कब आएगा गोपाल बाग

छः छोटे छोटे बच्चों का पिता, पत्नी और बुढ़े मां बाप का ईकलौता कमाउ गोपाल बाग पिछले सात महीनों से गायब है। वो दादन में गया है। यहां दादन का अर्थ है, एडवांस लेकर गया एक श्रमिक, जो कि प्री-पेड़ मजदूरी का एक और रूप है। यहां उत्तरी और पष्चिम उड़ीसा में एड़वांस लेकर काम करने का नाम ही दादन है। ये श्रमिक मुख्य रूप र्से इंटभट्ठों में मजदूरी करने जाते हैं और इसके बदले 15 से 35 हजार तक एडवांस लेते हैं। छः से सात माह के लिए काम पर जाते हैं, इन श्रमिकों में अधिकांशतः परिवार, महिला और बच्चे भी… के साथ प्रवास होता है।

गोपाल बाग भी इंटभट्ठे पर दादन मजदूरी करने गया, वह अकेला गया था, किन्तु लौटा नहीं। घर और गांव वालों को अंदेशा है कि दलाल ने उसे बंधक बना लिया है। एक बार फोन पर बात हुई थी, तो उसने कहा था, कि उसको वहां से ले जाओ। देबदत्ता क्लब संस्थान के सलाहकार समिति के सदस्य एवं मिडिया से जुडे़ संजीब मिश्रा ने बताया कि हमने गोपाल को खोजने की बहुत कोशिश की, उसके दलाल ने आंध्रप्रदेश में जो जगह बताई, वहां तक भी जाकर आए। हमें गलत जगह बुला लिया, वहां ना तो गोपाल मिला और ना ही वो दलाल। पुलिस में भी गये, दलाल और गोपाल दोनों की फोटो भी बताई, लेकिन अभी तक तो उसका कुछ भी पता नहीं चल पा रहा है।

उडीसा के बरगढ़ जिले की गायसिलेट ब्लॅाक में कार्यरत देबदत्ता क्लब  के साथियों के साथ दिनांक 7 मार्च को जब मैं गोपाल बाग के घर गया तो दुःख से कुछ बोल ही नहीं पाया। लगभग 3 से 7 साल के छः में से दो बच्चों की आंखे खराब है, धुंधला सा ही देख पाते हैं। संस्थान के साथियों ने उसके बुढ़े मां-बाप के लिए मधुबाबु वृद्वावस्था पेंशन के फार्म भरवाए। हमारे साथ ही गये ब्लॅाक के एस.ई.ओ. सोशल एक्सटेंशन आफिसर ने उनके ये पेंशन फार्म भरे। आफिसर ने बताया कि दो महीनों में ये कार्यवाही हो जाएगी और इन्हें 300-300 रुपए मासिक की पेंशन शुरू हो जाएगी। बच्चों को भी पास ही एक बाल कल्याण आश्रम में भेजने की बात हो रही थी, जहां उनका पालन-पोषण अच्छी प्रकार हो पाएगा।

लंबी दूरी में प्रवास में श्रमिकों के मिसिंग केसेस़ बड़ी संख्या में देखने में मिल रहे हैं, दिनांक 2 मार्च को जब मैं उड़ीसा के कोस्टल एरिया में खुर्दा जिले की एक तहसील बालीपटना के मजीहरा गांव में था, तब भी वहां एक जवान लड़का प्रवास पर केरल के कोट्टयम जिले में काम पर जाते समय रेल से उतर कर कहीं चला गया। साथ में गये दोस्तों ने बहुत खोजने की कोशिश की, लेकिन पिछले दो महीनों से उसका कोई अता-पता नहीं है। मां-बाप इसी आशा में है कि वो आ जाएगा। पुलिस को खबर नहीं की जाती। पता नहीं किस चमत्कार के इंतजार में हैं, ये मां-बाप। इसी प्रकार इसी तहसील के अडाएंचा पंचायत के देउलधरपुर गांव का एक केस है। दो छोटे बच्चों, पत्नी और बुढ़े मां-बाप को अकेला छोड़ कर एक प्रवासी कटक शहर में पान सप्लाई करने गया, 3 साल हो गये, वापस ही नहीं आया। एक बार उसने 3500 रुपए घर भी भेजे थे, किन्तु उस बात को भी ढ़ाई साल से उपर हो गये। बाप को आंखों से कुछ दिखता नहीं, पत्नी मजदूरी कर के घर चला रही है। बच्चों को देखकर ऐसा लगता कि प्रवास ने इनका सब कुछ छीन लिया। इस केस में भी अभी तक पुलिस को कुछ भी खबर नहीं की गई है। हमारे साथ गये पंचायत समिति सदस्य ने हमें विश्वास दिलाया है कि वो जल्दी ही पुलिस कार्यवाही करेंगे। कार्यकर्ता ने कहा कि वृ़द्ध की भी आंख का आपरेशन हम करवाएंगे।

ये केस श्रमिक केन्द्रों द्वारा किये जा रहे लीगल अवेरनेस केंप के दौरान सामने आ रहे हैं। हमारे केन्द्रों के कार्यकर्ता इस केसों को सामने ला रहें हैं, परन्तु इन दर्दनाक कहानियों का अंत क्या होगा, कहना बहुत ही कठिन है, घर वालों को कुछ पता नहीं होता, कहां गये हैं, ये श्रमिक। बस वे बताते हैं, आंध्रा, केरल गये हैं। काश वे रजिस्ट्रेशन करवा कर गये होते…. काश! पता नहीं कब लौट पाएंगे ये प्रवासी श्रमिक….

Sanjay Chittora, Aajeevika Bureau

(Sanjay leads the skill training and placement work at Aajeevika. At present, he is working in Odisha with some organizations dedicated to the cause of migration. This piece picks a leaf from his Odisha diary)

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2 Responses to कब आएगा गोपाल बाग

  1. Santosh Poonia says:

    Dear Sanjay ji,

    The story is very terrible and many more stories like that, happened with migrants. It’ is high possibility behind the picture the organ trafficking gang active and they target that type of migrant. The blog is very telling and well captured.

    Keep it up !!!

    Regards, Santosh

  2. Divya Varma says:

    Very moving and poignant story, Sanjayji. Terribly sad situation; one really wonders what would be the end to all of this…

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