“पढाई ना करके हमें मूर्ख थोड़ी रहना है”

“पढाई ना करके हमें मूर्ख थोड़ी रहना है”

2015-04-28 18.10.16-1

Sankha Sabar

“माँ बाप्पा धरीना जाऊ चंदी, कष्ट करू चंती, हैमे आजीकाली रापिला कॉस्ट काहे करीबो. पाठा ना पढ़ीले मूर्खो हेबू.” (मेरे माता पिता मजदूरी करने जाते हैं, बहुत कठोर काम करते हैं, हम आजकल ऐसे कठोर काम नहीं कर सकते हैं, पढेंगे नहीं तो मूर्ख रह जायेंगे. ये कहना था 11 वर्षीया किशोरी संखा साबर का जो कि 5वीं क्लास में पढ़ रही है और देव दत्ता क्लब, द्वारा चलाये जा रहे दादन शिशु शिक्षा केंद्र[1] में भी पढाई करने आती है. जोगीमठ गाँव के हरिजन मौहल्ले में चलने वाले दादन शिशु शिक्षा केंद्र में संखा सहित 14-15 बच्चे हैं जो कि ईंट भट्टा में मजदूरी करने के लिए गए परिवारों से ताल्लुक रखते हैं. संखा अपने दादी-दादा के यहाँ अपनी छोटी बहन (8) के साथ रहती है. इसके माता-पिता हैदराबाद (तेलंगाना) के पास ईंट भट्टा में मजदूरी करने के लिए गए हुए हैं. किस जगह पर काम करते हैं इसकी जानकारी ना तो इस छोटी बच्ची को थी और ना ही उसके दादी-दादा को. खैर जब इस बच्ची से बात कर रहे थे तो उसके जवाबों में एक अलग ही आत्मविश्वास और उम्र से अधिक समझदारी झलक रही ही. जहाँ सभी बच्चे अपना नाम बताने में हिचक रहे थे वहीँ संखा पढाई के महत्व, अपने भविष्य के सपनों तथा मजदूरी करने गए माता-पिता और परिवार की कठिनाइयों जैसे जटिल विषयों के पेचीदा सवालों के फर्राटेदार (उडीया भाषा में) जवाब दिए जा रही थी. आमतौर पर इतने छोटे बच्चों से इस प्रकार की बातें कर पाना मुश्किल होता है, परन्तु उसके द्वारा दिए जा रहे उत्तरों से उत्साहित होकर हम भी उससे बातें किये जा रहे थे.

ओडीशा के बरगड़ जिले से भारी संख्या में ईंट भट्टा में काम करने के लिए प्रवास  करते हैं. अधिकतर श्रमिक पूरे परिवार के साथ जाते हैं, ऐसे में वे अपने स्कूल जाने लायक बच्चों को भी साथ ही ले जाते हैं. एक तो बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता है जिसके पास छोड़कर जाये और दूसरा पढाई के महत्व को भी दरकिनार करते हैं, बच्चे भी काम में थोडा हाथ बटा देते हैं, जिसके लालच में भी उनको साथ ले जाते हैं. यहाँ से ईंट भट्टा में काम करने वाले अधिकतर श्रमिक हैदराबाद शहर के आप-पास तेलंगाना राज्य में जाते हैं. वहां पर भाषा की भी दुविधा है कि अगर बच्चों को पढ़ना चाहें भी तो मुश्किल होता है. वहां के स्कूलों में तेलगु माध्यम होने के कारण भी अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते है. पिछले कुछ वर्षों में ‘एड इट एक्शन’ ने शिक्षा के क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है जिसमें उडीया शिक्षक भट्टों पर बच्चों को पढाते हैं, जिससे इन बच्चों को अपनी भाषा में पढाई जारी रखने का मौका मिलता है. परन्तु यह प्रयास भी बहुत ही छोटे स्तर पर व नाकाफी है.

गाँव में जब हम ईंट भट्टों में जाने वाले श्रमिकों के परिवार वालों से बात करने लगे तो उन्होंने ईंट भट्टों में काम करने वाले श्रमिकों कि समस्याओं पर गौर करें तो अनेकों प्रकार की समस्याएं सामने आती है. जिनमें ज़्यादातर ठेकेदार इन प्रवासी मज़दूरों को पूरी मज़दूरी नहीं देते। उन्हें बस किसी तरह दो जून पेट भरने लायक मज़दूरी दी जाती है, बाकी ठेकेदार अपने पास रखे रहता है कि काम पूरा होने पर इकट्ठा देगा। लेकिन अक्सर इसमें भी काफी रकम धोखाधड़ी करके मार ली जाती है. काम पर जाने से पहले कुछ राशि अग्रिम देने का प्रचलन है जो कि श्रमिकों को बंधुआ बना कर रखने और मजबूरीवश काम करने का एक तरीका है. ठेकेदार द्वारा छुट्टी नहीं देना, बीमार होने पर समय पर इलाज नहीं मिलता है, अनजान शहर में अस्पताल दूर होते हैं, गर्भवती महिलाओं को टीके नहीं लग पाते हैं. बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य का तो कोई ठिकाना ही नहीं है. निजी प्रक्टिसनर (डॉक्टर) गली के ठगों की तरह उनकी जेब से आखि़री कौड़ी भी हड़प लेने की फिराक में रहते हैं। इन श्रमिकों के साथ होने वाली समस्यायों की लिस्ट बहुत लम्बी है परन्तु आजीविका के अन्य साधनों के अभाव में मजबूरीवश उनको इस काम में जाना पड़ता है.

इस प्रकार के हालत में ‘देव दत्ता क्लब’ द्वारा चलाये जाने वाले ‘दादन शिशु शिक्षा केंद्र’ बच्चों की शिक्षा को बढ़ावा देने और उनको बालश्रम से दूर रखने का एक कारगर तरीका है. इससे बच्चे अपने ही गाँव में, अपने रिश्तेदारों के साथ रहते हैं व स्कूली शिक्षा से जुड़ पाते हैं. इस कार्यक्रम के तहत बच्चों के पोषण पर भी ध्यान दिया जाता है जिसमें भत्ता स्वरुप उस परिवार को कुछ राशि संस्था द्वारा दी जाती है. वर्तमान में 10 दादन शिशु शिक्षा केन्द्रों में लगभग 200 बच्चे आते हैं. इनमें से अधिकतर बच्चे ऐसे हैं जो कि पहले अपने माता-पिता के साथ काम पर जाते थे और अब एक दो वर्षों से यंही रूककर स्कूल जाने लगे हैं. संस्था के इस प्रयास को सरकार ने भी अपनाया है और इसी तर्ज पर बच्चों को रोकने के प्रयास किये जा रहे है. वास्तव में सरकार ही बड़े स्तर पर इस प्रकार के नीतिगत बदलाव कर ईंट भट्टा में कार्य करने वाले श्रमिकों के बच्चों को बालश्रम के दलदल से बचने और शिक्षा की अलख जगाने में का कार्य कर सकती है.

 

सन्तोष पूनियां

कार्यक्रम प्रबंधक, आजीविका ब्यूरो, उदयपुर

[1] दादन शिशु शिक्षा केंद्र ‘देव दत्ता क्लब’  द्वारा चलाये जाने वह केंद्र हैं जो ईंट भट्टों में मजदूरी करने के लिए जाने वाले श्रमिकों के बच्चों को गाँव में ही रोक कर पढाई कराते है. इस केंद्र के माध्यम से बच्चों को उनके गाँव में ही रिश्तेदारों के साथ रुकने के लिए प्रेरित किया जाता है और उसकी पढाई को जारी रखने के लिए स्कूल के बाद इस केंद्र में अतिरिक्त पढाई कराई जाती है. उसी गाँव के एक वालंटियर द्वारा जो कि केंद्र संचालक होता है, बच्चों को होमवर्क करने, कठिन विषय जैसे इंग्लिश, गणित, विज्ञान आदि की पढाई में मदद की जाती है. एक केंद्र में लगभग 15-18 बच्चे होते हैं. ‘देव दत्ता क्लब’ ओडिशा के बरगड जिले में काम करने वाली स्वयं सेवी संस्था है जो कि टाटा ट्रस्ट्स के प्रवासी श्रमिक कार्यक्रम के तहत CMLS के साथ कार्य करती है.

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One Response to “पढाई ना करके हमें मूर्ख थोड़ी रहना है”

  1. Kamlesh Sharma says:

    Nice write up Santosh ji,… Chhoti si Sankha hame dher saari ”asha” bandhati hai.

    Kamlesh Sharma
    Salumbar

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