नन्ही जान और परिवार के परवरिश की चिंता !!

जिंदगी की आपाधापी में मासूमों का क्या हश्र हम कर रहे हैं, कई बार इसके बारे में हम शायद ही कभी सोचते हैं। परिवार के भरण-पोषण की हमारी चिंता कब उन्हीं के खिलाफ हमारी साजिश का रूप ले लेती है, हम जानते भी नहीं और जानते भी हैं तो अनजान बने रहने में ही भलाई समझते हैं। शोषण हमेशा वही नहीं होता जो दूसरों के हाथों होता है। हम अपनों के हाथों भी शोषित होते हैं। इस बात को थोड़ा और आगे बढ़ाएँ तो हम यह कह सकते हैं कि माँ-बाप के हाथों भी बच्चों का शोषण होता है। हो सकता है कि यह बात बहुतों को नागवार गुजरे और इसे वो विकृत मानसिकता की उपज बताएं। पर विशेषकर गरीब और वंचित तबकों का एक बड़ा वर्ग है हमारे देश में ,जो भले ही आर्थिक मजबूरी में यह कर रहा हो, पर अपने मासूमों के नाज़ुक कंधों पर असमय जवाबदेही का भारी बोझ डाल चुका है। वह यह सब करता है परिवार के भरण-पोषण के नाम पर। वह इस बात की दुहाई देता है कि वह उन्हीं मासूमों का पेट भरने के लिए यह सब करता है । पर अपने इस बयान की सच्चाई जाँचने की हिम्मत वह शायद ही कभी जुटा पाता है। वह इस बात से भलीभांति परिचित है कि वह क्या कर रहा है। वह यह जानता है कि वह उसीको जीवन की भट्ठी में असमय झोंक रहा है जिसके जीवन को बचाने की दुहाई वह दे रहा है। इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि जिसकी भलाई की बात की जा रही है, दरअसल वही इसका शिकार बन रहा है।

सड़कों पर भीख मांगते बच्चे। कूड़ों की उस ढेर में रोटी के टुकड़े तलाशते बच्चे जिसके नजदीक तो अमूमन हम जाते नहीं पर अगर चले भी गए तो अपनी नाक दबाके उसके पास से निकलते हैं। होटलों में हमारी जूठन साफ़ करते बच्चे। चाय की दुकान पर कप साफ करते बच्चे। मोटर गराज में ग्रीज और मोबिल ऑइल से तर गाड़ियों के कल पुर्जों को साफ करते बच्चे। हमारे घरों में काम करते हमारे बेटे-बेटियों की उम्र के बच्चे जिन पर जुल्म तक करने में हम कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं करते। हमारे कई लाख के कारों की सफाई करते बच्चे जिनको हम उनकी थोड़ी चूक के लिए भी प्रताड़ित करने से बाज नहीं आते और उसका मेहनताना तक गटक जाते हैं। कहाँ नहीं हैं ये बच्चे! ये हर जगह हैं। और ये सबके सब किसी न किसी के बच्चे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनके सिर के ऊपर अपनों का साया नहीं होता। पर इनमें से अनेकों के पीछे उनका भरा पूरा परिवार होता है। जरा इन बच्चों से इस बाबत पूछिए कि ये क्या कहते हैं? ये बच्चे अपने उसी भरे पूरे परिवार का पेट भरने के लिए अपने बचपन की आहुति चढ़ा रहे होते हैं। पर ये कहीं भी और किसी से भी यह कहते नहीं फिरते कि वो अपने परिवार को पाल रहे हैं। और अगर कहें भी तो भला कौन इन पर विश्वास करेगा! उल्टे कहेगा – “बड़ा आया शेख़ी बघारने वाला, अपने परिवार को पालने के लिए यह सब कर रहा है”! पर सच में है तो ऐसा ही। चलिये आपको मिलवाते हैं 7 साल के सोनू (नाम बदला हुआ) से।

उदयपुर में बेदला से फतेहपुरा की ओर जाने वाली सड़क। शाम के वक़्त इस रोड पर काफी भीड़भाड़ रहती है। हम और सोनू – हम दोनों ही इस भीड़ के हिस्सा थे – अपने अपने तरह से। मैं अपने कमरे की ओर जा रहा था और सोनू तेल में डूबे शनि महाराज की थाली अपने हाथ में पकड़े उस सड़क पर हर आने जाने वालों को दिखा रहा था। कुछ देर बाद हम दोनों आमने-सामने थे। उसने तेल में डूबे काले पत्थर के बने शनि महाराज की थाली को मेरे सामने कर दिया। मैंने देखा उस थाली में एक रुपये के 2-3 सिक्के पड़े थे। मैंने उस थाली को उसके हाथ से लेने की कोशिश की, पर उसने मुझे ऐसा नहीं करने दिया। वह मेरी ओर देख रहा था। दूधिया दांतों की अग्रिम पंक्ति का एक दाँत वह खो चुका था। दुबला पतला सोनू एक हाथ में थाली संभाले था और दूसरे हाथ में प्लास्टिक के एक झोले को। मैंने कहा चलो मेरे साथ। वह थोड़ा सहमा। मैंने कहा – कुछ खाओगे? वह हाँ में सिर हिलाया। वह एकबारगी सब कुछ भूलकर फुदकते हुए मेरे साथ हो लिया बिलकुल वैसे ही जैसे बचपन में हम भी अपने बड़ों के ऐसा कहने पर इसी तरह साथ हो लेते थे। हम दोनों ने सड़क पार किया और पहुँच गए सामने के बीकानेर स्वीट में। मैंने उससे पूछा, “क्या खाओगे – समोसे, कचोड़ी”। “कचोड़ी खिला दो” – वह बोला। कचोड़ी लेकर दुकान के बाहर हम दोनों ही बैठ गए। वह कचोड़ी तो कम खा रहा था पर चटनी ज्यादा चाट रहा था। कारण शायद यह था कि उसकी नन्ही उँगलियाँ कचोड़ी तोड़ नहीं पा रही थी सो वह चटनी ही चाट रहा था। वह जल्दबाज़ी में दिखा। मैंने उससे बात शुरू की। उसने बताया वह 5 भाई है। बाप बाहर काम करता है और काफी दिन पर घर लौटता है। उसने बताया, उसका एक भाई ट्रक चलाता है। दूसरे भाई भी काम करते हैं। वह तीसरी क्लास में पढ़ता है। उसने एक मैला उजला शर्ट और खाकी पतलून पहन रखा था। पतलून कई जगह से फटा था और कई जगह उसको हाथ से सिला गया था। पैर में कोई चप्पल नहीं। यह पूछने पर कि उसको यह काम करने के लिए कौन कहता है, उसने कहा – “मम्मी”। मैंने पूछा, “क्या तुमको यह सब करते अच्छा लगता है, उसने कहा – “नहीं, मुझे अच्छा नहीं लगता”। उसके दूसरे भाई इस काम के लिए नहीं आते – सिर्फ वही आता है। उसने बताया – “अभी तो हम मम्मी के साथ दिल्ली गेट पर यही कर रहे थे”। मैंने पूछा – “तो क्या तुम्हारी मम्मी खुद घर चली गई और तुमको अब यहाँ यह सब करने के लिए कह गई”? बोला – “नहीं। मैं तो घर जाकर आया हूँ। घर जाकर मुझे लगा कि अभी बैठकर क्या करूंगा, तो मैं यहाँ आ गया”। यह स्तब्ध करने वाला जवाब था। 7 साल का बच्चा यह सब कह रहा है जो घर के बड़े-बुजुर्ग कहा करते हैं। इस कच्ची उम्र में दायित्व का इतना बड़ा बोध! क्या यह बच्चा है? क्या इसमें बचपन बचा हुआ है? उसने मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर एक वयस्क की तरह दिया। कचोड़ी से चटनी को चाटते हुए एक बार भी उसने अपनी बाल सुलभ चंचलता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। मेरी ओर देखते हुए कहा, “अब मैं इसे नहीं खाऊँगा” और पेपर के जिस प्लेट में वह खा रहा था उसी में बचे हुए कचोड़ी को लपेटकर उसने अपने झोले में रख लिया। अपने शर्ट की बाजू से अपना मुंह और हाथ को अपने पतलून में पोछते हुए वह उठ खड़ा हुआ। बोला, “अब मैं जाता हूँ”। सड़क पर अब भी काफी भीड़ थी – सोनू एक बार फिर इस भीड़ का हिस्सा बन चुका था।

अशोक झा

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One Response to नन्ही जान और परिवार के परवरिश की चिंता !!

  1. Bhaskar says:

    very touching dear. padhkar dil me kya hua,…………. kah nahi sakte,…………….. ek soonay, ak vedna, ak kasmkash, ya ,ek sannata, …..bayan nahi kar sakte!!!

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