बॉबिन ऑपरेटर “नंदू ”

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Yarn- Bobbin

प्रवास के मायने अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग हैं। पर इतना तो जरूर है कि प्रवास चाहे किसी भी कारण से हो-स्वेच्छा से या परिस्थितियों से बाध्य होकर, अपने पीछे पीड़ा और अवसाद का एक बहुत ही भारी बोझ छोड़ जाता है। और फिर जब हम इसका लेखा जोखा करने बैठते हैं तो कभी तो खुश होते हैं और कभी आंसुओं से नहा जाते हैं।

 

आजीविका की तलाश में होने वाले प्रवास के साथ भी कुछ इसी तरह की बातें होती हैं। कुछ लोग तो प्रवास पर जाने से खुश होते हैं और इसलिए जगह छूटने का दर्द उनके लिए अस्थायी होता है। और फिर प्रवास पर जाने से आने वाली खुशी को याद कर व्यक्ति सब कुछ भूल जाता है। पर सभी लोग ऐसे भाग्यशाली नहीं होते और देश के एक बड़े वर्ग के लिए प्रवास तो पीड़ा और दर्द का सतत स्रोत है। भले ही यह प्रवास रोजीरोटी की तलाश में ही क्यों न हो।

 

बहुत कम लोग होते हैं जो पूरे परिवार के साथ प्रवास पर जाते हैं। अमूमन लोग अकेले ही निकलते हैं और इस तरह का प्रवास काफी तकलीफदेह होता है। पर काम की तलाश में देश या विदेश के किसी भी कोने की रुख करना और खुद को काम में झोंक देना फिर भी शायद इतना परेशान करने वाला नहीं होता है जितना अपने अवयस्क बेटे को रोजगार की भट्ठी में असमय ही झोंक देना।

 

रोजगार की तलाश में लगभग सभी प्रदेशों के लोग कभी तो सिर्फ अपने प्रदेश और कभी कई प्रदेशों की सीमाएं लांघ जाते हैं। ओड़ीशा के मजदूर भी पिछले कई दशकों से यही कर रहे हैं। वे पूर्वी तटक्षेत्र से पश्चिमी तटक्षेत्र तक की यात्रा तय कर गुजरात के सूरत पहुँच रहे हैं आजीविका की तलाश में।

 

16-17 साल का नंदू (नाम बदला हुआ) भी ऐसा ही एक बेटा है जिसका बाप आजीविका की तलाश में गंजाम से कई साल पहले सूरत आ गया। नंदू और उसकी बड़ी बहन यहीं सूरत में पैदा हुए और पले-बढ़े। वे अपने गाँव से जितना परिचित हैं उससे कहीं ज्यादा सूरत को जानते हैं। वे गुजरती बोलते हैं और अगर सड़क पर उन्हें कोई देख ले तो शायद ही यह कह सके कि वे गुजराती नहीं है। पर वे गुजराती नहीं हैं यह एक सत्य है। अपने पिता की तरह ही वे लोग भी प्रवासी हैं और जहां वे रह रहे हैं वह उनका अपना घर नहीं है। अपने माँ-बाप से उन्होने सुन रखा है कि वे यहाँ पैसा कमाने की मकसद से हैं और जिस दिन यह मकसद पूरा हो जाएगा वे अपने घर लौट जाएँगे। पर यह सब सोचते-सोचते 30 वर्ष का लंबा अंतराल गुजर गया। और अब नंदू के बाप ने तो अपने घर लौटने की बात करना भी बंद कर दिया है।

 

नंदू की बहन की शादी हुई। नंदू को भला इस बात से क्या लेना देना कि उसकी बहन की शादी में उसके माँ-बाप को क्या क्या दिक्कतें उठानी पड़ी। पर उसे इस बात का पता तब लगा जब बहन के ससुराल चले जाने के बाद एक दिन उसके बाप ने उसे अपने साथ चलने को कहा। वह नहीं समझ पाया कि आज उसका बाप फैक्ट्री जाते हुए क्यों उसे भी अपने साथ ले जाना चाहता है। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था। वह अपने पिता के साथ कपड़ा फैक्ट्री में आया। उसे यह देखकर अच्छा लगा कि वहाँ पर उसकी भाषा बोलने वाले कई लोग थे। पर वह उनमें से किसी को जानता नहीं था। एक व्यक्ति जो उससे कुछ ज्यादा उम्र का था, उसे लकड़ी के कई सारे बॉबिन दिखाये और उसे बताया कि कैसे इनको उसकी ही ऊंचाई के बराबर लोहे की मशीन में उसे फिट किया जाता है और फिर उनमें धागों को कैसे फंसाया जाता है। बस इतना करने के बाद उस मशीन को चला देना है। इसके बाद फिर जब धागों का बंडल खतम हो जाएगा तो उसे दूसरा बंडल उस पर लगाना होगा। बस इतना भर काम उसे करना था।

 

नंदू को यह सब बहुत ही आसानी से समझ में आ गया और वह मन ही मन खुश भी था। खुश इसलिए था कि उसके लिए सब कुछ नया था।

 

नंदू को बॉबिन का यह काम करते हुए दो साल हो गए हैं। वह अब गुटका खाने लगा है। अपनी बालसुलभ चंचलता वह खो चुका है। वह उम्र से पहले जवान हो गया है। सूरत के जगन्नाथ नगर इलाके में हमसे बातचीत के दौरान वह हमेशा ही अपनी नज़रों से जमीन खोदता हुआ दिखा। उसका चेहरा ज़र्द हो रहा था। तेल से चुपड़े अपने बालों को जिस तरह से उसने कंघी किया था उससे लग रहा था कि अपने बचपन से अब भी उसके रिश्ता पूरी तरह खत्म नही हुआ है। कई बार बातचीत के दौरान वह ऐसी बातें करता जैसे पूरे घर की ज़िम्मेदारी उसने अपने सिर पर उठा रखा हो। पर नंदू अपने पिता की तरह अपने गाँव जाने की बात नहीं करता। कैसा गाँव…कौन सा गाँव? वह किसी गाँव को नहीं जानता-किसी गाँव से उसका कोई रिश्ता नही है। उसे सबसे पहले कर्जे चुकाने हैं।

 

वह अपने बारे में क्या सोचता है? अपने बारे में? वह यह प्रश्न वापस मेरी ओर उछाल देता है।

 

अपने बारे में सोचने के लायक शायद वह अभी नहीं हुआ है।

 

अशोक झा

आजीविका ब्यूरो

उदयपुर

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