ये रिश्ता क्या कहलाता है…

तुलसीराम अपने कुछ साथियों के साथ जब श्रमिक केन्द्र के स्टाल पर पंहुचा तो बहुत संभल कर बात कर रहा था। उसे प्रवासी श्रमिक कार्ड का फार्म भरवाने से पहले कई बार समझाना पडा। वह चाह कर भी सबसे पहले कार्ड का आवेदन नहीं कर रहा था। सुबह 10.30 बजे वह पहली बार स्टाल पर पंहुचा पर कार्ड के लिए आवेदन उसने 3.00 बजे भरवाया। इस बीच उसने तीन चक्कर और लगाए। बडे संशय के साथ और लोगों को केन्द्र की सेवाओं से जुडते हुए देखा। उसके आश्वस्त होने का शायद यही तरीका था।

तीन बजे जब वह स्टाल पर पंहुचा तो उसके साथ तीन और लोग थे जो आकर ज्यादा आत्म-विश्वास के साथ सवाल-जबाव करने लगे। उन्होंने सब तरह के सवाल पूछे और मैनें अपनी पूरी समझ के साथ जबाव दिये। हर सवाल का जबाव तुलसीराम इतने ध्यान से सुन रहा था जैसे ये सब सवाल वह स्वयं पूछना चाहता हो । तीन में से एक ने पूछा – आप मजदूरों की मजदूरी दिलवाने का काम भी करते हो? इस सवाल पर पूछने वाले से भी ज्यादा रुचिवान तुलसीराम था। उसके चेहरे से यह साफ झलक रहा था। मैनें जबाव दिया- हां और तुलसीराम की ओर देखा। मुझे समझ आ गया कि तुलसीराम का कोई ऐसा ही विवाद है किन्तु सुबह से लेकर अब तक उधेडबुन में था कि वह अपना विवाद हमें बताएं तो बताए कैसे?

खैर, अब सीधे तुलसीराम से बात शुरु हो गई। उससे विवाद को समझने में बहुत समय लगा। हर सवाल का जबाव वह बहुत सोचने के बाद दे रहा था। धीरे-धीरे समझ आया कि उसकी झिझक का बडा कारण उसका विवाद और उसमें उसके रिश्तेदारों का जुडा होना था। उसने अपने साथ धोखाधडी करने वाले रिश्तेदार का नाम बडी मुश्किल से बताया।

उसका विवाद बैंगलोर में काम करते हुए पैदा हुआ था। कुछ माह तक वह अपने किसी रिश्तेदार के साथ बैंगलोर में काम कर रहा था। खर्चे-पानी का पैसा उसे बराबर मिलता रहा लेकिन जब सारा हिसाब एक साथ किया तो कुल 20,000 रुपये तुलसीराम को लेने निकले। रिश्तेदार ने तुलसीराम को यह कह कर गांव भेज दिया कि यह पैसा वह गांव में उसके पास पंहुचा देगा।

तीन साल हो गये । न पैसा आया न पैसे की बात । तुलसीराम किसी को भी यह बात बताते हुए झिझकता है। उसे डर है कि कहीं उसके रिश्ते न बिगड जाये। रिश्तों की गरिमा की खातिर वह तीन साल चुप रहा। मैंने उससे एक सवाल पूछा – अच्छा पैसा तो तुम तक नहीं पंहुचा लेकिन क्या वो रिश्तेदार तमसे कभी आकर मिला? तुलसीराम ने कहा- नहीं, मैनें कई बार उसे याद दिलाया लेकिन हर बार वह कहकर टाल गया कि हां इस बार पैसा दे दूंगा।

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बातों ही बातों में तुलसीराम को यह समझ आ गया कि रिश्तेदारी तो दोनों तरफ से निभाई जाती है। केवल एक व्यक्ति उसे चला कर रखना चाहे तो वह ज्यादा दूर नहीं जाती। तुलसीराम ने थोडी-सी हिम्मत दिखाई । श्रमिक केन्द्र ने विपक्षी को एक फोन घनघनाया। परिणाम- 15 दिन में तीन साल से अटकी मजदूरी तुलसीराम के हाथ में थी।

ये केवल एक तुलसीराम की कहानी नहीं है। कितने ही लोग जो अपने रिश्तेदारों की मदद से शहरों में काम करने जाते है,उनके पास काम करते है और मजदूरी के हिसाब के समय समस्याओं में घिर जाते है। ये एक और रुप है काम के अनौपचारिक सम्बन्धों का। रिश्तेदार है तो कौन पहले लिखित अनुबन्ध करें ? कौन लिखित हिसाब करें ? पर मजदूरों की दृष्टिकोण से तो रिश्तेदारी कई बार बडी भारी पडती है।

– मोहन लाल गमेती, सलूम्बर केन्द्र, आजीविका ब्यूरो

(Mohan ji is one of the oldest members of Aajeevika team and works very closely with migrants in the field. Being from the same community he is able to appreciate the predicaments faced by workers and the challenges associated with the socially networked migration. At Aajeevika, he started his career at its oldest center at Gogunda and is now based in Salumbar)

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One Response to ये रिश्ता क्या कहलाता है…

  1. Santosh Poonia says:

    Dear Mohan ji,

    Thanks for writing your experiences on the blog. Ye aapki parkhi nazaro ka kamal hai ki aapne Tulsi Ram ke hav-bhav se pahchan liya ki uske sath koi dhokha hua hai. We will waiting more stories from your and other team members field experiences. Well captured piece Mohan ji.

    Best, Santosh

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