रिश्तों में आती दरारें ! मजदूरों एवं ठेकेदारों के आपसी संबंधों पर एक विचार

कोई अंदर है क्या? क्या fशक्षा दे रहे है आप लोग मजदूरों को? इन्हें समझा रहे हैं या बरगला रहे हैं ? एक दिन सवेरे-सवेरे ही, अपनी कुंठा निकालते हुए एक सभ्य व्यक्ति दनदनाता हुआ आजीविका ब्यूरो के कार्यालय में घुसा। उसका आवेश, आक्रोष देख, उसे बिठाया गया तथा शांति से पूछा गया कि वह कौन है तथा क्या चाहता है? तेज आवाज में उसने फिर कहा – मैं  नाके पर खडे मजदूरों को कार्य पर ले जाने का पिछले एक घंटे से प्रयास कर रहा हॅू। यही नहीं पूरी मजदूरी देने को भी कह रहा हूँ, पर मजदूर है कि मेरे साथ जाने को तैयार ही नहीं है?

उसे बिठा कर पूरी बात समझने का प्रयास किया गया। जानना चाहा कि ऐसा क्यों हो रहा है कि एक गरीब मजदूर, जो कि गाव से शहर में मजदूरी के लिए आया है, अपनी दिहाडी के लिए श्रमिक नाके पर खडा भी है, परन्तु ठेकेदार के साथ जाने को तैयार नहीं है? उस दिन तो जैसे तैसे ठेकेदार को यह एहसास कराते हुए समझा दिया गया कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है, परन्तु यह वाकिया दिमाग को उद्वेलित कर गया, कई प्रकार के सवाल खडे कर गया,  क्या हो रहा है यह? एक तरफ जहां बाजार ठेकेदारी व्यवस्था को अधिक पुख्ता व व्यापक करती जा रही है, वहीं दूसरी ओर इनके संबंधों में क्यों कडवाहट व शंकाएं घुलती जा रही है? इन दोनों पक्षों के आपसी संबंधों में घटती यह विष्वसनीयता आखिर किसे लाभ पहॅुचायेगी? क्या इस बाबत कुछ रचनात्मक किया जा सकता है? इन सवालों पर विचार करते हुए महसूस हुआ कि श्रम दुनिया की इस अपरिहार्य व्यवस्था के संबंधों की कुछ गहराईयों व बारीकियों पर अपने विचार आप सबके सामने रखूं।

स्थानीय औेद्योगिक तथा सार्वजनिक हित परियोजनाओं की जरूरतों  के  लिए श्रमिकों को ढूढ़ना तथा नियुक्त करना अर्थ व्यवस्था का एक जरूरी पक्ष रहा है। गरीब, अनपढ़, अभावों में जी रहे समुदायों के लोग रोजगार के लिए हमेशा से मध्यस्थों यानि ठेकेदारों पर आश्रित रहे है। समय के साथ श्रम सोर्सिंग की यह जरूरत एक व्यवसायिक रूप लेती चली गई। श्रमिकों की बढ़ती माग की पूर्ति को मुनाफे का धन्धा समझते हुए कई संभा्रंत लोग भी इस कार्य में आगे आने लगे, जिनका मजदूरों से सीधा कोई संबंध नहीं था। मजदूर तक पहॅुचने के लिये उन्होने जरिया बनाया मजदूरों के बीच के कुछ थोडे-बहुत होषियार, बोलने वाले श्रमिकों को। कमीशन द्वारा कमानें का लालच तथा मालिकों के चहेते बनने की चाहत ने श्रमिकों की नियुक्ति की इस व्यवस्था को फलने फूलने दिया।

ऐसा नहीं है कि मजदूर तथा ठेकेदारों का यह रिष्ता पूर्व में बहुत संवेदनापूर्ण व मानवीय रहा हो। फिर भी इस संबंध में एक अनुशासन था, एक स्तर की आस्था तथा पारस्परिक विष्वास था। मजदूरों की जरूरतों की पूर्ति के स्त्रोत यही लोग थे। यही वजह थीं कि श्रमिक लंबी दूरिया विष्वास व भरोसे पर तय करते हुए उनके साथ कार्य करने आते थे।

परन्तु समय के साथ मोटे कमीशन की लालसा में ठेकेदारों ने अपने साथ के मजदूरों के संबंध व जरूरतों को ताक पर रख कर अपना मुनाफा बटोरना प्रमुख बना लिया — मालिक से मजदूरी ले कर मजदूरों को नहीं देना। मजदूरों की तय मजदूरी में से भी कई अलिखित व मनमर्जी कटौतियां कर लेना। अपने खर्चों को भी मजदूरों की मजदूरी से निकालना। मालिक से अपने व मजदूरों के वाजिब हकों तथा सामाजिक सुरक्षाओं की बात नहीं करना, ठेकेदारों की आम आदत बन गई। यदि मालिक से कभी मनमुटाव हुआ तो उसमें अपने को सुरक्षित निकाल कर चले जाना तथा साथ के श्रमिकों को राम भरोसे छोड देना। मजदूरों के मेहनत के भुगतान को भी लटाकाये रहना, आदि ऐसी मूल प्रवृत्तियां है जिससे आज श्रमिक व ठेकेदारों का आपसी संबंध व विष्वास डगमगा गया है।

सवाल यहां यह है कि लेबर रिक्रूटमेंट की स्थापित इस व्यवस्था में बढ़ रही विकृत्तियों का वास्तव में कौन जनक है? क्या ये ठेकेदार ही इन सबके लिए पूर्ण दोषी है? दोनों के बीच बढ़ता यह दुराव वास्तव में किसको लाभ पहॅुचा रहा है? क्या वर्तमान अर्थव्यवस्था में बढ़ती अनौपाचारिकता में ठेकेदारी व्यवस्था को निकाल फेकना संभव होगा? क्या स्वयं मजदूर अपने आप में अपनी जरूरतों पर रोजगार ढॅूढ़ पाने में सक्षम होगें? ये कुछ सवाल है जो कि मजदूरठेकेदार के संबंधों पर कार्य करने की अहमियत पर चिन्तन करने को विवश करते है। मुझे लगता है कि श्रम नियुक्ति का यह स्वरूप हमेशा विद्यमान रहेगा। इसके स्वरूप में जरूर कुछ सतही परिर्वर्तन हो जाये परन्तु इस व्यवस्था को आधुनिक अर्थव्यवस्था हमेशा कायम रखेगी।

हमने भी, यानी कि मजदूरों के साथ कार्य करने वाली संस्था, संगठन व व्यक्तियों ने, ठेकेदारों को हमेशा एक शोषक का प्रतिरूप मानते हुए उससे दूरियां रखी। हमने भी पूर्वाग्रह के साथ कार्य किया है। हमने ठेकेदारों व श्रमिकों को अलग-थलग कर श्रमिक सुधार की चेष्टाएं की हैं जो कि जाहिर है अधिक फलदायी व स्वस्थ नहीं रही है। शायद समय है कि हम इन दोनों को आपसी हितों में साझापन दिखाएं। एक दूसरे की बेहतरी के लिए मिलाएं।

मेरा विचार है कि हमें ठेकेदारों की इस जमात को अपने fशक्षण व जागरूकता के प्रयासों में शामिल करना चाहिए। ठेकेदारों तथा श्रमिकों की अन्तरनिर्भरता को सही तरीके से परिभाषित कर उन्हें एक दूसरे के पूरक की मानसिकता में ढ़ालना चाहिए। ठेकेदारों को यह समझाना व समझना जरूरी है कि आज उनका भी कारोबार व आमदनी प्रधान रूप से उसके साथ कार्य करने वाले मजदूरों की नियमित उपलब्धता पर निर्भर है। यदि वह उनके हितों व सुविधाओं का थोडा भी ध्यान रखते हैं, तथा संबंधों की यह विष्वसनीयता बनी रहती है तो उसकी अपनी रोजी रोटी ही अधिक पुख्ता होगी। मजदूरों की जरूरत मालिक को अधिक है। जरूरत के समय पर्याप्त मजदूर नहीं मिलना उसकी गरज है। ऐसे में ठेकेदार अपनी तथा अपने साथ के मजदूरों के जरूरतों व सुविधाओं की अधिक सौदेबाजी करने की स्थिति में है।

यह भी सत्य है कि लंबे समय से स्थापित इन व्यवस्था में यह सुधार आसान नहीं होगा। मानवीय स्वभाव हमे शक्तिशाली की ओर खिंचता है। उसकी ताकत व आभा से आसानी से नही निकल पाता। इसके विपरीत कमजोर गरीब मजदूरों की हितों व इच्छाओं को आसानी से रौंदा जा सकता है।

परन्तु समय के साथ नजरिये में बदलाव जरूरी है। जहा एक तरफ प्रशासनिक ढ़ांचा निवेषकों व मालिकों को अधिक सुविधाएं व संरक्षण दे कर मजबूत कर रहा है ऐसे में ठेकेदारों तथा मजदूरों के बीच विरोध व नफरत के साथ कार्य करने से किसी के भी, खासकर गरीब अनपढ़ श्रमिकों, के हितों की साधना तो नहीं होगी। ऐसे में इन दोनों के आपसी संबंधों में रचनात्मकता, संवेदना तथा पारस्परिक निर्भरता को प्रबल करने का पाठ पढ़ाया जाये तो संभवतः लाभकारी परिणाम भी सामने आयेगें।

– Krishnavatar Sharma, Aajeevika Bureau

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One Response to रिश्तों में आती दरारें ! मजदूरों एवं ठेकेदारों के आपसी संबंधों पर एक विचार

  1. Kamlesh Sharma says:

    Mazdoor aur contractors ke bich ye sambandho ka tana-bana kuch vaiasa hi hai jaise ek ghode aur ghass ke bich ka sambandh hai. contractor ke liye mazdoor ghas ke barabar hai, uske prati samvendna dikha kar vah parmarth kamane ka jokhim nahi uthana chahta.
    very well written article.

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