विकलांगता नहीं आई आड़े….बन ही गया टेलर-मास्टर

मोहन बना गाँव वालो के लिए एक मिसाल

चार माह बाद जब मैं मोहन से मिलने उसके घर गया तो देखा कि उसके घर पर 4-5 लोग कपड़े सिलवाने के लिए तैयार खडे थे और मोहन उन सभी का नाप ले रहा था। मैं खुश हो रहा था, कि स्टेप से निकला हुआ हमारा प्रशिक्षणार्थी आज अच्छा कार्य कर रहा है। दोनों पैरों से विकलांग होते हुए भी कड़ी मेहनत और परिश्रम से मोहन अब टेलर-मास्टर बन गया और 300-400 रुपया प्रतिदिन कमा लेता है।

कुछ देर बाद मोहन और मेरा बातों का सिलसिला शुरु हुआ। मैने मोहन के परिवार के बारे में जानना चाहा। 2014-09-23 13.44.36मोहन ने बडे ही दुख के साथ बताया की जब वह 7 वीं कक्षा में पढ रहा था, तब उसकी माँ और पिताजी का देहान्त हो गया। उसका पालन-पोषण उसकी दादी माँ ने किया। घर में छोटा भाई, भाभी और एक भतीजा है। भाई-भाभी खेती और घर का काम करते है। उसकी शारीरिक अक्षमता की पेंशन से दादी घर का गुजारा कर रही थी। मोहन कक्षा 7वीं से आगे अपनी पढ़ाई नहीं कर पाया।

गांव देवला, तहसील धरियावद, जिला प्रतापगढ़ के मोहन लाल मीणा ने मेट के अनियमित काम से आर्थिक-जीवन की शुरुआत की। 2014-09-23 13.29.37 इस आय से स्वयं का खर्च उठाना भी मुश्किल था, तब सलुम्बर के भबराना श्रमिक केन्द्र से जुड़ी उजाला किरण (महिला आगेवान) ने आजीविका ब्यूरो द्वारा करवाए जाने वाले प्रशिक्षणों के बारे में बताया। मन में संकोच और डर के बावजूद हिम्मत जुटाकर एक दिन भबराना श्रमिक केन्द्र जाना हुआ। केन्द्र के कार्यकर्ता ने उदयपुर स्थित स्टेप एकेडमी के माध्यम से जारी प्रशिक्षणार्थियों की जानकारी दी। मोहन की शारीरिक अक्षमता को देखते हुए उन्हें पूरी संतुष्टि दिलाते हुए टेलरिंग-मेंस वियर प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में बताया। मोहन ने स्टेप के एक माह के हुनर प्रषिक्षण को करने का विचार बनाया। मोहन ने बताया कि उसके मन में उस समय अलग तरह के विचार चल रहे थे, 2013-10-24 13.16.33 कि कैसे वह उदयपुर जाएगा? एक माह अपने घर से दूर रह पाएगा आदि? उसने घर जाकर भाई और दादी माँ से बात की। घर के सदस्य भी तैयार हो गए। आखिरकार मोहन दोनों हाथों से चलता हुआ स्टेप एकेडमी उदयपुर पहुंचा और फरवरी 2013 में आरंभ हुए सिलाई प्रशिक्षण के बैच में शामिल हुआ। बड़ी मेहनत और लगन से उसने पूरे एक माह प्रशिक्षण प्राप्त किया।

मोहन ने बताया कि स्टेप एकेडमी के बारे में जितना सुना था उससे काफी अच्छा महसूस हुआ। वहाँ सभी प्रशिक्षणार्थियों को प्रायोगिक और सैद्धान्तिक रुप से काम सिखाया गया, बड़ा मजा आता था। मोहन ने हंसते हुए बताया कि एक महीना कब बीत गया, पता ही नहीं चला। वहाँ से घर आने का भी मन नहीं कर रहा था। लेकिन गांव आने के बाद कुछ अलग-सा महसुस हो रहा था, मुझमें बहुत आत्मविश्वास आ गया था।

कुछ समय तक मोहन सूई की मदद से ही कपड़े मरम्मत करने लगा। लेकिन इतनी कमाई नहीं थी, अब मशीन की जरूरत महसूस हुई। मशीन के लिए पैसों की जरूरत थी, और मोहन के पास पैसे नहीं थे। इन सभी बातों के बावजुद मोहन ने अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया। एक दिन स्टेप एकेडमी से उनका फोलोअप हुआ, और कार्यकर्ता ने काम बढ़ाने में आ रही चुनौतियों के बारे में जाना। मोहन ने अपने घर की सारी स्थिति के बारे में बताया, इसके बाद जूलाई 2013 में मोहन को स्टेप में बुलाकर अमेय फैलोशिप (वित्तीय सहायता हेतु ऋण) के बारे में बताया। उसने अमैय फैलोशिप के लिए आवेदन किया। अगस्त में मिली फैलोशिप में 6350 रुपयों की मदद से सिलाई मशीन और अन्य सामान खरीदने के लिए मोहन एक दोस्त को लेकर आया। बस पर लोड करके मोटर वाली सिलाई-मशीन गांव ले आया, फिर क्या था, अब तो गाड़ी चल पड़ी। धीरे-धीरे लोग आने लगे और अपने कपड़े सिलने के आॅर्डर देते रहे। आरंभिक चुनौतियां का सामना करते हुए मोहन ने धीरे-धीरे अपने गाँव में अपनी पहचान बना ली। लोग कपडे सिलवाने के लिए आने लगे। कुछ समय बाद महिलाएं भी कपडे सिलवाने आने लगी। कुछ समय बाद मोहन को इंटरलाॅक मशीन की आवश्यकता महसुस हुई, और उसने कुछ पैसे एकत्र कर वह मशीन भी प्रतापगढ़ से खरीद ली।

काम के शुरुआती दौर में घर के बाहर कच्चे में से काम को शुरु किया। लेकिन आज मोहन ने अपनी कमाई का एक-एक पैसा जोडकर दुकान के लिए एक पक्का कमरा बनवाया है। उसने बताया की वह थोडे और पैसे इकठ्ठे करके काम के विस्तार के लिए एक और मशीन लाना चाहता है। काम को इस तरह जमाना चाहता है ताकि गाँव के लोगो को कपड़े सिलवाने के लिए शहर जाना नहीं पड। वह अपने समाज में एक मिसाल कायम करना चाहता है।

मोहन बहुत ही मेहनती है, दोनों पैरों से विकलांग होने हुए आज वह किसी के ऊपर निर्भर नहीं है और होकर स्वयं के बलबुते पर काम कर रहा है। उसने अमैय फैलोषिप में मिली पूरी राषि भी आजीविका ब्यूरो को चुकता कर दी है। मोहन से बातें करते-करते मुझे समय का ध्यान ही नहीं रहा, विदा लेते समय मैं मोहन को उज्ज्वल भविष्य के लिए बहुत सारी शुभकामनाएँ दी। मैने महसूस किया कि उसकी आंखों में भविष्य के प्रति एक चमक थी।

परशराम लौहार

आजीविका ब्यूरो

श्रमिक सहायता एवं सन्दर्भ केन्द्र, सलूम्बर

(Meet one of our young team members at Aajeevika – Parasram Lohar. Paras has been with the organization for one and half years now and brings in great dynamism and will to learn, reflect and do better. Happiness and positivity personified, that’s how his team knows him. This is the first blog from Paras and we wait to read many more…)

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One Response to विकलांगता नहीं आई आड़े….बन ही गया टेलर-मास्टर

  1. Dharmraj Gurjar says:

    Very good Parshram,
    Mohan ki kahani padh kar mujhe 4 line yad aai….
    Dar mujhe b laga fasla dekh kar..
    Par mai badta gaya rasta dekhkar..
    Khud-b-khud mere najdik aati gai..
    Meri manjhil mera Honsla dekh kar..!!
    Shubkamnao k sath, aage b likhte rahna!!!

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