नाम से बड़ा काम

मंगीलाल कुमावत, काम इंदौर में नमकीन कारीगर, पुरखे मकान बनाने का काम करते थे। भंवरलाल लौहार, काम मार्बल फिटिंग, पुरखे लौहे के काम में थे। चुन्नीलाल सुथार, काम मार्बल फिटिंग, पुरखे लकड़ी का काम करते थे और मांगीलाल प्रजापत, काम औरंगाबाद में आईसक्रीम लारीयों का, पुरखे ईंटे बनाने का काम करते थे। कुछ इसी तरह के कार्य संयोजन अब देखने को मिलते हैं। पुश्तैनी काम खत्म होते जा रहे हैं। कार्य में अवसर आदमी को उस काम की ओर खींच ले जाते हैं। प्रवास की अधिकता ने भी व्यवसाय को आधार प्रदान किया है।

जहां पुरातनकाल में राजपूतों का प्रबंधन पर एकाधिकार था, वहीं अब वे किसी के अधीन भी काम को तैयार हैं। राजसमंद के राजपूत मुम्बई में हार्डवेयर की दुकानों पर, भीम-ब्यावर के रावत राजपूत अहमदाबाद में रेस्टोरेंट में वेटरों के तौर पर एवं गोगुंदा के खरवड़ चदाणा राजपूत उदयपुर में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में आपको मिल जाएंगे।

इसी प्रकार ब्राहम्णों का काम पूजा-पाठ था, किन्तु कई ब्राहम्ण गुजरात में रसौईये हैं और कईयों ने अपनी होटले खोल रखी हैं। इसी प्रकार अहमदाबाद में एक बहुत बड़ा समूह इलेक्ट्रिक के काम में व्यस्त है। पालीवाल ब्राहम्णों का इंदौर में दूध सप्लाई पर एकाधिकार है। लगभग सभी गलियों में आपको इनकी डेयरीयां मिल जाएंगी। इसी प्रकार कुछ ब्राहम्ण मुम्बई में मावा बेचने का काम भी करते हैं।

पटेल और पाटीदार जो कि आदिकाल से खेती के काम में माहिर माने जाते हैं, ने अहमदाबाद, मुम्बई और बैंगलोर जैसे शहरों में चाय की थडि़यां बना रखी हैं और इस काम में महारत हासिल की है।

जैन समाज की बात करें तो प्रवास ने इन जाने माने व्यवसायियों को लून-तेल से उठाकर कबाड़ के धंधे का शहंशाह बना दिया है। ये समूह में भी आपको मुम्बई की बोरीवली, मलाड़ और गोरेगांव में कबाड़ के गोदाम चलाते मिल जाएंगे। इसी प्रकार कई व्यवसायी सूरत और चैन्नई में साडि़यों के काम करते मिल जाते हैं। इनके पुरखे गांव में साहूकारी किया करते थे।

एक और समाज जिनके पुरखे लोहे का काम करते थे, ने पूरी तरह अपने आप को लकड़ी के काम में झोंक दिया है। लुहार आज अपना काम छोड़ कर सभी प्रकार के काम कर रहें हैं।

उदयपुर में आस पास के गांव के माली समाज के प्लंबर जो कि मकानों में नल फिटिंग का काम करते मिलते हैं, उनके पुरखे मंदिरों के बाहर फूल बेचा करते थे, या महिलाएं माला बनाने का काम करती थीं।

अहमदाबाद में यदि आप कबाड़ के धंधे पर नजर ड़ालें तो आप वहां भीलवाड़ा के कुमावतों एवं प्रजापतों को पाएंगे, जिनके पुरखे पहले मकान एवं ईंट बनाने का काम किया करते थे।

जो बचे हैं वो हैं हमारे दक्षिणी राजस्थान के भील, गमेती और मीणा, जिन्हें किसी भी व्यवसाय में एकाधिकार बनाने का मौका आज तक नहीं मिला है। थोड़े बहुत साथी मेवाड़ भील कोर में डंडे चलाते जरूर दिख जाया करते थे, किन्तु समय के साथ यहां भी प्रतियोगिता ने इन्हे पछाड़ दिया। ये आदिवासी भाई-बहन उक्त सभी प्रकार के व्यवसायों में हैल्पर की तरह काम करते मिल जाते हैं। रोजगार पर एकाधिकार बनाना इस समाज की सबसे बड़ी चुनौती रही है। पहले किसान कहलाने वाले इन भाईयों को अब पहाड़ी भूभागों के कारण खेती का स्वामी कहलाने की भी गुंजाईश नहीं बची है।

आज भी आदिवासी समुदाय का युवा श्रम बाजार में मजदूर या हेल्पर कहलाने के लिए बाध्य है। चाहे वो अनपढ़ हो या पढ़ा-लिखा, आदिवासी होने के कारण सभी समुदाय उसे केवल एक मजदूर की ही तरह अपनाने को तैयार है, यदि कभी कभार वो किसी व्यवसाय पर अधिकार जमाता दिखता भी है तो समाज को उसे इस रूप में स्वीकारने में संशय होता है।

मैं उदयपुर में आजीविका ब्यूरो नामक संस्था में इसी प्रकार के युवाओं के कौषल संवर्धन के कार्य से जुड़ा हुआ हॅू। स्टेप एकेडेमी नाम की संस्था में इन आदिवासी एवं आर्थिक दृष्टि से कमजोर तबकों के युवाओं को तकनीकी एवं जीवनकौषल के सम्मिलित प्रशिक्षण से नये कार्यों में कारीगर या स्वामित्व के सफर की शुरूआत करवाने का प्रयास कर रहा हॅू। ये अनुभव आए दिन देखने को मिलते हैं कि सामान्य वर्ग के श्रमिकों ने तो बाजार को प्रभावित करते हुए अपने नये काम-धंधे जमा लिए हैं, उनकी नये बाजार में घुसपैठ यदि अनायास हो भी जाती है तो उनकी स्वीकृति में ज्यादा समय नहीं लगता और सवाल नहीं उठते। किन्तु हमारा आदिवासी युवा यदि ये सब करने को तत्पर भी हो, सामान्यतः बाजार उसके काम से बड़ा, उसका नाम पहले पूछता है और उसे अपने काम में बढ़ोतरी करने के लिए समय को धकेलने की मेहनत करनी पड़ रही है।

– Sanjay Chittora, Aajeevika Bureau

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One Response to नाम से बड़ा काम

  1. Ramprsad Gurjar, Jaipur says:

    very informative blog, thnx to sanjay ji

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