यह कैसी बारिश आई कि सब कुछ बहा ले गई…..

अहमदाबाद में जो लोग रहते हैं,वो इस शहर के मूड को बखूबी जानते होंगें। अगर कहें की यह शहर अचानक ही अपना मूड बदलने में माहिर है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसके मूडियल होने का पूरा पता रविवार को लगा। अभी तो यह शहर पिछले लगभग एक माह से गर्मी से तप रहा था और पारा 42 डिग्री के आसपास मंडरा रहा था। पर रविवार को मौसम ने अचानक ही अपना मूड बदल लिया। उस दिन शाम को तेज तूफानी हवाएँ चलीं, बिजली की गड़गड़ाहट से सारा नगर दहलता रहा और फिर तेज बारिश शुरू हो गई। मौसम के मिजाज में आये इस बदलाव से सभी हैरान थे। लोगों को कहाँ उम्मीद थी की मौसम इस कदर करवट बदलेगा की उनको संभलने का भी मौका नहीं मिलेगा। पर प्रकृति के साथ जुड़ी यही अनिश्चितता तो उसकी सुंदरता है और यही उसे रहस्यमय भी बनाता है। ये ऐसे ही मौके होते हैं जब हमें अपने बौनेपैन का एहसास होता है और अपनी दरिद्रता पर क्षोभ। वरना,पक्की और आलीशान इमारतों की खिड़कियों से बारिश का आनंद लेना किसे अच्छा नहीं लगेगा।

तो शहर में रविवार को अचानक बारिश हुई। इस बारिश की वजह से गर्मी से तो थोड़ी राहत मिली पर कुछ लोगों पर यह कहर बरपा गई। Image

बारिश जब थमी तो मेरा मन हुआ की चल कर देखें की बाहर में बारिश का क्या हाल है। जैसा की अमूमन होता है,सड़कों पर ट्रैफिक जाम । वाहनों की लंबी कतारें लगी थीं, बारिश के दौरान आई आँधी कितनी जोरदार थी, सड़कों पर गिरे पेड़ और उनकी टूटी टहनियाँ इसका गवाही दे रही थी। सड़कों पर तो पानी का सैलाब उमड़ आया था और सड़कें इठलाती हुईं बरसाती नदी बन गई थी। बारिश के बाद के इन मंजरों को देखते हुए मैं अपने घर के नजदीक पहुंची तो मेरी नज़र वासणा नाके पर खुले में रह रहे राजस्थान के बांसवाड़ा के कुशलगढ़ आदिवासी श्रमिक पर पड़ी। इस नाके पर 200 से ज्यादा महिला, बच्चे और पुरुष रहते हैं। पर इस समय वहाँ से सब नदारद थे। इधर-उधर नज़रें दौड़ायी तो देखा की कुछ लोग पुलिस चौकी के पटरों के नीचे बैठे हैं। पास के बस स्टैंड का मंजर तो बहुत ही अजीब था। अचानक ही यह बस स्टैंड एक पूरे परिवार आश्रयस्थल बन गया था। एक परिवार के सात लोग अपने बच्चों के साथ बस स्टॉप पर शरण लिए हुए थे। बस स्टैंड में साड़ी को झूले की तरह बांधकर एक बच्चे को उसकी माँ सुला रही थी। दो-तीन बच्चे जिनको बैठने की जगह नहीं मिल रही थी, कुछ देर खड़े रहते तो कभी अपने पिता की गोद में जाकर बैठ जाते। बस स्टॉप पर ही एक कोने में एक माँ अपने एक बच्चे को दूध पिलाकर सुलाने की कोशिश करती नज़र आई। इस बस स्टैंड के हर कोने में बेबसी पसरी हुई थी। ज़िंदगी का हर पल संघर्ष की एक दास्तां बनती जा रही थी। नहीं,कोई आँख नम नहीं थी। किसी के चहरे पर गुस्सा या रोष नहीं था। पर हाँ, अगर कुछ था इन चेहरों पर तो वो थी बेबसी और प्रकृति की थोड़ी भी नाराजगी नहीं झेल पाने की निराशा।

आंधी शाम को 5 बजे शुरू हो गई थी। यह समय श्रमिकों के काम से लौटने का नहीं होता। पर जब वे लौटे तो उनके आशियाने का बुरा हाल था। कहीं कुछ नहीं था। उनका घर, उनका सामान – उन्हें कुछ भी तो नहीं मिल रहा था। प्लास्टिक की छत के नीचे बसा उनका संसार उजड़ चुका था। कई बार ज़िंदगी की दूसरी मुश्किलें पेट की आग से ज्यादा भयानक हो जाती हैं। आज तूफान से बचने के लिए बस स्टॉप में शरण लिए इस परिवार के लिए भूख ज्यादा अहम नहीं थी। और वैसे भी, भूख से तो उनका वास्ता पड़ता ही रहता है। उनको अगर इंतज़ार था तो रात के सकुशल कट जाने का ताकि सबेरे पौ फटने के बाद जब तूफान का मिजाज शांत हो चुका होगा, एक बार फिर वो तिनका तिनका जोड़कर अपना नशेमन तैयार करेंगे और एक बार फिर शुरू जो जाएगी जिंदगी की वही जद्दोजहद।

बहरहाल, इन श्रमिकों ने तो जैसे तैसे वह रात काट ली और वे एक नया सहर देख पाये। पर कुछ श्रमिक ऐसे भी थे जिनको यह नसीब नहीं हुआ। सुबह के अखबार में खबर थी कि चार प्रवासी मजदूर रविवार की शाम आए तूफान की भेंट चढ़ गए।


 

Rina Parmar

Aajeevika Bureau, Ahmedabad

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One Response to यह कैसी बारिश आई कि सब कुछ बहा ले गई…..

  1. Bhaskar says:

    Congrate for very good post. very very touching . please must share it right to shelter campaigner of india(Supreem court right to shelter convenior) …………… Bhaskar

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