अपने ही देश में बेगाने

लोकतंत्र के उत्सव ‘आम चुनाव 2014’ का आगाज हो चुका है। चारों ओर वोट और वोटरों की बात चल रही है। राजनेता वोटरों को अपनी ओर लुभाने के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रहे हैं। आम चुनाव आते ही राजनीतिक दलों द्वारा ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल करने की जुगत में एक बार फिर मुफ्त उपहार व लोक लुभावन वादों का दामन पकड़ना शुरू कर दिया है। इतिहास गवाह है, मतदाताओं को लुभाने की होड लगी है जिसमें तमाम नीति, सिद्धान्त, विचार तथा मान्यताएं पीछे छूट जाती हैं।Image

राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के चयन में योग्यता से ज्यादा धार्मिक व जातिगत समीकरणों को प्राथमिकता दी जा रही है। नेताओं को अब जनता की समस्याएं व मुद्दे नजर आने लग गए हैं (जिनको चुनाव के बाद लगभग भूल ही जाते हैं)। पांच साल में एक दिन वोटर का भी आता है, तो आम आदमी के लिए ये वही दिन हैं। चुनाव आयोग ने भी ‘यूथ चला बूथ’ या ‘आपका वोट आपकी ताकत’ जैसे स्लोगनों से वोटरों को चुनाव में उनके वोट से उनकी ताकत का अहसास करा रहा है। परन्तु इस सब में उनका क्या जो इसी देश के नागरिक होते हुए भी किसी प्रकार की नागरिकता का प्रमाण प्राप्त नहीं कर पाते हैं और इसी से चलते लोकतंत्र के अहम हथियार ‘वोट के अधिकार’ से वंचित रह जाते हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के अनुसार भारत के सभी नागरिकों को समान अवसर व आजीविका कमाने का अधिकार है। अतः काम न होने की स्थिति में लोग अन्य स्थान जिसमें ब्लाक से बाहर से लेकर देश के किसी भी कोने में और कई बार तो देश के बाहर जहां पर व जैसा अवसर मिले काम की तलाश में निकल पड़ते हैं। कई बार तो लोग उन्हीं स्थानों पर स्थाई रूप से बस भी जाते हैं। क्योंकि काम की उपलब्धता सर्वोपरि है।

चुनाव आयोग के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी स्थान पर पिछले छः माह से निवास कर रहा है तो उसे वहां की मतदाता सूची में नाम जुडवाया जा सकता है। परन्तु थावरा राम, गहरा राम, ममराज, तथा मोहनराम जैसे लगभग 175-180 परिवार पिछले 28-30 वर्ष से सिन्दररू, सुमेरपुर में रह रहे हैं और इनमें के किसी का भी मतदाता सूची में नाम नहीं है। यहां तो क्या कहीं की भी मतदाता सूची में नाम नहीं है। दुर्गाराम, भिंया राम धर्माराम, पारथा राम तथा हीरा राम जैसे सैकड़ों ही नाम हैं जो कि पैदा ही इसी गांव में हुए हैं और 25 से 28 वर्ष की आयु के बीच के नवयुवक है बावजूद इसके इन्हें वोट देने का अधिकार नहीं मिला है। इन्हें इस बात का आभास भी नहीं है कि वे कितने बड़े अधिकार से वंचित हैं पूंछने पर बताया कि ‘म्हा वोट रौ काई करां म्हाने तो आपरे कामूं मतलब, महारा पुरखा बाहरनी आया तै अठै महारी कई सुनवाई कोनी।’ (कोई बात नहीं हमें तो अपने काम से मतलब है वोट का क्या करना है। और हमारे पुरखे बाहर से आये थे इसलिए यहां हमारी कोई सुनता नहीं है।)

पाली जिले के व्यापारिक कस्बे सुमेरपुर से सटा ही सिन्दरू गांव है यहां पर कई सारे पत्थर पीसने वाले क्रेशर लगे हुए हैं। इन क्रेशरों पर कार्य करने वाले ये अधिकतर आदिवासी मजदूर उदयपुर जिले की कोटडा व गोगुन्दा तहसील के रहने वाले हैं। अरे हैं क्या थे, क्योंकि अब तो इन्हें अपना गांव छोड़े भी हुए लगभग 30 से 35 साल बीत गए हैं। वर्षों पहले चन्द परिवार ही यहां पर कार्य के लिए आए थे परन्तु अब ये लगभग 175-180 परिवार हो गए हैं जो कि 2 किमी. की परिधि में लगे 8-10 क्रेशरों  पर मजदूरी करते हैं। इन परिवारों के पास आज यहां निवासी के दस्तावेज के नाम पर कुछ भी नहीं है। अगर इन्हें यह चुनौती मिले कि आप भारत के नागरिक नहीं हो तो इनमें से एक भी परिवार इस बात को असत्य सिद्ध कर पाने में सक्षम नहीं है। क्योंकि पहचान के नाम पर एक भी दस्तावेज इनके पास नहीं है। मतदाता पहचान पत्र, राशनकार्ड, जमीन का पट्टा, ड्राईवर लाईसेंस, बैंक खाता पासबुक यहां तक कि आजकल पहचान का प्रतीक आधार कार्ड, कुछ भी नहीं है। क्योंकि इन सभी को पाने के लिए कोई न कोई एक पहचान का सबूत देना पड़ता है और इनके पास कुछ नहीं होने से किसी भी सेवा या इस प्रकार के जुड़ाव की शुरूआत ही नहीं हो पाती है। यहां पर कई लोगों के पास मोबाइल हैं और मैंने जब उनसे सिम कार्ड  के बारे में पूंछा तो बताया कि कुछ ने तो रिशतेदारों के नाम पर लिए हैं और ज्यादातर ने बताया कि दुकानदार ज्यादा पैसा लेकर किसी और के नाम की सिम दिलवा देते हैं। चलो सिम का तो जुगाड़ हो गया परन्तु राशनकार्ड के बिना सस्ता राशन नहीं मिल पाता है, वोट का अधिकार नहीं होने से किसी नेता या सरकार पर अपनी समस्याओं के समाधान के लिए दबाव नहीं बना पाते हैं और किसी भी प्रकार की सरकारी योजना का लाभ नहीं ले पाते हैं।

यह एक अजीबो-गरीब स्थिति है जिसमें आप अपने ही देश में सारे अधिकारों से वंचित हैं साथ ही स्थानीय जन प्रतिनिधियों की नजरों में भी दूर हैं। यहां के सरपंच को तो यह तक पता नहीं है कि इस स्थान पर इतने परिवार रहते हैं। उनके अनुसार ये लोग भी कभी उनके पास नहीं आते हैं तो पता कैसे चले। और इन लोगों के वोट तो हैं नहीं जिससे कोई जनप्रतिनिधि भी अपने आप से इनकी ओर नहीं देखता है। 2011 में ‘प्रवासी श्रमिकों के वोट दे पाने के व्यवहार व उनसे सेवाओं को प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयां’[1] विषय को लेकर आजीविका ब्यूरो द्वारा ही पांच राज्यों (राजस्थान, उत्तरप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र व विहार) में किए गए अध्ययन के अनुसार प्रवासी श्रमिक सबसे अधिक पंचायत के चुनाव में ही वोट करने आते हैं। विधानसभा व लोकसभा के चुनाव को अधिक महत्व नहीं देते हैं। पंचायत चुनावों में भागीदारी का एक बडा कारण उम्म्मीदवारों की व्यक्तिगत पहचान व पंचायत में ही ग्रामीण जनता का सबसे अधिक काम पडता है अतः वो उसी जनप्रतिनिधि को अधिक महत्व देते हैं। परन्तु यहां तो जनप्रतिनिधि के साथ वो रिश्ता ही नहीं है।

 
Santosh Poonia 
Co-coordinator, Centre for Migration and Labour Solutions (CMLS),
Aajeevika Bureau, Udaipur. 

[1] Sharma A. Poonia S. Babar M. Singh V. Singh P. Jha L. K. 2011. Political Inclusion of Migrant Workers: Perceptions, Realities and Challenges, Paper presented at Political Inclusion Workshop and their Access to Basic Services, Lucknow 10th-11th March, 2011

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One Response to अपने ही देश में बेगाने

  1. Amrita says:

    A very well written article, Santosh and with a lot of panache! Totally loved reading it. Lately, I have been following the enrollment campaigns of the Election Commission, and I am more than impressed with the efforts that they have put in for the upcoming elections. They have set up online and even physical infrastructure asking people to come and enroll, promising on the spot enrollments. For a population of the size of India, it is indeed a herculean task. I have been wondering if organizations such as ours have a role in enhancing the outreach of these enrollment processes. Not sure, how would this work and we have already lost time and the next election is too far…but definitely something to mull over…

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