A letter to Aajeevika team…

श्रमिक साथियों,

आप व आपकी टीम को मजदूर दिवस की हार्दिक शुभकामनाए !

आप सोच रहे होगें कि आज मैं आपको ऐसा (श्रमिक) क्यो बोल रहा हूं ? चलो आप सब शायद इससे थोडा IMG_4675कम सहमत हो लेकिन आज के दिन मै अपने आप को एक श्रमिक मानते हुए आप सबसे कुछ कहना चाहूंगा।

तो साथियों मै तो एक श्रमिक हूं और किसी ना किसी रूप में श्रम करता हूं। स्वयं श्रमिक होने के साथ साथ मैं उस जरूरतमंद वर्ग को सलाह, सुरक्षा व समाधान प्रदान करने का प्रयास करता हूं जिसे वर्तमान में समाज द्वारा अधिकतर मौकों पर गरीब व श्रमिक मानकर समाज की मुख्यधारा से अलग थलग रखा जाता हैं। मै श्रमिक वर्ग के साथ काम करता हू और साथ ही कहीं ना कहीं अपने आप को श्रमिक हितैषी संस्था का कार्यकर्ता भी मानता हूं तो अपने आप को श्रमिक क्यो नहीं मानू घ्

जबकि कौटिलय व अन्य विद्वानो का मानना है कि भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके व्यक्तित्व, गुण व कर्मो के आधार पर तय होती हैं उसके व्यवसाय व आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं। और इस बात से शायद हम सब पूर्ण रूप से सहमत हैं। अगर इतिहास पर नजर डाले तो हमें संत रैदास, कबीर दास से लेकर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल तक हजारो उदाहरण मिल जाऐगे जिन्हे श्रमिक होने के बाद भी समाज में उनके कर्मो के आधार पर स्थान दिया गया। और मेरे अनुसार यही कारण है कि हमारे भारतीय समुदाय में अभी तक वर्ग संघर्ष उस रूप में उभरकर सामने नही आ पाया है जैसा कि इतिहास में पष्चिमी देषो में लगातार होता आया हैं। क्योकि समाज में हम जब भी किसी व्यक्ति विषेष या समुदाय को किसी संज्ञा विषेष से पुकारते है तो वह उसे बाकी लोगो से अलग तो करता है ही सीथ ही समुदाय में विघटन और वर्ग संघर्ष के बीज भी बोता हैं। लेकिन दोस्तो आज जब मै सोचता हंू तो मुझे लगता है कि अब हमारे यंहा भी वर्ग विघटन को लेकर स्थितिया बदल रही है और समाज में धीरे धीरे वर्गभेद का पेड बढता जा रहा हैं। और हम सब यह भी मानते है कि इतिहास अपने आप को दोहराता हैं। तो साथियो यह हम सब पर निर्भर करता है कि हम इतिहास को किस रूप में दोहराते हुए देखना चाहते हैं। वरना वो कहावत तो है ही ना कि आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी! इसलिए आज इस दिन व मौके पर मैं सबसे कहना चाहूंगा कि हम सब जरूर सोचे कि हम भी श्रमिक हैं या…… क्या हम इस वर्ग भेद को कम कर रहे है या…..

और दोस्तो मुझे यह भी लगता है कि श्श्रम और प्रवास पर निर्भर समुदायो के जीवन को बेहतर, सुरक्षित ओर गरिमामय बनाने के लिए अग्रणी और विषेषज्ञ संस्थान के रूप में सथापित हानेष् के लिए हमें इस बात पर भी शायद गौर और चर्चा करने की जरूरत हैं। मै आज एक श्रमिक होने के नाते इस विषय पर आप सबके विचार सादर आमन्त्रित करता हूं। अन्त में किसी कवि की इन पंक्तियों के साथ मै अपनी बात को विराम देता हूं कि…..

कुछ भी बनो तुम,
पर श्रमिक की अपनी पहचान न खोना।
तुम श्रमिक महान,
तुम्हारी मेहनत से मिट्टी भी सोना।।

आप सभी को शुभकामनाओ व आदर के साथ।

आप सबका श्रमिक साथी
राजेन्द्र

(Rajendra Sharma works with Aajeevika Bureau, leading its oldest centers at Gogunda, Udaipur. A great team leader, a thorough professional, a role model for youngsters visiting Gogunda and most importantly a powerhouse of energy…he can inspire anyone…even the most disinterested with loads of passion)

This entry was posted in Listening to Grasshoppers. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s