सपने, मंजिलें और रोजगार की बातें …

मैं बहुत मेहनती लड़का हूं, लेकिन मेरे पास ढंग का काम नहीं है। मेरे पिछले छः माह अहमदाबाद में काम करते हुए बीते। वहां से अभी-अभी अपने गांव निठाउवा आया हूं। सोचता हूं कब तक अहमदाबाद में मजदूरी के लिए जाता रहूंगा? काम तो मिल जाता है और पैसा भी। गांव वाले सोचते हैं कि सोनाराम अच्छे पैसे कमा रहा है। परन्तु सच कहूं तो मुझे काम के साथ सम्मान भी चाहिए जो अभी तो मुझे मिलता हुआ नहीं दिखाई देता। बडा शहर, बहुत सारे लोग लेकिन सोनाराम को कोई नहीं पहचानता।

मुझे अच्छा काम मिले तो मैं उसे अच्छे से कर लूंगा, यह मुझे पूरा भरोसा है। मेरे मन में यह उलझन है कि अपने सपने के बारे में किसे बताऊं? मेरी काबिलियत को कौन समझेगा? कौन मेरे सपने और जरुरत में तालमेल बिठायेगा?

मैं 9वीं पास हूं। होली पर आया था आज 10 दिन हो गये हैं। अहमदाबाद से सेठ का दो बार फोन आ गया है बुलावे के लिये। तय नहीं कर पा रहा हूं वापस जाना है या नहीं। जब गांव में होता हूं तो दिन में एक चक्कर साबला के मार्केट का जरुर लगाता हूं। आज भी सुबह-सुबह निकला ।

मन ही मन सोचता हुआ जा रहा था। अचानक बस स्टेण्ड पर लगे एक शिविर पर मेरी नजर पड़ी। शिविर के बाहर लगे बैनर पर लिखा था- “युवा मेला सपने, मन्जि़लें और रोजगार की बातें”। जो मेरे दिमाग में चल रहा था वो बातें मुझे बेैनर पर दिखाई दी। मन में उत्सुकता बढ़ी कि अन्दर क्या हो रहा है देखकर आता हूं। मेले के अन्दर मेले जैसा कुछ नज़र नहीं आया। 8-10 टेबल पर लाईन से लोग बैठे हुए है और कुछ बातें कर रहे हैं। पहले तो मैं घबराया। लगा गलत तो नहीं आ गया मै? मैंने गैट पर खड़ी एक मैडम से पूछ ही लिया- अन्दर कुछ टेन्शन जैसा तो नहीं है ना।”मेडम ने हंस कर कहा- “आपके लिए ही है।”  मैं संकोच करते हुए अन्दर गया।

पहले टेबल पर मेरा नाम-पता और मोबाईल नम्बर लिखा गया और मुझे एक फार्म दिया गया। आगे खडे भाईसाहब ने मुझे 4 रिंग दी और कहा – निशाना लगाओ। पहले तो समझ नहीं आया। उन्होंने समझाया कि अपने हिसाब से दूरी तय करो और उस पर रिंग से निषाना साधो। मैने सोचा की 8 फीट पर लगा दूंगा। सेट किया और फेंकी रिंग। पर ये क्या? दो चांस में एक भी निषाना नहीं लगा पाया। मन में सोचा इतना भरोसा था लेकिन वार तो खाली गया। भाईसाहब ने कहा दूरी बदलोगे? मैं अपना टारगेट 8 से 6 पर ले आया। और आखिर में 5 पर मेरा निशाना लग पाया। मन में खुशी हुई पर विचार भी आया कि जितना सोचा उतना नहीं कर पाया। इस पर आगे बैठे सर ने खुलकर बात की। बहुत अच्छा लगा अपने बारे में यह जानकर।

आगे वाली टेबल पर मुझे चार्ट और रंग दिये गये। कहा गया कि जो मेरे मन में चल रहा है उसका चित्र बनाउं। मैने चार्ट पर किताब का और मार्बल का चित्र बनाया। चित्र के बारे में पूछने पर मेने बताया कि मैं आगे पढ़ना और मार्बल फिटिंग का काम चाहता हूं। अब आखिरी टेबल पर एक सर ने मेरे हाथ से फार्म लिया और बाकी  की जानकारी ली। यहां पर मेने अपने मन की स्थिति बता दी। मुझे सलाह मिली कि घर की जिम्मेदारी को देखते हुए प्राईवेट पढ़ाई जारी रखनी चाहिए। साथ में रूची अनुसार काम सीखना चाहिए। मेने अपनी रूची मार्बल फिटिंग के लिए दिखाई। मेरा फार्म जमा किया गया। आगामी ट्रेनिंग की तारीख बताई गई साथ ही सम्पर्क नम्बर और ट्रेनिंग सेन्टर का पता दिया गया।

अब मुझे मालूम हो गया है कि मैं क्या कर सकता हूं और मैं किस लायक हूं। अब मेरा लक्ष्य मार्बल फिटिंग का काम सीखकर, इस लाईन में आगे बढ़ना है। अगले महने साबला मे शुरू हो रही ट्रेनिंग के लिए मैंने फीस जमा करवा दी।

ये मेला और मेलों से बहुत अलग था। मेले से बाहर निकला तो ताजगी महसूस हुई। सुबह मन में जो द्वंद था अब उसकी जगह कुछ नये विकल्पों और स्पष्टता ने ले ली। इस मेले से मिठाई, खिलौने नहीं लेकर जा रहा हूं लेकिन अब सपने, मजिंले और रोजगार की बातें जरुर मेरे साथ है। 

 

युवा मेला: सपने, मन्जि़ले और रोजगार की बातें………. एक परिचय

स्टेप एकेडमी आजीविका ब्यूरो द्वारा आयोजित होने वाला एकदिवसिय कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम चार-पांच पंचायतों के बीच किसी कलस्टर में किया जाता है। सघन प्रचार-प्रसार से युवाओं को एक जगह आमंत्रित किया जाता है। युवाओं के लिए आयोजित परामर्श शिविर को ही युवा मेले का नाम दिया गया है। इस युवा मेले में अपनाये गये परामर्श का क्रम एक निष्चित पद्धति पर आधारित है जिसे वाल्कर साईकल (Walker Cycle) कहते हैं। इस गतिविधि में प्रमुख पांच चरण होते हैं: दिमागी कसरत, व्यक्तिगत/निजी जुड़ाव, जानकारी का आदान-प्रदान, जानकारी को लागू करना और वास्तविक दुनिया से जुड़ाव। इस युवा मेले में ये चरण निम्न प्रकार से रहते हैः

  1. दिमागी कसरतः रिंग वाला खेल, लक्ष्य निर्धारण के साथ
  2. व्यक्तिगत जुड़ावः खेल के दौरान तय किये गये लक्ष्यों पर चर्चा
  3. जानकारी का आदान-प्रदानः प्रशिक्षण एवं नियुक्तियों की जानकारियां
  4. जानकारी को लागू करनाः युवा से चित्र बनवाना जो उसके दिमाग में चल रहा है
  5. वास्तविक दुनियां से जुड़ावः युवा द्वारा लिया गया निर्णय

इस वाल्कर साईकल (Walker Cycle) को एक और नाम दिया जा सकता है टोल, खेल, मोल, गोल। जिसमें युवा अपने आप को टोल से आगे निकाल रहा है। फिर खेल रहा है। मोल कर रहा है। अन्त में अपना गोल निर्धारित कर रहा है। इस मेले की डिजाईन निम्न प्रकार से होती हैः

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One Response to सपने, मंजिलें और रोजगार की बातें …

  1. Parashram Lohar says:

    congrats Dharmraj ji its very real story of every youth but they cant say anyone…….but you captured this real story……!!!!!

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