम उम्र 29 वर्ष आंतरी ग्राम पंचायत के बारा ग्राम (खोखरियों का भीलवाडा़) के निवासी हैं। बात 2011 जून की है। अहमदाबाद में मारुति मैटल की फैक्ट्री में समय था शाम के 5.30 बजे।

केसा राम का काम इस फैक्ट्री में बर्तनों को आकार (साँचा) देने वाली मषीन को चलाना था। एक केतली का ढक्कन साँचे में तैयार हो रहा था तभी मषीन के अचानक गिरने से केसाराम के दोनों हाथ उसकी धार की

Kamal blog 1चपेट में आ गये। केसाराम को किरीट हाॅस्पीटल में ले जाया गया। लेकिन खर्च अधिक होने के कारण फैक्ट्री मालिक ने उसे वाडीलाल हाॅस्पीटल में भर्ती करा दिया।

केसाराम ने 10 वर्ष तक इस फैक्ट्री में नौकरी की थी। तब उन्हें 50 रुपये प्रति दिन के हिसाब से मिलता था, जो इस दौरान बढ़कर 300रु. प्रति दिन हो गया था।

लेकिन आज केसाराम की तरक्की के दो भरोसेमंद साथी उसके हाथ चपेट में आ गये थे।

उसका एक हाथ काटना पड़ा तथा दूसरे हाथ में पेट का मांस लगाकर कुछ हद तक काटने से रोका गया। फैक्ट्री मालिक ने केवल हाॅस्पीटल का खर्च देकर केसाराम को विदा करा दिया। इन्होंने मालिक से मिलकर गुजारे के लिए रुपये मांगे, लेकिन 10 साल की नौकरी की कीमत मिली महज 100 रुपये।

kamal blog 2

केसाराम के परिवार में एक बूढ़े पिता, पत्नी तथा दो बच्चे हैं। इनकी कमाई पर ही पूरा परिवार चलता था। शारीरिक रुप से लाचार केसाराम इस मामले को लेकर लेबर कोर्ट का अनुभव केसाराम के लिए निराषाजनक रहा। केसाराम बताते हैं कि ‘‘4-5 बार उदयपुर में लेबर कोर्ट में इस के हाजिर होने के बावजूद फैक्ट्री मालिक कभी नहीं आये।‘‘2012 में आजीविका ब्यूरो की सायरा जनसुनवाई कार्यक्रम में आये। बाद में आजीविका ब्यूरो के श्रमिक सहायता एवं सन्दर्भ केन्द केलवाड़ा्र द्वारा इस मामले को लेबर कोर्ट ले जाया गया।

kamal blog 3

आज केसाराम के पास उदयपुर लेबर कोर्ट जाने तक के लिए पैसे नहीं हैं। आज इनका पूरा परिवार आपको बारा में किसी पेड़ के नीचे महुआ बीनते मिल जाएगा। लेकिन शायद उस को 15-20 रुपये किलो के भाव से बेचकर भी केसाराम लेबर कोर्ट उदयपुर जाने का जोखिम मोल नहीं लेगा क्योंकि आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर परिवार के लिए महुआ बेचकर चूल्हा जलाना ज्यादा जरुरी है।

- Kamal Kishore Pandey, Shramik Sahayata Kendra, Kelwara

(Kamal is a dynamic young crusader working with Aajeevika’s Kelwara team since the last few months. A student of Hindi, he uses poetry with great panache blending it in his day today work. One couplet from a Dinkar poem that he introduced me to  - ”नहीं पाप  का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध”…I have come to be awed by its depth and relevance to our work)

Posted in Listening to Grasshoppers | Leave a comment

उजाले समूह के …

‘‘रोजगार गारंटी का काम तो कुछ सालों से करते ही आ रहे है लेकिन इस बार काम करने में कुछ ज्यादा मजा आया।‘‘ टेकला गांव की शान्तु बाई और लालकी बाई जब बात करती है तो उनके चेहरे पर कुछ कर सकने का संतोष झलक आता है।

??????????????????

डूंगरपुर जिले में टेकला जैसे सैकडों गांव है जिनसे आदमी काम कमाई के मकसद से साल का ज्यादातर समय अहमदाबाद, इन्दौर या मूम्बई में बिताते है। घरों में कुछ बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रहते हैं। इन परिवारों के आय के साधन सीमित है। रोजगार गारंटी से थोडी मदद मिलती है बषर्ते कि उसके तहत काम बराबर मिलता रहे । इलाके के कई परिवारों की तरह ये परिवार भी काम की जरुरत पर काम नहीं मांगते । वे मानते है कि सरकार का जब मन होगा तो काम आ जायेगा। काम मांगने के बारे में सोच पाना उनके मुश्किल है।

स्थितियों में थोडा बदलाव आया जब ऐसे परिवारों की महिलाआं के समूह बने- उजाला समूह। श्रमिक केन्द्र के मार्गदर्षन से जब महिलाएं एक साथ आई तो थोडा समझ आया कि रोजगार गारंटी काम की गारंटी देता है न केवल काम की उम्मीद।

पहली बार जब टेकला की महिलाएं इकठ्ठा होकर काम का आवेदन करने पंचायत पर गई तो मन में शंका ही थी। उससे पहले कितने पापड बेलने पडे थे उन्हें। उनके जाब कार्ड भी तो मेट के घर पर ही रखे रहते थे। उन्हें निकलवाने में भी बहुत मेहनत लगी।

खैर, महिलाएं जब पंचायत के दरवाजे पर पंहुची तो सरपंच और सचिव के लिए समझना मुश्किल हो गया । उनके दिमाग घूम कर रह गये जब उन्हें पता चला कि ये सब रोजगार गारंटी के तहत काम मांगने आई है। बौखलाये सरपंच साब थोडा नाराज हुए और लगे महिलाओं को खरी-खोटी सुनाने। उनका कहना था कि

इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ जब कोई काम मांगने के लिए पंचायत तक चलकर आ गया हो। पहले तो उन्हें लगा महिलाओं को थोडा डांट-डपट देने से ये सब उल्टे पांव लौट जायेगी । उन्होंने यह नुस्खा अपनाया किन्तु महिलाएं भी ठान कर आई थी। वे अड गई। सरपंच साब ने महिलाओं को शर्म करने की दुहाई तक दे डाली । लेकिन महिलाएं टस से मस नहीं हुई।

सरपंच साहब भांप गए कि महिलाएं नहीं मानने वाली है। थोडे ठण्डे हुए और सचिव को इषारा किया । सचिव साहब आवेदन पत्रों के साथ महिलाओं के बीच पंहुच गये। धडा-धड आवेदन भरे गये। महिलाओं को आश्वासन देकर घर जाने को कहा गया। महिलाएं बोली – बिना रसीद के नहीं जाऐंगी। सरपंच साहब ने एक ओर बार सचिव को देखा। सचिव ने रसीद भी महिलाओं को उपलब्ध करा दी। महिलाएं धन्यवाद देते हुए किसी विजेता की भांति लौट गई।

10 दिन बाद काम मिला। महिलाएं दुगूने उत्साह के साथ काम पर गई। मस्टरोल में अपना अपना नाम चैक किया और काम पर जुट गई।

- Sadhana Rajput, Aajeevika Bureau

(Sadhana ji has been with Aajeevika for more than 4 years now. Bright as the polestar, her chemistry with the womenfolk of the Samoohas (groups) she brings together is worth a watch and the energy she infuses in them, unparalleled. Talk to her anytime and she has an inspiring story to tell)

Posted in Listening to Grasshoppers | 3 Comments

ये रिश्ता क्या कहलाता है…

तुलसीराम अपने कुछ साथियों के साथ जब श्रमिक केन्द्र के स्टाल पर पंहुचा तो बहुत संभल कर बात कर रहा था। उसे प्रवासी श्रमिक कार्ड का फार्म भरवाने से पहले कई बार समझाना पडा। वह चाह कर भी सबसे पहले कार्ड का आवेदन नहीं कर रहा था। सुबह 10.30 बजे वह पहली बार स्टाल पर पंहुचा पर कार्ड के लिए आवेदन उसने 3.00 बजे भरवाया। इस बीच उसने तीन चक्कर और लगाए। बडे संशय के साथ और लोगों को केन्द्र की सेवाओं से जुडते हुए देखा। उसके आश्वस्त होने का शायद यही तरीका था।

तीन बजे जब वह स्टाल पर पंहुचा तो उसके साथ तीन और लोग थे जो आकर ज्यादा आत्म-विश्वास के साथ सवाल-जबाव करने लगे। उन्होंने सब तरह के सवाल पूछे और मैनें अपनी पूरी समझ के साथ जबाव दिये। हर सवाल का जबाव तुलसीराम इतने ध्यान से सुन रहा था जैसे ये सब सवाल वह स्वयं पूछना चाहता हो । तीन में से एक ने पूछा – आप मजदूरों की मजदूरी दिलवाने का काम भी करते हो? इस सवाल पर पूछने वाले से भी ज्यादा रुचिवान तुलसीराम था। उसके चेहरे से यह साफ झलक रहा था। मैनें जबाव दिया- हां और तुलसीराम की ओर देखा। मुझे समझ आ गया कि तुलसीराम का कोई ऐसा ही विवाद है किन्तु सुबह से लेकर अब तक उधेडबुन में था कि वह अपना विवाद हमें बताएं तो बताए कैसे?

खैर, अब सीधे तुलसीराम से बात शुरु हो गई। उससे विवाद को समझने में बहुत समय लगा। हर सवाल का जबाव वह बहुत सोचने के बाद दे रहा था। धीरे-धीरे समझ आया कि उसकी झिझक का बडा कारण उसका विवाद और उसमें उसके रिश्तेदारों का जुडा होना था। उसने अपने साथ धोखाधडी करने वाले रिश्तेदार का नाम बडी मुश्किल से बताया।

उसका विवाद बैंगलोर में काम करते हुए पैदा हुआ था। कुछ माह तक वह अपने किसी रिश्तेदार के साथ बैंगलोर में काम कर रहा था। खर्चे-पानी का पैसा उसे बराबर मिलता रहा लेकिन जब सारा हिसाब एक साथ किया तो कुल 20,000 रुपये तुलसीराम को लेने निकले। रिश्तेदार ने तुलसीराम को यह कह कर गांव भेज दिया कि यह पैसा वह गांव में उसके पास पंहुचा देगा।

तीन साल हो गये । न पैसा आया न पैसे की बात । तुलसीराम किसी को भी यह बात बताते हुए झिझकता है। उसे डर है कि कहीं उसके रिश्ते न बिगड जाये। रिश्तों की गरिमा की खातिर वह तीन साल चुप रहा। मैंने उससे एक सवाल पूछा – अच्छा पैसा तो तुम तक नहीं पंहुचा लेकिन क्या वो रिश्तेदार तमसे कभी आकर मिला? तुलसीराम ने कहा- नहीं, मैनें कई बार उसे याद दिलाया लेकिन हर बार वह कहकर टाल गया कि हां इस बार पैसा दे दूंगा।

IMG_5856

बातों ही बातों में तुलसीराम को यह समझ आ गया कि रिश्तेदारी तो दोनों तरफ से निभाई जाती है। केवल एक व्यक्ति उसे चला कर रखना चाहे तो वह ज्यादा दूर नहीं जाती। तुलसीराम ने थोडी-सी हिम्मत दिखाई । श्रमिक केन्द्र ने विपक्षी को एक फोन घनघनाया। परिणाम- 15 दिन में तीन साल से अटकी मजदूरी तुलसीराम के हाथ में थी।

ये केवल एक तुलसीराम की कहानी नहीं है। कितने ही लोग जो अपने रिश्तेदारों की मदद से शहरों में काम करने जाते है,उनके पास काम करते है और मजदूरी के हिसाब के समय समस्याओं में घिर जाते है। ये एक और रुप है काम के अनौपचारिक सम्बन्धों का। रिश्तेदार है तो कौन पहले लिखित अनुबन्ध करें ? कौन लिखित हिसाब करें ? पर मजदूरों की दृष्टिकोण से तो रिश्तेदारी कई बार बडी भारी पडती है।

- मोहन लाल गमेती, सलूम्बर केन्द्र, आजीविका ब्यूरो

(Mohan ji is one of the oldest members of Aajeevika team and works very closely with migrants in the field. Being from the same community he is able to appreciate the predicaments faced by workers and the challenges associated with the socially networked migration. At Aajeevika, he started his career at its oldest center at Gogunda and is now based in Salumbar)

Posted in Listening to Grasshoppers | 1 Comment

कब आएगा गोपाल बाग

छः छोटे छोटे बच्चों का पिता, पत्नी और बुढ़े मां बाप का ईकलौता कमाउ गोपाल बाग पिछले सात महीनों से गायब है। वो दादन में गया है। यहां दादन का अर्थ है, एडवांस लेकर गया एक श्रमिक, जो कि प्री-पेड़ मजदूरी का एक और रूप है। यहां उत्तरी और पष्चिम उड़ीसा में एड़वांस लेकर काम करने का नाम ही दादन है। ये श्रमिक मुख्य रूप र्से इंटभट्ठों में मजदूरी करने जाते हैं और इसके बदले 15 से 35 हजार तक एडवांस लेते हैं। छः से सात माह के लिए काम पर जाते हैं, इन श्रमिकों में अधिकांशतः परिवार, महिला और बच्चे भी… के साथ प्रवास होता है।

गोपाल बाग भी इंटभट्ठे पर दादन मजदूरी करने गया, वह अकेला गया था, किन्तु लौटा नहीं। घर और गांव वालों को अंदेशा है कि दलाल ने उसे बंधक बना लिया है। एक बार फोन पर बात हुई थी, तो उसने कहा था, कि उसको वहां से ले जाओ। देबदत्ता क्लब संस्थान के सलाहकार समिति के सदस्य एवं मिडिया से जुडे़ संजीब मिश्रा ने बताया कि हमने गोपाल को खोजने की बहुत कोशिश की, उसके दलाल ने आंध्रप्रदेश में जो जगह बताई, वहां तक भी जाकर आए। हमें गलत जगह बुला लिया, वहां ना तो गोपाल मिला और ना ही वो दलाल। पुलिस में भी गये, दलाल और गोपाल दोनों की फोटो भी बताई, लेकिन अभी तक तो उसका कुछ भी पता नहीं चल पा रहा है।

उडीसा के बरगढ़ जिले की गायसिलेट ब्लॅाक में कार्यरत देबदत्ता क्लब  के साथियों के साथ दिनांक 7 मार्च को जब मैं गोपाल बाग के घर गया तो दुःख से कुछ बोल ही नहीं पाया। लगभग 3 से 7 साल के छः में से दो बच्चों की आंखे खराब है, धुंधला सा ही देख पाते हैं। संस्थान के साथियों ने उसके बुढ़े मां-बाप के लिए मधुबाबु वृद्वावस्था पेंशन के फार्म भरवाए। हमारे साथ ही गये ब्लॅाक के एस.ई.ओ. सोशल एक्सटेंशन आफिसर ने उनके ये पेंशन फार्म भरे। आफिसर ने बताया कि दो महीनों में ये कार्यवाही हो जाएगी और इन्हें 300-300 रुपए मासिक की पेंशन शुरू हो जाएगी। बच्चों को भी पास ही एक बाल कल्याण आश्रम में भेजने की बात हो रही थी, जहां उनका पालन-पोषण अच्छी प्रकार हो पाएगा।

लंबी दूरी में प्रवास में श्रमिकों के मिसिंग केसेस़ बड़ी संख्या में देखने में मिल रहे हैं, दिनांक 2 मार्च को जब मैं उड़ीसा के कोस्टल एरिया में खुर्दा जिले की एक तहसील बालीपटना के मजीहरा गांव में था, तब भी वहां एक जवान लड़का प्रवास पर केरल के कोट्टयम जिले में काम पर जाते समय रेल से उतर कर कहीं चला गया। साथ में गये दोस्तों ने बहुत खोजने की कोशिश की, लेकिन पिछले दो महीनों से उसका कोई अता-पता नहीं है। मां-बाप इसी आशा में है कि वो आ जाएगा। पुलिस को खबर नहीं की जाती। पता नहीं किस चमत्कार के इंतजार में हैं, ये मां-बाप। इसी प्रकार इसी तहसील के अडाएंचा पंचायत के देउलधरपुर गांव का एक केस है। दो छोटे बच्चों, पत्नी और बुढ़े मां-बाप को अकेला छोड़ कर एक प्रवासी कटक शहर में पान सप्लाई करने गया, 3 साल हो गये, वापस ही नहीं आया। एक बार उसने 3500 रुपए घर भी भेजे थे, किन्तु उस बात को भी ढ़ाई साल से उपर हो गये। बाप को आंखों से कुछ दिखता नहीं, पत्नी मजदूरी कर के घर चला रही है। बच्चों को देखकर ऐसा लगता कि प्रवास ने इनका सब कुछ छीन लिया। इस केस में भी अभी तक पुलिस को कुछ भी खबर नहीं की गई है। हमारे साथ गये पंचायत समिति सदस्य ने हमें विश्वास दिलाया है कि वो जल्दी ही पुलिस कार्यवाही करेंगे। कार्यकर्ता ने कहा कि वृ़द्ध की भी आंख का आपरेशन हम करवाएंगे।

ये केस श्रमिक केन्द्रों द्वारा किये जा रहे लीगल अवेरनेस केंप के दौरान सामने आ रहे हैं। हमारे केन्द्रों के कार्यकर्ता इस केसों को सामने ला रहें हैं, परन्तु इन दर्दनाक कहानियों का अंत क्या होगा, कहना बहुत ही कठिन है, घर वालों को कुछ पता नहीं होता, कहां गये हैं, ये श्रमिक। बस वे बताते हैं, आंध्रा, केरल गये हैं। काश वे रजिस्ट्रेशन करवा कर गये होते…. काश! पता नहीं कब लौट पाएंगे ये प्रवासी श्रमिक….

Sanjay Chittora, Aajeevika Bureau

(Sanjay leads the skill training and placement work at Aajeevika. At present, he is working in Odisha with some organizations dedicated to the cause of migration. This piece picks a leaf from his Odisha diary)

Posted in Migration Musings | 2 Comments

मजूर सहायता – लेबरलाइन*

Labour Line Stickerकेलवाडा -उदयपुर के बीच में चलने वाली बस में जब में बरवाडा से चढ़ा तो बैठते ही मेरी नजर सामने लगे लेबरलाइन के स्टिकर पर पड़ी जिस पर लिखा था लेबरलाइन 0294 2451124 मुसीबत में फंसे मजदूरों के लिए फोन सेवा। उसको देखते ही उसके बारे में लोगों की जानकरी के बारे में मेरे दिमाग में कुलबुली हुई। सोचा इसके बारे में लोगों की जानकारी देखते हैं। शुरूआत मेरे बगल में बैठे गहरी लाल गमेती से की। जैसे ही मैंने पहला सवाल पूंछा कि से सामने किसका नम्बर लिखा है तो गहरी लाल ने कहा मजूर सहायता, और फिर शुरू हुआ मजूर सहायता (लेबरलाइन) का गुणगान।

“साब यो मजूरों री सहाय रे बाते है, मजूर किणी तरह री मुसीपत में होये तो इना नम्बर पर फोन करो। हर तरह री मुसीपत में मदद मिलेगी”। (यह मजदूरों की सहायता के लिए है, मजदूर किसी भी प्रकार की मुसीबत हो तो इस नम्बर पर फोन करो। हर प्रकार की मुसीबत में मदद मिलेगी)। जब मैने पूंछा कि कैसी मुसीबत तो गहरी लाल ने बताया कि मजदूरी नहीं मिले, मारपीट हो जाए, काम पर चोट लग जाए और तो और ये मदद के बदले आफिस वाले कोई पैसा भी नहीं लेते हैं, एकदम फ्री सेवा है। इतने में ही बगल वाली सीट पर बैठा एक नौजवान बोला इस नम्बर पर फोन करने से मजदूरों को काम दिलाने में भी ये मदद करते हैं। हमारी पिछली सीट पर बैठे भगवती लाल जो कि बरवाडा (जिला-उदयपुर) में दुकान करते हैं बोले कि इनका आफिस बरवाड़ा में है। आजीविका ब्यूरो नाम की एक संस्था है और उदयपुर में साइफन चैराहे पर हैड आफिस है। गहरी लाल जो कि कठार (जिला-उदयपुर) के रहने वाले हैं और आसपास के क्षेत्र में चिनाई कारीगर का कार्य करते हैं ने बताया कि केलवाडा (जिला-राजसमंद) में भी एक आफिस है। लेबरलाइन के बारे में इन सभी की जानकारी वास्तव में मेरी अपेक्षा व सोच से अधिक थी।

बस में मेरे इर्द-गिर्द पांच-छः लोग इकट्ठे हो गए और लेबरलाइन पर जोरदार चर्चा चल रही थी। मैं अनभिज्ञ IMG_5856बना सुन रहा था और सभी मुझे लेबरलाइन के बारे में बताए जा रहे थे। मैं मन ही मन फूला नहीं समा रहा था परन्तु लोगों के रोचक अनुभवों को सुनने की ललक में ये नहीं बता पा रहा था कि मैं भी आजीविका ब्यूरो में ही काम करता हूं। मुझे लगा कि जैसे ही मैंने बताया कि में भी आजीविका ब्यूरो में काम करता हूं तो इनकी बातों में पक्षपात आ जाएगा। खैर चर्चा चलती रही और भगवती लाल ने बताया कि ये आफिस वालों ने मजदूरों के लाखों रूपये दिलाने में मदद की है जो कि वर्षों से मजदूरी करने के बाद फंसे हुए थे। उनके द्वारा हर बात के अन्त में कहा जाने वाला शब्द ये आफिस मजदूरों के लिए बहुत अच्छा काम करता है दिल को खुश कर जाता। मेरी खुशी का ठिकाना तो जब नहीं रहा जब गहरी लाल और नोजा राम ने अपना मोबाइल निकाल कर हिन्दी में मजूर सहायता के नाम से अपनी फोन बुक में लेबरलाइन का सेव किया हुए नम्बर दिखाया। मुझसे रहा नहीं गया और मैंने बता ही दिया कि मैं भी इसी आफिस में काम करता हूं, फिर क्या था वहां सभी लोग मुझे अचम्भे से देख रहे थे। भगवती लाल ने पूंछा कि फिर आप ये सब क्यों पूंछ रहे थे ? मेरा जबाव था कि श्रमिकों को बेहतर सेवा और जानकारी देना आजीविका ब्यूरो का प्रमुख ध्येय है ओर इसके लिए इन सेवाओं के उपयोगकर्ताओं के सुझाव व फीडबैक ही उसका बेहतर तरीका होता है।

कुछ दिन पहले जब मैं अमृता जी से श्रमिक मित्रों की भूमिका और हमारी अपेक्षा की बात करते हुए यह बता रहा था कि ये आजीविका ब्यूरो के दूत के रूप में फील्ड़ में मौजूद रहते हैं। और हमारी अनुपस्थिति में भी outreach- canopy abhiyanप्रवासी श्रमिकों को जानकारी देते हैं। कहते हुए मुझे एकबारगी लगा कि मैं कहीं बहुत आदर्शवादी बातें तो नहीं कर रहा हूं। क्योंकि कई स्वयंसेवी व श्रमिक मित्रों के साथ मेरे अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे थे। परन्तु अब मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि अगर श्रमिक मित्रों व स्वयंसेवीयों को अच्छी तरह से समझाया जाए तो ये सच्चे प्रचारक व आजीविका के दूत हैं। समुदाय में काम की छाप और इन्हीं के द्वारा प्रचार के लिए इन पर समय व जानकारी का निवेश करने की आवश्यकता है। परिणाम सकारात्मक और फल अवश्य ही मीठा होगा।

- Santosh Poonia, Aajeevika Bureau

*आजीविका ब्यूरो ने अगस्त 2011 में लेबरलाइन की शुरूआत की थी। अब इसका एक टोल फ्री नम्बर भी है जो 1800 1800 999 है। इस नम्बर पर श्रमिक कहीं से भी अपनी समस्या व परेशानी दर्ज करवा सकता है। लेबरलाइन की शीर्षक “लाइन डरो मत फोन करो” है।

Posted in Listening to Grasshoppers | 2 Comments

Shramik Mitras – Friends of workers

Durgesh 2Durgesh runs a mobile shop in Padavali khurd, a Panchyat in Gogunda block of Udaipur. A visit to his shop is good enough to get an idea that he has a flourishing business. He treats his customers well – most of who are villagers, struggling to make a good choice of a mobile, not knowing which SIM card to pick or frustrated with their old sets, which refuse to function. Durgesh listens to them with patience, deftly managing his merchandise, meanwhile he also tries to answer my questions and smile at my camera. In addition to running a mobile shop, Durgesh works as a Shramik Mitra for Aajeevika Bureau, helping us expand our outreach and deliver services to the migrant community.

The entrance of his shop carries a large poster of Labor Line – Aajeevika’s phone based helpline for workers. The inside of the shop also carries several posters of our skill training work, collectivization and there is a separate rack dedicated to the survey formats of Aajeevika. As a Shramik Mitra, Durgesh helps us carry out a range of activities including worker registrations, migration surveys, community mobilization for special events etc. I ask him what does he get out of this – he smiles and tells me – “Yeh Achha kaam hai” – its good work, he adds on – “I get to help people from my community and it makes me feel good. Plus, it doesn’t take much effort for me to introduce these things to people, who anyway come to my shop. I interact with more people and get recognition and respect. He enthusiastically shows me his Shramik Mitra ID issued to him by Aajeevika….

Durgesh1

“Shramik mitras” or “friends of workers” enjoy a significant place within Aajeevika’s migration initiative. They help us reach out to a larger group of migrants and deliver our services in a resource-efficient manner. Similar to volunteers, their role becomes more important for a target group difficult to track – the seasonal migrant community as we know is characterized by high mobility and its footloose nature.

Most of the Shramik Mitras are youth from within the community – students, migrants and returnees. They are a solid and steady representative of the migration program living within the community, helping us disseminate key messages on safe migration practice. Shramik Mitras involved in the legal aid service, are also able to provide basic counsel/first aid, helping workers identify the right platforms for dispute redress.

Among the several roles played by them under the migration program, the one that is most powerful is that of an informed, aware worker who is conscious of his rights and also sensitive towards his responsibilities in the labor market. They act as our ambassadors, persuasive examples of responsible labor behavior.

Durgesh is an enterprising young man with big dreams. While talking to me he takes out the picture of his wife from his wallet and shows it to me – he talks of her with great pride – “she is more educated than me…I want her to finish her studies and one day apply for RAS (Rajasthan Administrative Services)”. When I ask him, why  didn’t he study further; he says – “someone needed to fend for the family, I am in the driving seat now, after my wife finishes her studies, I will go back to studies and then she can run the family”.

May all your dreams come true and may the likes of you inspire many more like us!

- Amrita Sharma and Rajendra Sharma, Aajeevika Bureau

Image | Posted on by | Leave a comment

कौन लेगा इनकी सुध !

कौन लेगा इनकी सुध ! – मुहाना मंडी की मेहनत-कश महिला मजदूरों की दयनीय दशा

सुबह के 9 बजे, चारों ओर सब्जी और फलों से भरे ट्रक ही ट्रक। आदमी सब्जियों और फलों से भरे बोरों को ट्रक से उतार कर कांटे पर रखते जा रहे थे। सब्जियों और फलों के थोक विक्रेता बोरों को कांटे पर तोल कर खरीददारों को बेच रहे थे। खरीददार थोक विक्रेता के पास आते हैं और सब्जियों से भरा बोरा तुलवाते हैं। तुले हुए बोरे को 4 आदमी उठाकर एक महिला के सिर पर रखवाते। महिला उस बोर को उठा कर चल पड़ती है अपनी मंजिल की ओर………. फिर दूसरा खरीददार आता है, बोरा तुलवाता है और 4 आदमी मिलकर उस बोरे को उठाकर दूसरी महिला के सिर पर रखवा देते हैं वह महिला भी सिर पर बोरा लिए फुर्ती से चल पड़ती है मंजिल की ओर…… और यह सिलसिला चलता रहता है लगातार . . . यह स्थिति है जयपुर की मुहाना मण्डी में बोझा ढोने वाली महिलाओं की।

वो सब्जी से भरे बोरे दिखने में बहुत भारी वजन के लग रहे थे। थोक विक्रेता से पूछने पर पता चला कि इन बोरों का वजन 70 से 80 किलोग्राम है और ये महिलाएं मण्डी में वजन ढोने का काम करती हैं।

IMG00111

पूरी मण्डी में हर जगह महिलाएं अपने सिर पर बोझा उठा कर एक जगह से दूसरी जगह ले जा रही थीं। उन महिलाओं ने बताया कि “मजदूरी का तो कुछ भी तय नहीं है, बोझा उठाने की एवज में हमें एक बोरे के 2 रुपये से लेकर 10 रुपये तक मिल जाते हैं। कभी 5 रुपये तो कभी 10 रुपये प्रति बोरा भी मिल जाते हैं। ”जानकारी के अनुसार मजदूरी का दूरी और वजन से कोई लेना देना नहीं है। 50 किलोग्राम से 100 किलोग्राम तक का वजन एक बार में ढोना पड़ता है। ये महिलाएं सुबह 4 बजे से मण्डी में आती हैं और दोपहर 1 या 2 बजे तक काम करती हैं।

जयपुर की मुहाना मण्डी में लगभग 2000-2500 हजार महिलाएं बोझा ढोने का काम करती हैं। गोनेर, चाकसू, चोमू, गलता गेट, कीरों की ढाणी, झालाना कच्ची बस्ती आदि जयपुर के चारों कोनों से महिलाएं इस काम को करने के लिए मुहाना मण्डी में आती हैं। ये महिलाएं रोज सुबह 4 – 5 बजे 10 से 20 रूपए खर्च करके मण्डी तक आती हैं। सभी महिलाएं खुली मजदूरी करती हैं। एक दिन में 50 से 150 रूपए तक महिला कमा लेती है। 100 मीटर से लेकर 800 मीटर तक के दायरे में महिलाओं को बोझा अपने सर पर उठा कर घूमना पड़ता है। सामान ढोते वक््त यदि महिला से कोई नुकसान हो जाये तो उसकी भरपाई भी महिलाओं से ही की जाती है।

ना घर में सुख, ना काम पर कोई परवाह

बोझा ढोने वाली इन महिलाओं को ना तो घर में सुख मिलता है ना ही काम पर कोई परवाह करता है। अमूमन महिलाएं अपने शराबी पतियों द्वारा प्रताडि़त की जाती हैं। कार्यस्थल पर भी किसी को उन की परवाह नहीं है। यदि काम के दौरान महिला के साथ कोई दुर्घटना घटित हो जाये या उसे चोट लग जाये तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता है। इस काम से काफी संख्या में वृद्धा, विधवा, परित्यक्ता व तलाकशुदा महिलाएं जुडी हुई हैं।

मुहाना मण्डी से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित कच्ची बस्ती कीरों की ढाणी में कुल 2 हजार 9 सौ घर हैं। DSC03164इस बस्ती की अधिकतर महिलाएं मुहाना मण्डी में बोझा ढोने का काम करती हैं। इन परिवारों में से कोई तो 17 साल तो कोई 10 साल से इस बस्ती में रह रहा है। पहले इस बस्ती के पुरुष एवं महिलाएं मुहाना मण्डी में ही बेलदारी का काम किया करते थे। मण्डी बनने के बाद महिलाओं ने बेलदारी छोड़ कर बोझा उठाने का काम शुरू कर दिया क्योंकि इस काम में रोज की कमाई हो जाती है जबकि बेलदारी में कभी काम मिलता था तो कभी नहीं मिलता था। कुछ महिलाओं के पति अभी भी मण्डी में बेलदारी का काम करते हैं। कीरों की ढाणी कच्ची बस्ती की आजीविका पूरी तरह से मुहाना मण्डी पर निर्भर है।

बस्ती में स्कूल नहीं, 3 शराब ठेके हैं

कीरों की ढाणी कच्ची बस्ती की महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय है। परिवार पूरी तरह इन्हीं पर आश्रित हैं। मण्डी में काम करके वापस आकर घर आकर खाना बनाती हैं व घर के अन्य काम करती हैं। इस बस्ती में शिक्षा के नाम पर एक भी सरकारी स्कूल नहीं है जबकि 3 दारु के ठेके हैं। कुछ बच्चे सांगानेर के एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने जाते हैं। जबकि अधिकतर बच्चे शिक्षा से वंचित हैं! बस्ती में चिकित्सा की कोई सुविधा नहीं है। लोगों को इलाज करवाने के लिए सांगानेर जाना पड़ता है! पीने का पानी तक इनको नहीं मिलता है।

2900 घरों के बीच सिर्फ एक ही आंगनबाड़ी केन्द्र है। लोगों के पास राशन कार्ड नहीं हैं। जिनके पास राशन कार्ड हैं उन्हें भी राशन की दुकान है। महिलाओं ने बताया कि राशन डीलर उन्हें पूरा राशन नहीं देता है। 3 लीटर केरोसिन की जगह 1 या 2 लीटर ही देता है। इन महिलाओं के पहचान पत्र तक नहीं हैं, बहुत सारी सरकारी योजनाएं तो यहां तक पहुंच ही नहीं पाई है।

- Shweta Tripathi (Aajeevika Bureau)

Posted in Listening to Grasshoppers | Leave a comment

Bonded for Generations

“Bhaata todo, Bhaata khao” ( work in mines, eat mines) is the anecdote that runs across the 500-600 families of Kherwa Community in Village Peenjna, near Bhanwargarh (Baran district) where almost 60% of the population is working as stone cleaners, stone cutters, loaders (Hamali) prominently in mining and construction industries as bonded labour, a dated concept in today’s world. Almost all the families are from underprivileged sections of the society.

Mohanlal started working on minMohanlales as a manual labour from childhood, when he used to accompany his father on mines where he was working as hamali. Today he himself works as a bonded labour in those very mines because his father could not repay the debt of Rs. 12,000 he had taken from the owner during his work life. The debt has only grown over time to Rs.70, 000.

His father contracted tuberculosis due to unhealthy working conditions and continuing the legacy Mohanlal is also now a victim of TB. They have no medical support or social security cover by the Government or the employer.

Even after 66 years of Indian Independence, these workers are still fighting for their lives and are at the mercy of their contractors – they are not paid fairly, undergo torture/banishment when try to change job. Whenever any of the workers wishes or tries to leave, he is manhandled by the contractor and their henchmen. They are abducted forcibly from their home and forced to pay their dues. Often, the expense incurred for the abduction is also added to the debt. There are instances where a worker has been beaten up mercilessly, when he asked for settlement of dues and payment.

What is worse is that they have lost all hope that things can change, that they can ever get out of this miserable condition. A 28 year old Mohanlal says “agar mera baap majdoori karta tha to mujhe bhi majdoori karni hi padegi kyunki usne jo karza liya tha wo chukana hai”

For them independence means to get free of bondage which seems to be a next horizon for their lives.

“Does Light over the Horizon add up to Light in our Lives.”

Aarti Bhardwaj, Aajeevika Bureau

Posted in Migration Musings | 2 Comments

Hawkers in the City of Gold

At 3 am in the morning today they picked up all our belongings

I was asleep, as they took it all away

We don’t have a license to hawking in the city, so they say

But then Munna has been carrying this gun without license for years now

 In Delhi, those men raped that girl last night

There was no one to see or protect

I am told, the police was busy cleaning up the city of a bigger menace, I see…

 If I had the money I would have paid the municipality wallah and the police

Well, no wonder they come to us 

Somebody told me that the bribe we hawkers give is more than the municipality’s  budget

***********************************

This morning at 3 am in Vakola, Santacruz east, all belongings of hawkers selling vegetables and fruits were picked up by the local administration, while the hawkers were asleep. None of the hawkers had a license and had been threatened with strict action, to vacate.

In Mumbai, hawkers are perceived to be a public menace. They are blamed for encroaching on public spaces leading to traffic jams and crowding up of the city; so it’s alleged. Citizen’s associations file cases against them and advocate for their eviction. Almost everyone thinks that they should go home, to the poor villages of the poor states they came from. I’ve observed school children taking out processions against them and vouching that they’ll never buy from a hawker.

I vouch not to buy from Phoenix mill. Sorry it’s a Mall now.

I wonder if there is any parallel between the hawkers and the mill workers of Mumbai’s Manchester era. Mumbai’s much famed mills were swallowed up in a wave of modernization of the city. There are several theses on what happened – how the owners cheated the workers declaring losses, how they were supported by the local administration and the state in usurping public land and selling them, and how the unions fought a losing battle. At places relics of the struggle remain…a painful reminder of the crushed, evicted, abandoned workers in the city of gold…

What happened to them, those tens of thousands of workers and their families? How many of them hung themselves like in the movie City of Gold, how many turned criminals like Neru and died and how many somnambulant Ranades still dream on of a favorable Court verdict.

…..Crushing the mill and its workers, rose malls which shine so much, that it hurts.

And then, there are tea plantation workers, about who I’ve been reading lately. How they suffer under tripartite agreements between employers, the state and the unions – agreements which are a result of arm-twisting –agreements which allow employers to pay Rs. 68 or less per day to workers – agreements in which the state is a co-conspirator.  I am told that minimum wages legislation does not apply to plantations. Well, the Chay does taste bitter*.

And then, I think of what my maid Ashwini said in the morning – that she can never dream of a different life… that the poor will always remain poor.

Hawkers, mill workers, tea pickers, weavers, factory workers of England from the industrial revolution era…there is music in my head which plays on…from the movie city of gold…it smells of defeat and of inevitability……

- Amrita Sharma (Aajeevika Bureau)

*reference to a recently published article in EPW – “This Chay is bitter: Exploitative Relations in the Tea Industry” by Sujata Gothoskar” December 15, 2012

Posted in Migration Musings | 2 Comments