मुम्बई छूट गई साब !!

इस बार की पहली बारिश ने मुझे पिछले साल की बारिश में मिले एक व्यक्ति की कहानी याद दिला दी।IMG-20150106-WA0056 बरसात से बचने के लिए मुझे कालू के घर में शरण लेनी पडी। बरसात इतनी तेज थी कि वहां रुके रहने के अलावा कोइ चारा नहीं था। कालुलाल मीणा दोलपुरा में पंखे की छोटी-मोटी रिपेयरिंग का काम कर रहा था। उसने मुझे चाय ऑफर की ’साब] चाय पियोगे क्या?’ चाय के साथ कालू के बारे में जानने का क्रम भी शुरु हो गया। बीच-बीच में मेरे सवालों के जरिये कालू अपनी कहानी बहुत रोचक ढंग से सुनाने लगा, किसी मंझे हुए किस्सागोह की तरह। मैं सुनता रहा। कहानी ज्यों-ज्यों आगे बढती गई कालू एक हीरो की तरह उभर कर सामने आने लगा। उसकी कहानी में वो सब था जो किसी बाॅलीवुड  फिल्म में होता है। उम्मीदें, कामयाबी, हताशा, पाश्चाताप, नाटकीयता, संघर्ष सब कुछ।

कालु, उम्र 32 वर्ष, उदयपुर जिले की सलूम्बर तहसील के दौलपुरा गांव का रहने वाला। पिता की 5 संतानों में से एक कालू 5वीं तक ही पढ पाया। गांव में मूम्बई और अहमदाबाद में रहकर काम करने वाले लोगों को देखकर उसे हमेशा अच्छा लगता था। रंग-बिरंगे कपडे, अच्छे जूते, मोबाईल और जैब में पैसा और उसका मनचाहा उपयोग। कालू को यह सब देखकर मन करता था कि वह भी  जाए कुछ कमाए और सारे शौक पूरे करे।

उसका यह सपना उसी के गांव के एक प्रवासी श्रमिक के जरिये पूरा हुआ। 14 साल की उम्र में कालू ने गांव सेUntitled बाहर कदम रखा, सीधा मुम्बई। दिल में डर और उत्साह दोनों थे। जाते ही चाय की स्टाॅल पर काम मिला। 1200 रुपया महीना की तनख्वाह और रहने-खाने की व्यवस्था सेठ की। कालू को शहर पसन्द आया लेकिन काम कुछ जमा नहीं। मन में सवाल उठता था-ये काम करने आया हूं अपने घर से इतना दूर? लेकिन उसके हाथ में ज्यादा कुछ था नहीं। पूरे 2 साल चाय की स्टाॅल पर काम करता रहा कालू। मन मुम्बई में लग चुका था। हर 5-6 माह में वह घर भी आ जाता। घर पर पैसा भी भेजने लगा। वो खुश था कि उसको भी गांव में उन्हीं नजरों से देखा जाने लगा जो उसका सपना था।

कमाने लग गया कालू तो शादी भी हो गई उसकी। घर की जिम्मेदारी बढी तो पैसा ज्यादा कमाना जरुरी था। कालु ने काम बदला। ज्यादा कमाने के लिए वह मुम्बई में ही एक सेठ के यहां घरघाटी का काम करने लगा। इस बार तनख्वाह 2500 रुपया और रहना खाना फ्री। यह काम पहले वाले से बेहतर था। थोडा मान सम्मान भी इसमें।

एक दिन किसी काम से बाहर जाते हुए कालू का एक्सीडेन्ट हो गया और उसके पैर की हड्डी टूट गई। सेठ ने ईलाज करवा के घर भेज दिया। कालु को 2 महीने बिस्तर में पडे रहना पडा। काम छूट गया और पैसों का भी नुकसान हुआ। इस बीच कालू की पत्नी गर्भवती थी। वह चाहता था कि इस दौरान वह आस-पास रहे लेकिन कमाना बहुत जरुरी था। आस-पास कोई काम मिलना मुश्किल भी था। मुम्बई ही चारा था। ठीक होते ही कालू फिर मुम्बई लौटा। हाथ-पैर मार के उसने फिर काम ढूंढा। इस बार होटल में वेटर की नौकरी मिली। तनख्वाह 3500 रुपये प्रतिमाह और रहना खाना यहां भी फ्री।

इस बीच दौरान उसकी पत्नी गर्भवती थी। काम जमने ही लगा था कि कालु को एक और झटका लगा। घर पर पत्नी को अचानक पेट में में दर्द उठा। पर उसे अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं था। सही वक्त पर ईलाज नहीं मिलने की वजह से उसके बच्चे की पेट में ही मृत्यु हो गई। यह उसके लिए जिन्दगी का सबसे बडा सदमा था। उसको आज भी यह दर्द सालता है कि काश! वो जरुरत के वक्त अपनी पत्नि के पास होता तो उसका बच्चा जिन्दा होता।

सदमे से उबरकर कालु ने फिर मुम्बई का रुख किया। वापस आकर उसने उसी होटल में काम करना शुरु किया। जिज्ञासु कालु ने अगले तीन साल इसी होटल में काम किया। पगार बढकर प्रतिदिन रु.300 हो गई और अब तक कालु बन गया था एक मंजा हुआ शेफ यानि रसोइया। सेठ की आंखों का तारा बनने के बाद भी कालू को चैन नहीं था। नौकरी करना उसकी फितरत में नहीं था।

पगार बढी तो कुछ बचत होने लगी। कालू ने खुद का धंधा शुरु किया। वह एक ठेला लगा कर खाना बनाने का काम करने लगा। काम चल पडा। कमाई 500 से 1000 रुपया दिन तक पंहुच गई। पैसा इकठ्ठा कर वह बैंक खाते के माध्यम से गांव में पत्नी भेजने लगा। कालु हंसते हुए कहता है- ’’मुझे लगा अब मेरे अच्छे दिन आ चुके है। ’’ किन्तु दिक्कतें तो कालू का पीछा नहीं छोडना चाहती थी। बूढे पिताजी अचानक चल बसे। पिताजी को खोने के सदमे के साथ की कालू का काम भी एक बार फिर बिखर गया। अपने जमे-जमाए काम की सुध लेने तक कालु वापस मुम्बई नही जा सका। पिता के नहीं रहने के चलते खेती, परिवार की जिम्मेदारी का सारा बोझ आ पडा। यह बताते-बताते वह भावुक हो गया- ’’ मुम्बई छूट गई साब!!’ मानो वह कह रहा हो बहुत कुछ छूट गया उसका। मुम्बई का शेफ जो 800-1000 रुपये दिन में कमा लेता था अब गांव के आस-पास ही 200 से 250 रुपये की मजदूरी करने लगा। मन खराब रहता था। क्योंकि गांव में उसके काम की का कोई मूल्य नहीं बचा था। इतने कम पैसे और वो भी कभी-कभी। गुजारा चलाना मुश्किल था.

कुछ महीने बहुत कठिन बीते। एक दिन कालू का सम्पर्क श्रमिक केंद्र सलूम्बर से हुआ। प्रशिक्षण की बात झट से कालु को भा गई। उसने मोटर वाइंडिंग का प्रशिक्षण लिया। रसोइया अब मोटर मिस्त्री बनने को तैयार था। वह अभी सलूम्बर कस्बे में एक दुकान पर काम करता है और घर पर भी काम करता है। कुल मिलाकर महिने में 8 से 10 हजार रुपया कमा लेता है। अब उसका काम-काज फिर जमने लगा है। गांव में अच्छे घरों में गिनती होती है उसकी।

’साब, किस्मत ने साथ दिया होता तो बात कुछ और ही होती।’ हंसते हुए कालू अपनी कहानी को विराम देने की कोशिश करता है। साथ ही यह भी कहता है अभी बहुत कुछ करना है। महज 32 साल के कालू ने सब कुछ झेला है, सहा है, लेकिन वह टूटा नहीं है। ना ही उसकी विनम्रता में कमी आई है और ना उसका आगे बढने का हौंसला कम हुआ है। उसका सपना है कि वह कस्बे में स्वयं की दुकान लगाए। उसकी आंखों की चमक बताती है कि वह जल्दी ही यह सपना भी पूरा कर लेगा। स्पष्ट है कालू की कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई। फिलहाल इतना ही अगर कालू कुछ और बतायेगा तो वो भी आप तक पंहुचाउंगा। धन्यवाद ।।

परशराम लौहार

आजीविका ब्यूरो, श्रमिक सहायता एवं सन्दर्भ केन्द्र, सलूम्बर

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