शाईनिंग इंडिया – कचरा ही है आजीविका का सहारा

तड़के 5-6 बजे अपनी पीठ पर बोरा लादे निकल पड़ती हैं आजीविका के लिए। जहां गंदगी या कचरा देखा बस घुस गईं कचरे के ढेर में बिना सोचे कि इससे उनके स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कचरे के ढेर में जो हाथ लगा डाल लिया बोरे में। इकट्ठे किए गए कचरे को बेचकर जो कमाई होती है उससे अपने परिवार चला रही हैं.…… कचरा बीनने वाली ये महिलाएं। यदि ये काम करने वाली महिलाएं ना हों तो हम कल्पना भी नहीं सकते कि शहरों में गंदगी का कितना ढेर लग सकता है। शहर की सफाई का आधा काम तो ये महिलाएं दिनभर में कचरा बीनकर ही निपटा देती हैं। Shweta2

जयपुर के चारों कोनों में ऐसी कई बस्तियां हैं जिनमें हजारों की तादाद में कचरा बीनने का काम करने वाले परिवार रहते हैं। इन परिवारों की लगभग सभी महिलाएं कचरा बीनने का काम करती हैं। ये महिलाएं सुबह जल्दी उठकर बिना कुछ खाए पिए ही अपने काम पर निकल जाती हैं। दोपहर 1-2 बजे तक कचरा बीनती हैं। उसके बाद घर आकर अपने घर के काम निपटाती हैं। उसके बाद दिनभर की मेहनत से इकट्ठे किए हुए कचरे को बोरे से निकालकर बिखेर लेती हैं। अब शुरू होता है इनका छंटनी का काम। प्लास्टिक की थैलियां, कागज एवं गत्ते, कांच की बोतलें, लोहा आदि की छंटनी कर सबको अलग-अलग बोरों में भर दिया जाता है। इसके बाद यह कचरा कबाड़ी वाले के यहां बिकने जाता हैं। 10 रुपए किलो के भाव से प्लास्टिक व 5 रुपए किलो के भाव से कागज एवं गत्ते बिकते हैं। पिछले कई सालों में महंगाई ने आसमान छू लिया लेकिन इन महिलाओं के लिए कचरे भाव ज्यों के त्यों हैं। इनमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। पूरे दिन भर की मेहनत के बाद इन्हें मिल पाते हैं मात्र 100 से 150 रुपए।

इनके पति भी इसी तरह का काम करते हैं। और अधिकतर महिलाओं के पति अपनी कमाई की शराब पी जाते हैं। शराब पीकर उनसे मारपीट और गाली-गलौच करते हैं। लगभग सभी महिलाएं निरक्षर हैं। और उनमें कोई हाथ का हुनर नहीं होने की वजह से उन्हें मजबूरन ऐसा काम करना पड़ रहा है।

हाल ही में विविधा संस्था, जयपुर तथा आजीविका ब्यूरो द्वारा शहर रोटी तो देता है’ नामक अध्ययन में Shweta3निकल कर आया कि इनमें से 90% महिलाओं के बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल नहीं जाते हैं और ना ही परिवार वाले इनके पोषण का ध्यान रख पाते हैं। और तो और आंगनबाड़ी केंद्र पर भी नहीं भेज पाते हैं। इन महिलाओं की माली हालत इतनी खराब है कि वो अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की तो सोच भी नहीं सकती हैं। कुछ महिलाओं ने बताया कि सरकारी स्कूल वाले उनके बच्चों को भर्ती ही नहीं करते हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस कभी भी आकर उनकी बस्तियों को उजाड़ देती है। यह भी एक मुख्य कारण है कि उनके बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं क्योंकि उनके रहने का कोई पक्का ठिकाना नहीं है। इस कारण बच्चे भी उनके साथ कचरा बीनने वाले काम में लग जाते हैं। छोटे बच्चों को महिलाएं काम पर जाते वक्त अपने साथ ही ले जाती हैं। कचरा बीनते वक्त बच्चों को कचरे में ही सुला देती हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे बीमार हो जाते हैं। कई बार उन्हें चोट भी लग जाती है। इस काम में महिलाओं को कई बार चोट भी लग जाती है। कांच और लोहे की नुकीली चीजें चुभ जाती हैं। वायरल व मलेरिया जैसी खतरनाक बिमारियां भी हो जाती हैं। सांस लेने में तकलीफ की शिकायत रहती है। इलाज के लिए अधिकतर महिलाएं प्राइवेट अस्पतालों में जाती हैं। पूंछने पर पता चला कि सरकारी अस्पताल में उनका ठीक से इलाज नहीं किया जाता है। उन्हें अच्छी दवाइ्र्रयां नहीं दी जाती हैं। समाज में हर जगह उन्हें अपने इस काम की वजह से जिल्लत का सामना करना पड़ता है।

इनके परिवार कई सालों से जयपुर में रह रहे हैं उसके बावजूद इनके पास मतदाता पहचान पत्र, बीपीएल Shweta4कार्ड, राशन कार्ड आदि नहीं हैं। वृद्धा, विधवा एवं विकलांग महिलाओं को पेंशन नहीं मिल रही है। बस्तियों में बिजली, पानी व ट्वायलेट जैसी कोई मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं है। पानी की कमी की वजह से कई-कई दिन तक ये लोग नहा नहीं पाते हैं। पीने का पानी तक नहीं मिल पाता है। सरकारी योजनाओं की तो इन तक अभी पहुंच ही नहीं है।

ये शाईनिंग इंडिया का दूसरा चेहरा है जहां महंगाई के इस दौर में तंगी में जिंदगी गुजार रहे इन परिवार के लोगों के लिए स्वयं का मकान बना लेना तो एक सपने जैसा है। किसी एक में भी यह कहने का साहस तक नहीं है कि वो अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा लेंगे। बहरहाल जिल्लत की जिंदगी जी रहे ये परिवार पेट पालने के लिए अथक कचरा बीनने का काम कर रहे हैं।

– Shweta Tripathi, Aajeevika Bureau, Jaipur

(Shweta is one of the recent additions to the Aajeevika battalion. She has a background of working on women’s rights and within the AB team she has chosen to work with women workers in the unorganized sector. This piece comes from a study that she was a part of. Notably, she is also leading an intervention which came up as a result of this study.)

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2 Responses to शाईनिंग इंडिया – कचरा ही है आजीविका का सहारा

  1. Santosh Poonia says:

    Dear Shweta,

    The story is very touching and well written. You covered the many aspects of the work and work related issues. very well done, Keep it up.

  2. Santosh Poonia says:

    इस कहानी के लिए समर्पित एक खूबसूरत सी कविता
    कचरा बीनती लड़की
    ____________________
    माँ ने भले जन्म दिया हो उसे
    मजदूरी करते हुए
    कचरे के आस पास
    लेकिन फैंका नहीं उसे
    कचरे के ढेर पर उसने
    जैसे फैंक दिया था
    कई कई बार
    बड़ी हवेली वालों ने
    अपने ही खून को
    बड़ी हो गई है अब वह
    उठ कर मुहं अँधेरे रोजाना
    निकल पड़ती है वो बस्तिओं में
    कचरा बीनने
    उसके कंधे पर लटका
    यह पोलिथिन का
    बोरा नहीं
    किसी योगिनी का चमत्कारी
    झोला है
    जिसमे भर लेगी वह
    पूरे ब्रह्माण्ड का कचरा
    सीख लिया है
    उसकी आखों ने
    खोजना और बीनना
    हर कहीं का कचरा
    भांप लेती हैं उसकी आँखें
    आवारा आँखों को भी
    और बीन लेती है वह
    उनमें भरे कचरे को भी
    शाम को जब रखती है
    वह झोला
    कबाड़ी के तराजू में
    उठती है उसमे से तब
    तवे पर सिकती
    रोटी की महक
    उगता है उसमे से
    उसका का छोटा सा सपना
    कचरा बीनती है वह
    ताकि कचरा न रहे
    हमारे बाहर
    और हमारे भीतर भी

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