खोता बचपन

चना जोर गरम बाबू मैं लायी मजेदार, चना जोर गरम बाबू मैं लायी मजेदार।
मेरा चना है सबसे आला इसमें डाला गरम मसाला, जो देखे इसको हो मतवाला।
इसको खाऐ हर दिलवाला, ओ इसको खाऐ हर दिलवाला।
चना जोर गरम बाबू मैं लायी मजेदार, चना जोर गरम बाबू मैं लायी मजेदार।

यह गाना फिल्म क्रांन्ति का है जिसमें चना झोर के स्वाद का बहुत ही चटपटे शब्दों में बखान किया गया है। परन्तु आगे मैं जो कहानी बताने जा रहा हूं उसमें इस चटपटे स्वाद ने एक बच्चे के बचपन को फीका बना दिया है। यह तो केवल एक बच्चे की घटना है और न जाने कितने बच्चों का बचपन इस प्रकार से भेंट चढ़ रहा है।

चना जोर गरम, चटपटा चना खा लो यह आवाज सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। उदयपुर की फतहसागर झील किनारे जाते ही आपको ऐसी अनेकों आवाजें सुनने को मिलेंगी। इनमें से किसी से भी पूछो कि कहां के रहने वाले हो हमेशा एक ही जबाव मिलेगा उत्तरप्रदेश! इन्हीं में से एक लड़का है सोनू। सोनू 11 वर्ष का है और अपने पूरे परिवार के साथ उदयपुर में रहता है। सोनू चार भाई बहनों में सबसे बड़ा है। उसने बताया कि लगभग 35 साल पहले उसके नाना यहां पर आए थे और उसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों को लाते गए। सोनू का परिवार अभी यहां पर एक कच्ची बस्ती में किराए पर रहता है और वे साल में कम से कम दो बार अपने गांव उत्तरप्रदेश जाते हैं। सोनू ने बताया कि ”अभी नाना बुढ़ापे के कारण फेरी नहीं लगा पाते हैं और मामा आवारागर्दी में घूमता रहता है। और मेरे पिताजी को दारू पीने की आदत है तो वो जो कमाता है उसे रात को दारू पीने में खर्च कर देता है। तो एक तरह से मैं और मेरी मां जो कि घरों में झाडू-पोचा, बर्तन धोने का काम करती है, ही घर का खर्च चलाते हैं। इस मंहगाई में घर चलाना बड़ा मुष्किल है साहब।“ सोनू की बातों से ही उसकी आमदनी पर उस परिवार की आर्थिक निर्भरता का अहसास हो रहा था। मुझे लगा इसी जिम्मेदारी के कारण उसने पढ़ाई छोड़कर काम करने का विकल्प चुना। पर हकीकत तो कुछ और ही थी।

निर्बाध रूप से बात करने वाला सोनू पढ़ाई की बात आते ही यकायक ठिठका और थोड़ा गम्भीर होते हुए बोला ”साहब मेरा बाप एक जानवर जैसा है जब रात को दारू पी कर आता है और जब मेरी मां कुछ भी कहती है तो वह मां और हम सबको बहुत मारता है। उसने ही मेरी पढ़ाई छुड़वाई है। कहता है कि पढ़कर कौनसा कलक्टर बनेगा काम कर जिससे घर में कुछ पैसा आए।“ रोज-रोज की लड़ाई और घर की स्थिति को देखते हुए सोनू ने अपनी मां को कहां कि वह भी फेरी लगाऐगा और स्कूल जाना छोड़ देगा। और सोनू ने तीसरी कक्षा में से पढ़ाई छोड दी। उसकी मजबूर मां के सामने भी और कोई चारा न था तो उसने उसकी बात मान ली और इस देश के एक और मासूम के हाथ में कलम के स्थान पर चना जोर की टोकरी आ गई।

सोनू से जब मैं बात कर रहा था तो वह बड़ी स्पष्टता और निर्भीकता से जबाव दे रहा था। उसी समय मुझे उदयपुर और उसके आस-पास के आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों की याद आई कि अगर उनसे कोई ऐसे सवाल करें तो अव्बल तो वह बात ही नहीं करते हैं और करेंगे भी तो बड़े संकोच के साथ। मैं यह सोच ही रहा था कि इतने में सोनू ने मुझसे पूछा कि साहब आप ये सब क्यों पूछ रहे हो? जब मैंने उसे आजीविका ब्यूरो के काम के बारे में बताया कि हम बाहर जाने वाले श्रमिकों के साथ होने वाली समस्याओं को कम करने के लिए काम करते हैं। मैंने उसे सभी सेवाओं के बारे में जानकारी दी। सारी सेवाओं के बारे में सुनने के बाद वह बोला साहब ”बैंक खाते की बात एकदम सही है दिनभर के कमाए पैसे अगर बैंक में जमा कर दो तो फिर तो मेरा बाप भी हमसे दारू के लिए पैसे नहीं छीन सकता है। यह मैं मेरी मां को बताउंगा।“ इस बीच मैं सोनू से बात करते-करते दो बार में बीस रुपये के चने खा चुका था।

इसी प्रकार का एक और वाकिया देखा एक और बचपन के साथ खिलवाड़! मेरे घर से कार्यालय के रास्ते में एक भवन निर्माण का कार्य चल रहा है। वहां पर देखा कि एक महिला मजदूर अपने दो बच्चों छोटे के साथ मजदूरी कार्य पर लगी हुई थी। छोटा बच्चा जो लगभग दो वर्ष का होगा पास मैं बैठा-बैठा मिट्टी में खेल रहा था और उसका बडा भाई जो कि 6-7 वर्ष का होगा अपने सिर पर पर टोकरी रखकर उसमें थोड़ा-थोड़ा सीमेंट ला रहा था। वह इस कार्य में बड़ा ही खुश नजर आ रहा था। शायद अभी उसके लिए यही खेल था, परन्तु उस मासूम को क्या पता कि यह उसका ट्रेनिंग स्कूल है और मजदूरी ही उसका सम्भावित कार्य हो सकता है। जैसे ही मैं टोकरी के साथ उसकी फोटो खींचने लगा तो उसकी मां ने झट से उससे टोकरी छीनीं और कहने लगी कि यह तो वैसे ही खेल रहा है, काम करने नहीं आया है। शायद वह जानती थी कि छोटे बच्चों से काम करवाना कानूनन जुर्म है, और वह मुझे कोई सरकारी आदमी समझ रही थी। उसने उस बच्चे को डाटते हुए कहा कि ”अटै बैट भाईनै हमाल यो धूला मै रमड़ी रयौ है।“ (यहां पर बैठ और अपने छोटे भाई को संभाल यह मिट्टी में खोल रहा है।)

उस मां की भी मजबूरी है, उसे मजदूरी पर जाना है और घर पर बच्चों को संभालने वाला कोई नहीं होने के कारण बच्चों को भी साथ लाना पड़ता है। हमारे देश में कार्य स्थल पर छोटे बच्चों के लिए क्रेच (छोटे बच्चों को संभालने की व्यवस्था) की कोई सुविधा नहीं है। जबकि कानूनन यह जिम्मेदारी नियोक्ता की होती है। बडे शहरों में तो भी कुछ स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा कहीं-कहीं इस प्रकार की सुविधाऐं उपलब्ध कराई जाती हैं, हालांकि वह भी ऊंट के मूंह में जीरा के समान ही है। परन्तु छोटे शहरों के लिए तो इस प्रकार की सुविधाऐं अभी दूर की कौड़ी नजर आती हैं। इस प्रकार की हकीकतों से सामना होने पर अहसास होता है कि हमारे देश की सरकार के आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरने, इंडि़या शाइनिंग, भारत निर्माण आदि के राग अलापने के दावे झूठे नजर आते हैं।

सन्तोष पूनियां
प्रवासी संदर्भ केन्द्र
आजीविका ब्यूरो उदयपुर

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One Response to खोता बचपन

  1. Divya Varma says:

    Very moving piece Santoshji. Sadly, one has not come across many effective models to tackle the root causes behind child labour. The reasons like poverty, big family size, dismal quality of education etc. are intertwined in such a complicated way that we are seldom able to do anything beyond mere exit- level interventions.

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