Pahiyon pe Latakti Zindagi

पूरा राम ट्रक में बगल से चढ़ने की कोशिश कर रहा है और उसके एक हाथ में लटकती सामान की भारी-भरकम पोटली माने उसे वापस खींचने का भरसक प्रयास कर रही है। जैसे-तैसे जूझ़ते हुए वह ट्रक के ऊपर चढ़ने में सफल हुआ। ट्रक में चढ़ते ही उसके चेहरे पर छाई मुस्कान को देख कर लगता है माने उसने ऐवरेस्ट की चोटी पर फतह हासिल कर ली हो। और हो भी क्यों ना आज अहमदाबाद से बाहर निकलने वाली प्रत्येक बस, जीप, ट्रक आदि सभी खचाखच भर के जा रहे हैं और उनके बीच में पूरा राम को घर जाने के लिए साधन मिल गया। यह बात होली के तीन दिन पहले की है जब भारी संख्या में प्रवासी अपने घर वापस आते हैं और इसी कारण से सभी साधनों में अन्धाधुन्द भीड़ चल रही है। 

अहमदाबाद गुजरात का सबसे बड़ा, व्यापारिक व औद्योगिक नगर है। एक अनुमान के अनुसार कुल 60 लाख की आबादी वाले इस शहर में 12 से 15 लाख प्रवासी श्रमिक अपनी आजीविका कमाने के लिए आते हैं। इनमें से लगभग 8 लाख श्रमिक केवल पडौसी राज्य राजस्थान से आते हैं। राजस्थान में भी दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी अंचल से आए श्रमिकों की संख्या अधिक है। ये श्रमिक यहां पर निर्माण कार्य, अनाज व फल सब्जी मंडियों में हम्माली, कारखानों, घरों में कार्य, चैकीदारी, होटलों आदि में कार्य करते हैं। घर से दूर व अनजान शहर में इन श्रमिकों को पहचान, दक्षता की कमी, कानूनी जानकारी का अभाव, नियोक्ता द्वारा समय पर व पूरा पैसा नहीं देना,आवास व स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच नहीं होना जैसी अनेकों समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। प्रवासी श्रमिकों को पहचान पत्र, दक्षता संम्वर्धन, कानूनी सलाह व मदद, बैंकों से जुडाव और बचत तथा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से श्रमिकों को जोडने के लिए आजीविका ब्यूरो पिछले छः वर्ष से प्रयासरत है। आजीविका ब्यूरो प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवारों के साथ कार्य करने वाली गैर-सरकारी संस्थान है जो कि राजस्थान और गुजरात में पिछले पांच वर्ष से कार्य कर रही है। कार्य के दौरान श्रमिकों से सम्पर्क और अवलोकन में यह पाया कि कार्य और शहर से जुड़ी उपरोक्त समस्याओं के साथ ही त्यौहारों और शादीयों के समयघर आने जाने की यात्राओं में श्रमिकों को सीट नहीं मिलना, किरायांे में वृद्धि होना तथा असुरक्षित यात्रा के कारण दुर्धटना,जैसी आदि समस्याओं का सामना करना पडता है। इस समस्या को गहराई से समझने के लिए आजीविका ब्यूरो के अहमदाबाद केन्द्र को प्रवासी श्रमिकों को आवागमन में होनी वाली असुविधाओं व समस्याओं पर एक अध्ययन की आवष्यकता महसूस हुई। इसी संदर्भ में अहमदबाद शहर में कार्य करने वाले प्रवासी श्रमिकों को आवागमन में आने वाली समस्याओं को जानने के लिए अध्ययन किया गया।

Mode of Transportation

अध्ययन में सामने आया कि 47 प्रतिशत यात्रीयो की पहली पसंद रोडवेज बस में यात्रा करना है परन्तु उनमें से मात्र 18 प्रतिशत ही रोडवेज में यात्रा कर पाते हैं। इस सब के पीछे रोडवेज बसों की कमी, समय का सही मेल नहीं बैठ पाना जैसे दिन में केवल एक या दो बसें जाती हैं वो भी उनके काम के समय से मेल नहीं खाती हैं। प्रवासी को जिस स्थान से जहां तक जाना है वहां की बसों की अनुपलब्धता है। प्रवासी सुदूर गांव से आते हैं जबकि अधिकतर रोडवेड बसें कस्बों तक ही जाती है I अतः इस स्थिति में ये प्रवासी उनके गांव या पास तक जाने वाली प्राईवट बसों में यात्रा करने को प्राथमिकता देते हैं। प्राईवेट बसों में यात्रा करने का एक और कारण यह है कि रोडवेज बस केवल सरकारी बस स्टैण्ड से ही जाती है जबकि इतने बडे़ शहर में सभी को वहां तक पहुचना आसान नहीं होता है। प्राईवेट बस ओपरेटर सवारियों की उपलब्धता के अनुसार अलग-अलग स्थानों से बसें संचालित कर देते हैं। इन्हीं सब कारणों का ही प्रभाव है कि अध्ययन में शामिल 72 प्रतिशत प्रवासी श्रमिक प्राईवेट बसों में जोखिमपूर्ण यात्रा करने व उनकी मनमानी के चलते उनके हाथों लुटने को मजबूर हैं।

ये कहना अतिष्योक्ति नहीं होगी कि श्रमिकों द्वारा हाडतोड़ मेहनत के बाद की गई कमाई पर बस मालिकों व ट्रेवल्स कम्पनीयों की गिद्व-दृष्टि होती है। वे मौके की तलाश में रहते हैं। त्यौहारों के समय जब प्रवासी अपने घर लौटने को बेचैन होते हैं उस समय ये मौकापरस्त ट्रेवल्स कम्पनीयां किराया बढ़ा कर उनकी गाढ़ी कमाई में हिस्सा बटाते हैं। जब मैंने एक ऑटो वाले से किराया बढ़ाने के कारण के बारे में पूंछा तो उसका कहना था कि ”साल में 5 दिन हमारे होते हैं और 360 दिन ग्राहक के होते हैं तो इन 5 दिनों में ही तो हम मनमानी कर सकते हैं।“ इसी प्रकार बस ओपरेटर से जब पूंछा गया कि इन दिनों में जब ऐसे ही इतनी सवारियां मिल रही होती हैं तो किराया क्यों बढाया जाता है ? तो उन जनाब की बात सुनिए ”अरे साहब अगर साल में दो-चार तीज त्यौहार न आऐं तो हमारी तो बसें ही बन्द हो जाऐं। त्यौहारों के बहाने लोग अपने घर जाते हैं और यही 5-10 मौके होते हैं जब हम बसों से थोडा बहुत लाभ कमा पाते हैं नहीं तो सामान्य दिनों में तो डीजल के पैसे निकालने के लाले पड़ जाते हैं।

कम दूरी और बिना पूर्व योजना के की गई इन यात्राओं में कोई पूर्व बुकिंग नहीं की जाती है। प्रवासियों को अधिक किराया चुकाने के बाबजूद भी सीट नहीं मिलना, लटक कर या छत पर बैठकर यात्रा करना, सामान खो जाना, जेब कतरी, चोरी, लड़ाई-झगड़ा आदि समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अधिक भीड़ होने के कारण यात्रा के दौरान यात्रीयों के बस जीप की छतों के ऊपर से गिरने की घटनाओं व अन्य दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ जाती है। आप सुन कर स्तब्ध रह जाऐंगे कि एक जीप में 50 से 60 सवारियां और बस में 150 तक सवारियां होती हैं। जो कि अपनी क्षमता से कई गुणा हैं। दुर्घटनाओं के लिए यह सबसे जिम्मेदार कारक है। पुलिस सब कुछ देखते हुए भी रिष्वत के चन्द पैसों के लिए अपनी आंखें बन्द कर लेती है और इन यात्रियों की जान को जोखिम में डाल देती है।

भारत के संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक को देश में कहीं भी जाने व काम करने का अधिकार है। जब हमारी सरकार हमें कहीं भी जाने का अधिकार देती है तो इसके लिए उचित आवागमन के साधनों की व्यवस्था करना भी सरकार की जिम्मेदारी है। हालांकि बिडम्बना यह है कि देश के नीतिनिर्धारण करने वाले सर्वेक्षण जैसे जनगणना, एन.एस.एस. आदि में प्रवासी श्रमिक जो कि एक स्थान से दूसरे स्थानों पर जाकर काम करते हैं की संख्या को ठीक तरह से नहीं गिना जाता है। अतः स्पष्ट है कि इस वर्ग के लिए इसी प्रकार की नीतियां बनेंगी और व्यवस्थाओं का अभाव होगा। सरकार को देष के अन्दर हो रहे प्रवास के मुद्दे को गम्भीरता से लेना होगा। इनकी आवश्यकता को समझते हुए उनके लिए आवागमन की बेहतर व सुगम यात्रा के लिए प्रभावी नीति बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए प्राईवेट बस आपरेटरों पर नियंत्रण के लिए नियम बनाना जिसमें दूरी के आधार पर पहले ही किराया निर्धारित कर दिया जाए जिससे कि वे मौके का फायदा उठाकर किराया न बढा सकें। प्रसाशन को चुस्तदुरुस्त करने की आवश्यकता है जो कि क्षमता से अधिक सवारी ले जाने वाले वाहनों पर उचित कार्यवाही करके दुर्घटनाओं को रोक सके। त्यौहारों के समय के लिए सरकार द्वारा अधिक बसों की व्यवस्था करना जिससे प्रवासीयों को अपने घर जाने के लिए वाहनों की कभी न हो। रेल में पुलिस बल की व्यवस्था जिससे चोरी व लूटपाट की घटनाओं पर रोक लग सके। सरकार को देश की अर्थ व्यवस्था में अहम योगदान देने वाले इन प्रवासी श्रमिकों की सहूलियत के लिए कुछ कडे़ और आवश्यक कदम उठाने ही होंगे जिससे ये श्रमिक शहरों से गांवों के बीच आसानी से आवागमन कर सके और देश की प्रगति में अपना अमूल्य योगदान देते रहें।

सन्तोष पूनियां

प्रवासी संदर्भ केन्द्र, आजीविका ब्यूरो, उदयपुर

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5 Responses to Pahiyon pe Latakti Zindagi

  1. kamlesh Sharma says:

    It is an fine discription of a teasing issue of migrants.Migrants become a high risk group during their travelling. good one!
    kamlesh Sharma
    Aajeevika Bureau

  2. sanjay chittora says:

    Return from the destinations for migrant labour is always on high risks. Not only co-passenger but all the service provider are being ready to loot the migrant labour. then why not the bus operator?
    The returnee migrant labourers needs more attention from agencies like Aajeevika Bureau.

    Sanjay Chittora

  3. Zaineb Ali says:

    Interesting article Santosh,
    The maximum permissible number of passenger on a bus varies from 42 – 70 (including standing passengers) depending on the kind of bus. Your study shows an alarming 150 passengers on a bus, let alone migrants who travel in trucks.

    In 2007, an overloaded truck met with an accident in Rajsamand, claiming about 86 lives. Rajasthan Government then decided to launch a fortnight-long drive against overloading of buses and trucks and the vehicles plying illegally on the national and State highways. Mr. Kataria, who presided over a high level meeting around the same time, said a recommendation would be made to the Chief Minister to provide 1,000 new buses to the State Road Transport Corporation, while the Transport Department would allow more private vehicles to ply on roads. (Read more on http://www.hindu.com/2007/09/13/stories/2007091350670300.htm). Nothing really came out of it. In fact a similar accident happened in Bharatpur this month when an overloaded bus carrying more than 120 passengers overturned (http://daily.bhaskar.com/article/RAJ-JPR-four-pilgrims-killed-40-hurt-in-bharatpur-2195810.html).

    Transport Department, Goa had launched a 15 day drive against overloaded buses and found that 88% of their buses had more passengers on board than permitted. They collected a total fine of Rs 4.45 lakh in the last 15 days.

    I am yet to find an example where the state intervened in a rather sustainable way.

    Zaineb Ali

    • DKSS says:

      Hey Zaineb
      Very interesting links.
      Can you help me to understand how migrant helpline works? and how it is sustainable?
      Best.

  4. DKSS says:

    Hey Zaineb

    Do you address issues of Single Female Migrant Workers? If yes what and how?

    Best
    DKSS

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