शिवजी – हीरो या विलेन ???

बुलन्द आवाज, गजब की फुर्ती और आत्मविश्वास से लवरेज चेहरे को देखकर एक बार तो कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता है। यह शख्सियत है शिवजी राम बैरड़, जो कि बालोतरा में कारखाना श्रमिकों के संघर्ष के साथी हैं। लोक कल्याण संस्थान, बायतु ने जब बालोतरा में प्रवासी श्रमिकों के साथ कार्य की शुरूआत की थी तो वहां कार्यरत श्रमिकों व टीम के सदस्यों से शिवजी के बारे में काफी सुनने को मिलता था। इसमें कई सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक दोनों तरह की बातें सुनने में आईं। इन सब बातों को सुनकर शिवजी से मिलने की बहुत प्रबल इच्छा हुई।

श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केन्द्र, बालोतरा ने कपड़ा छपाई व धुलाई श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य जांच व उपचार शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर का आयोजन एक बैरे (जहां पर छपाई से पहले कपडे की धुलाई होती है) पर ही किया गया। जब हम इस बैरे पर पहुंचे तो 50-55 श्रमिकों को बिठाकर अधेड़ उम्र, छरहरे बदन का एक शख्स श्रमिकों से वार्ता कर रहा था। सभी श्रमिक बड़े ही गौर से उसकी बातें सुन रहे थे। इनके बीच में मजदूरी दर और कपड़े की नाप को लेकर चर्चा चल रही थी। चूंकि शिवजी के बारे में मैंने पहले काफी सुन रखा था इसलिए उनके बात करने के तरीके से मुझे उनको पहचानने में देर न लगी और जब मैंने टीम के सदस्य से उनका नाम पूछा तो पक्का हो गया कि मेरा अन्दाजा सही था।

शिवजी राम ने भी अपने व्यावसायिक जीवन की शुरूआत इन्हीं कारखानों में एक श्रमिक के रूप में की। परन्तु वे शुरू से ही एक संघर्षशील और आगे चलने वाले व्यक्ति थे। कभी भी किसी श्रमिक के साथ कुछ गलत होता तो बिना कुछ आगा पीछा सोचे वे उसका साथ देते थे, चाहे उसके लिए उन्हें कारखाना मालिक से ही क्यों न लड़ना पड़े। और कई बार उन्हें इस तरह की लड़ाईयां लड़ीं। उनकी इसी छवि के चलते श्रमिक उनका साथ देने लगे और श्रमिकों के साथ किसी भी प्रकार के विवाद, झगड़े और अत्याचार के समय श्रमिक शिवजी के पास आने लगे। धीरे-धीरे शिवजी का समय अपने काम के लिए कम और इस प्रकार के मामलों के लिए ज्यादा जाने लगा। इसी के चलते वो अपने काम पर ध्यान नहीं दे पाते थे, फलस्वरूप मालिकों से अनबन रहने लगी। यह बात अलग है कि शिवजी अपने काम में हुए नुकसान की भरपाई इन मामलों को निपटाने में कर लेते थे। वे मालिक और श्रमिक से थोड़ा-थोड़ा पैसा लेते थे।

लगभग 10 वर्ष पूर्व शिवजी ने कारखानों में मजदूरी करने वाला अपना काम पूरी तरह से छोड़ दिया और श्रमिकों के विवादों को सुलझाने में लग गए। उन्होंने अनुभव किया कि 60-70 हजार श्रमिकों के इस बाजार में मालिकों के साथ झगड़े व दुर्घटनाऐं होती रहती हैं। और इनको सुलझाने वाले नहीं होने के कारण मालिक मजदूरों को या तो कुछ नहीं देते हैं या थोड़ा बहुत पैसा देकर मामला दबा देते हैं। शिवजी ने यहां पर एक अनौपचारिक सा संगठन बनाया और अपने साथ 8-10 पुराने श्रमिकों को भी मिला लिया। अब शिवजी श्रमिकों की वेतन वृद्धि, मुआवजा व लेन-देन के मामलों को सुलझाने का एक केन्द्र बन गए हैं। ये पिछले सात वर्ष से अपने साथियों की मदद से हर वर्ष जुलाई के महीने में चार से पांच हजार श्रमिकों को इकट्ठा करते हैं और मजदूरी में बढ़ोतरी होने तक हड़ताल पर बैठे रहते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन्हें प्रत्येक वर्ष सफलता मिल जाती है। इस कार्य के जरिए श्रमिकों में शिवजी का विश्वास और बढ़ गया और मालिकों को भी समझ में आ गया कि इनके कहने पर श्रमिक काम बन्द कर देते हैं। इसके चलते मालिक शिवजी के कहने पर पैसे देने को तैयार हो जाते हैं। यह बात अलग है कि शिवजी अब इस कार्य के लिए शुल्क वसूल करते हैं। इन्होंने 100 रूपये प्रति श्रमिक से शुरूआत की जो कि अब 500 रूपये प्रति श्रमिक हो गया है। शुल्क वसूली में 8-10 श्रमिकों का जो समूह है वो इनकी मदद करता है।

श्रमिकों से जब इसके बारे में बात की तो उनका मानना था कि हां यह बात सही है कि हमें प्रतिवर्ष 500 रूपये शिवजी को देने पड़ते हैं। पर यह बात भी सही है कि वो हमारे लिए आधी रात को भी तैयार रहते हैं। ये सेठिया हमारी एक नहीं सुनते हैं पर जैसे ही शिवजी आते हैं तो हमारा पक्ष सुनते हैं। इनमें से ही कुछ श्रमिकों का यह भी कहना है कि शिवजी सेठों से भी पैसे खाते हैं और हमसे भी। किसी भी दुर्घटना व विवाद में जितना मुआवजा मिलना चाहिए उससे कम मिलता है और कुछ पैसा शिवजी सेठ से खुद ले लेते हैं। रेट बढ़ाने में भी यही खेल है। प्रतिवर्ष रेट तो बढ़ती है पर साथ ही कपड़े की नाप भी बढ़ जाती है जिससे कि श्रमिकों के काम के घन्टे लगातार बढ़ते जा रहे हैं। एक बार तो लगा कि बहुत अच्छे कार्य की शुरूआत हुई परन्तु किसी के प्रति जिम्मेदार नहीं होने के कारण और पैसे के लालच में शिवजी के मन में भी विकृति आ गई। एक समय था जब शिवजी ने श्रमिकों के दुख को समझते हुए अपना काम छोडकर उनकी मदद के लिए कार्य की शुरूआत की और आज वे ही श्रमिक उनके लिए कमाई का जरिया बन गए।

शिवजी अकेले ऐसे शख्स नहीं हैं जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ के कारण मजदूरों को ही कमाई का जरिया बनाया है। आप अगर श्रमिकों के साथ कार्य करने वाली यूनियनों व संगठनों के इतिहास पर नजर डालेंगे तो कई इस प्रकार के वाकिये ज़हन में आते हैं। दत्ता सावंत जो कि 1970 के दशक में मुम्बई मिल मजदूरों की अखण्ड़ हडताल का चेहरा थे की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। मजदूरों ने भरोसा कर उनको अपना नेता चुना और उनके नेतृत्व में हड़ताल कर अपनी मांगे मनवाने के लिए काम बन्द कर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। यह हड़ताल सरकार और मिल मालिकों को इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने मजदूरों की मांगे मानने के बजाए मिलों को ही बन्द कर दिया या अन्य स्थानों पर स्थानान्तरित कर दिया। मिल मालिकों के इस एक फैसले से न जाने कितने ही मजदूर और उनके परिवार बेरोजगारी की अग्नि में स्वाहा हो गए। इस हड़लात से मजदूरों के नेता रूप में दुनियां की नजर में आए दत्ता सावंत तो बाद में सांसद बनकर अपने राजनैतिक सफर की नैया पर सवार हो गए परन्तु इससे प्रभावित हुए मजदूरों की खोज खबर किसी ने नहीं ली। खबरें तो यह भी आई कि दत्ता सावंत ने मिल मालिकों के एक वर्ग विशेष को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से यह हड़ताल की थी। अतः यह पूरी तरह से प्रायोजित हड़ताल थी जिसमें मजदूरों द्वारा अपना मसीहा माने जाने वाले शख्स द्वारा ही उनके भरोसे के साथ खिलवाड़ किया गया था।

माक्र्सवादी विचारधारा के समर्थक वामपंथी दलों के बारे में भी तृणमूल के सांसद कबीर सुमन ने “टाइम्स आॅफ इंडिया” को हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में कहा कि “वामपंथी दल जो कि मजदूर वर्ग के हितैशी माने जाते हैं ने शुरू के आठ-दस साल अच्छा कार्य किया परन्तु बाद में शक्ति और व्यक्तिगत हितों के चलते वे अपनी विचारधारा से भटक गए।” किसी व्यक्ति, यूनियन/श्रमिक संगठन या पार्टी का अपने निजी स्वार्थ के लिए मजदूरों के साथ खिलवाड़ करना कोई नई बात नहीं हैं। परन्तु यहां पर बडा सवाल यह है कि मजदूर जो कि पहले से ही दयनीय परिस्थितियों में काम कर अपने हक व अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए अपनी स्थिति से संघर्ष कर रहा है; और बेहतरी का सपना लिए अपने नेता या संगठन पर भरोसा कर उसका अन्धानुकरण करता है को क्या हमेशा इसी प्रकार धोखा मिलता रहेगा? क्या उनकी ताकत और संख्या बल के आधार पर श्रमिक नेता या संगठन इसी प्रकार अपने निजी स्वार्थ पूरे करते रहेंगे? आखिर कब तक???

– Santosh Poonia, Aajeevika Bureau

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