किसका क्या भरोसा: मालिक मजूदर के बीच कम होता विश्वास

“मालिक लोगों का क्या वे तो कभी भी काम से निकाल दें, ऐसे में दूसरा काम कैसे मिलेगा।”चम्पा बाई ने एक मीटिंग में ये कहा तो मैं कोई चैंका नहीं बल्कि अपनी समझ को और स्पष्ट करने का प्रयास किया।

kiska kya bharosaश्रमिकों द्वारा मालिकों के बारे में ऐसी बातें आमतौर पर सुनने को मिलती हैं, जो कि वास्तव में सही भी हैं। भोपाल में प्रवासी कार्यक्रम में तकनीकि सहयोग विजिट के दौरान घरेलू बाई के रूप में कार्य करने वाली चम्पा ने ये चर्चा के दौरान अपनी बात रखी। इस बैठक में घरों में कार्य करने वाली बाईयों से उनके काम के बारे में चर्चा करते हुए यत बात चल रही थी कि कितने घरों में काम करते हैं तथा कितना पैसा मिलता है। पता चला कि एक बाई 6-8 घरों में कार्य करती है और एक घर से 600-700 रूपये प्रतिमाह मिलता है। इस प्रकार से एक बाई 3500-4500 प्रतिमाह कमा पाती है। इसी पर जब मैंने उनसे कहा कि आप घर में होने वाले सारे काम को अच्छे से सीख लें और एक ही घर में काम करें तो वहां पर भी 5000 से 6000 रूपये तक मिल जाऐंगे और इतने घरों की भागदौड़ भी मिट जाएगी। तब अपने लम्बे कार्यानुभव से चम्पा बाई ने ऐसी बात कह दी कि मैं निरूत्तर हो गया। उनके अनुसार“यह तरीका अच्छा है और कई बार हम भी सोचते हैं परन्तु घर मालिक को अगर काम पसन्द नहीं आया या कुछ ऊंच-नींच हो गई तो वह फटाक से काम से निकाल देते हैं। हमारे घर का चूल्हा जो इसी कमाई से जलता है फिर ऐसे में हम क्या करेंगे।” आगे उन्होंने बताया कि “ज्यादा घरों में काम करने से भाग-दौड़ तो जरूर रहती है परन्तु एक घर से काम छूटने पर बेरोजगार तो नहीं होते और कई घरों में जाते रहने से उन्हीं सम्पर्कों से नए काम के बारे में पता चल जाता है। एक घर में काम करो और वह छूट जाए तो दूसरा काम मिलना मुश्किल हो जाता है।”

कई बार हम यह सोचते हैं कि श्रमिकों के तौर तरीके सही नहीं हैं, अपने गलत तरीकों के कारण ही इनको परेशानी होती है। और हम जो अच्छा सुझाव दे रहे हैं (अपने स्वयं के अनुसार) वे उसके क्यों नहीं मान रहे हैं। परन्तु नहीं श्रमिक भी अपने तरीके अपने अनुभवों व मालिकों/नियोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले व्यवहार के अनुसार बनाते हैं। अपने आस-पास जो होता हुआ देखते हैं उसी के अनुसार वे प्रतिक्रिया देते हैं। घरेलू बाईयों द्वारा एक घर में स्थाई काम करने के बजाए अधिक घरों में अस्थाई काम करना, युवाओं द्वारा टिकाउ कार्य के अवसरों को छोड़कर अस्थाई व अनौपचारिक कार्यव्यवस्था में कार्य करना, ईड़र में काम के लिए जाने वाले खेत श्रमिकों द्वारा फसल में अधिक भाग के स्थान पर एड़वांस को अधिक महत्व देना और भी कई ऐसे उदाहरण हैं जो कि मालिक/नियोक्ताओं के प्रति अविश्वास को दर्शाते हैं। श्रमिकों द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के व्यवहार के सभी आयामों को गहराई से समझने की आवश्यकता है।

मालिक/नियोक्ता कुशल, निष्ठावान, समर्पित तथा ईमानदार कार्मिक की अपेक्षा तो हमेशा रखते हैं परन्तु स्वयं उनके प्रति जबावदेह नहीं होते हैं। यह स्थिति कोई क्षेत्र विशेष या कार्य विशेष की नहीं है बल्कि असंगठित श्रम बाजार में व्यापक रूप से यह देखने को मिलती है। कार्मिकों की दक्षता को बढ़ाने व सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए तो नियोक्ता कोई जिम्मेदारी नहीं लेते हैं परन्तु कुशल व टिकाउ कार्मिक की अपेक्षा जरूर करते हैं। इसका प्रमुख कारण है हमारे श्रम बाजार का असंगठित व अनौपचारिक स्वरूप, जो श्रमिकों के जुड़ाव में स्थिरता लाने में असमर्थ है। नियोक्ता भी श्रमिक को उस समय में अधिक से अधिक काम लेने की सोच रखते हैं। इसी के चलते श्रमिक भी अपनी जिम्मेदारी से विमुख होते जा रहे हैं वे भी अपने कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभाते हैं और कई बार तो मालिक/नियोक्ता का नुक्सान करने से भी नहीं चूकते हैं। हां ये जरूर है कि भूतकाल में इस प्रथा का आरम्भ मालिक/नियोक्ताओं की ओर से हुआ और अब दोनों के लिए यह मौका परस्ती बन गया है। जब जिसका मौका लगता है वही अपना दांव चढ़ा देता है। एक-दूसरे के प्रति अविश्वास के माहौल से दिन-प्रतिदिन श्रमिकों व मालिक/नियोक्ताओं के आपसी सम्बंध तथा कार्य के रिश्तों का अवमूल्यन हो रहा है।

श्रमिकों के साथ कार्य करते हुए हमारे जैसे कार्यकर्ताओं का झुकाव तो स्वभाविक रूप से हमेशा ही श्रमिकों के प्रति रहता है परन्तु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एक-दूसरे के बिना इनका काम चलना नामुमनि है। अतः इस व्यवस्था में सुधार करना तथा श्रम बाजार में संतुलन बनाना ही हमारा प्रमुख ध्येय होना चाहिए न कि किसी एक पक्ष में मीन-मेख निकालकर उनकी आलोचना करना। इसके लिए श्रमिकों को उनकी जिम्मेदारी व कर्तव्य का अहसास कराने का कार्य तो हम कभी कभार करते हैं जिसको प्रमुखता पर लेने की आवश्यकता है। साथ ही मालिक/नियोक्ताओं को श्रमिकों के प्रति संवेदनशील करना व जबावदेह बनाना अपने प्रयासों में शामिल करना हमारी प्राथमिकताओं की सूची में होना चाहिए।

– Santosh Poonia, Aajeevika Bureau

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One Response to किसका क्या भरोसा: मालिक मजूदर के बीच कम होता विश्वास

  1. Sejal says:

    Santosh, what you’ve tried saying is true; perhaps this is why we -the one who believe in human rights develop different set of practices; i thought of sharing some being practiced at my home, especially by my mother – making our maid (Varshaben) more accountable, she has developed such a rapport with her that in time of needs she can take a leave whenever she wants with a prier information- it its difficult to inform in advance, she needs to give a call/a missed call to inform early in the morning. When she feels tired, mom helps her in her cleaning work or reduces the quantity; if she comes without breakfast or is fasting, she is being served with hot snakes or fruits & milk; she is also being taught cooking and some of the Gujarati/Punjabi recipes – so that, in future, she can work as cook and earn more. She is allowed to bring her 12 year old son whenever she feels like – mom helps him in maths – THESE ALL have really helped both the families and she shares a special relation with my mother; she is just like an elderly aunt for Varshaben.

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