मुम्बई आंखो-देखी

मुम्बई शहर से मैं इतना वाकिफ नहीं हूं लेकिन शहर के कुर्ला और पठानवाडी इलाके के बारे में बहुत सुना था राजस्थान में काम करते हुए वहां से आने वाले प्रवासी समूह से। ज्यादातर इसी इलाके में आकर काम करते हैं। आज मौका मिला यहां आने का। अपने मूम्बईकर दोस्त दीपक के साथ रिमझिम बारिश में शाम 6 बजे पठानवाडी पहुंचा। मलाड एरिया का हिस्सा है। सडक किनारे लगी बडापाव की लॉरी से हमने पहले एक-एक वडापाव लिया और फिर एक और लेकर लोभी मन को समझाया।

वडापाव की लारी के पीछे की ओर बने सुलभ शौचालय व पास में ही कचरे के ढेर से रह-रह कर दुर्गंध आ रही थी। हर जगह कतार – लारी पर भी, शौचालय पर भी। दुर्गंध बहुत तेज थी। समझ नहीं आ रहा था कि दुर्गध्ं पर के कैसे रिएक्ट करुं? इतनी भीड में सब के सब सहज दिख रहे थे। यहां तक दोस्त दीपक भी। आदत हो जाना शायद इसी को कहते हैं।pathanwadi1

तंग गलियों से होकर हम एक रूम के बाहर पहुंचे। यहां गली में से गुजरना भी एक कला है। सामने से कोई आता हुआ दिख जाये तो किसी कोने में या कमरे के दरवाजे के सहारे खड़े होकर आने का रास्ता देना। धैर्य, कर्तव्य सब की जरुरत होती है यहां।

खैर, हमें उपर वाले कमरे में जाना था। चढाई शुरु की तो उपर के कमरे से चेतावनी आई – “ध्यान से आना साब।“ लोहे की संकडी सिढियां एकदम सीधी थी, इतनी सीधी की अगर गिरे तो बिना सीढी को छूए आप नीचे तक एक ही बार में पंहुच जाएं। एक रस्सी थी जिसे पकडकर उपर (कमरे में) पंहुचे। कमरे में दो लोग मौजुद थे, पता चला उन्हें आज काम नहीं मिला इसलिए जल्दी आ गये।

पूरे कमरे में उजाला करने का दायित्व एक छोटे से बल्ब पर था जो जैसे-तैसे ’तमसो मा ज्योतिर्गमय” की भूमिका निभा रहा था। जिस बोर्ड पर बल्ब जल रहा था उसी पर 4-5 मोबाईल चार्जर लगे थे। दीवारों पर बैग-थेले टंगे हुए थे। छत देख पाना मुश्किल था, कपड़े सूख रहे थे उपर।

कपड़ों की तादाद से लग रहा था कि यह कम से कम 20 से 25 लोगो का आशियाना था। बातों ही बातों में पता चला और अनुमान भी था…यहां पूरा ग्रुप राजस्थान के धरियावद क्षेत्र से हैं।

थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति ने कमरे में प्रवेश किया। हाथ में आटे की थैली और चेहरे पर परेशानी लिए हुए। आते ही उसने अपना फोन चार्जर से जोडा और फोन किया और सामने वाले को डांटने लगा। पता चला कि उसके बैंक अकाउन्ट से किसी ने पैसे निकाल लिए।

यह भेरु था और फोन पर वह अपनी पत्नि से बात कर रहा था। भेरू को पत्नि ने बताया कि उसने पैसे नहीं निकाले तो भेरु की चिन्ता और बढ गई।

इतने में एक और व्यक्ति थैली में सब्जी, तेल इत्यादि लेकर कमरे में पंहुचा। ये उस शाम और आने वाली सुबह का राशन था। हर दिन शाम को राशन आता। अब तक दस-बारह लोग आ चुके थे। बिना ज्यादा बातचीत के उनमें से सभी खाना बनाने की गतिविधि में सम्मिलित हो गए।

भेरू अभी भी व्यथित था और कभी पत्नी, कभी बैंक के कस्टमर केयर से बात कर पता कर रहा था कि पैसा किसने निकाला? तभी एक 20-22 साल का लडका अन्दर आया। यह प्रकाश था। यह भेरु से भी ज्यादा परेशान दिख रहा था। प्रकाष ने बताया कि गांव में मां की तबीयत ज्यादा खराब है अभी जाना पड़ेगा। एक चिन्तित साथी ने हाजरी कार्ड मे हाजरी भरते हुए पुंछा: प्रकाश पैसा मिला?

प्रकाश ने अपना हाजरी कार्ड उसे देते निराशा में कहा- ”सेठ ने आज पैसा नहीं दिया हैं, वापस आकर लूंगा। ये कार्ड रखो अगर बीच मे पैसा दे दे तो।” प्रकाश अपना बैग लेकर रवाना होने लगा, दो साथी साथ हो लिए कि स्टेशन तक छोड़ कर आते हैं। प्रकाश के जाने के बाद मैने आशंका जताई – ”सेठ ने पैसे नहीं दिये तो?” उनमें से आशावादी ने बताया कि बीच-बीच मे सेठ हाथ खर्ची देता है तो उससे गांव जाकर आ जायेगा। मैने पूछा, बाद मे भी सेठ ने पैसे नहीं दिये तो? जवाब मिला सेठ बहुत अच्छा हैं, प्रकाश का 15 दिन का पैसा बाकी है, वो नहीं आयेगा तो हमें दे देगा। कभी किसी साथी का पैसा रूका है यहां? pathanwadi2

तभी कौने में बैठा लक्ष्मण खड़ा हो गया। अपने बैग से 8 हाजरी कार्ड निकाले जो कि 2010 से 2013 के बीच के थे। लक्ष्मण ने बताया कि मेरा ये सारा पैसा बाकी हैं। जोड़ लगाने पर करीब 38 हजार रूपये लक्ष्मण के अलग-अलग सेठों के पास बाकी निकले। लक्ष्मण के इतने सेठों के पास बकाया है, यह बात बाकी साथियों को पता नहीं थी। थोडी अजीब बात है लेकिन सच है।

धीरे-धीरे कमरा पूरा भर चुका था। सबके आने का टाईम अलग अलग था। पता चला जो जितना दूर काम पर जाता उतना ही देर से कमरे तक आता। काम से आने वाले श्रमिक कमरे के एक कोने मे बने खुली जगह में हाथ-पैर धोते है। फिर हाजरी कार्ड भरते और मोबाईल चार्ज पर लगाकर बैठ जाते।

सभी के सोने के लिए यह कमरा छोटा पड़ता है तो कुछ साथी बाहर सोते हैं। बाहर की दूकाने बन्द होने का इन्तजार करते है। करीब 12 बजे दुकाने बन्द होने के बाद दूकानों के बाहर सो जाते हैं। सुबह जल्दी पानी की सप्लाई आती है, नहाने के लिए 5 बजे उठ जाते हैं।

करीब घण्टे भर की बातचीत के बाद हम वापस रवाना हुए। बाहर दरवाजा और सिढियां चप्पल-जूतों से भर गये था। पैर रखने की जगह नहीं बची थी, रस्सी के सहारे नीचे उतरे।

बहुत सवाल थे वापसी में। भेरु के पैसे किसने निकाले? क्या उसे वापस मिलेगे उसके ये पैसे? प्रकाश बिना पैसों के अपनी मां का ईलाज कैसे करवाएगा। लक्ष्मण का रुका हुआ पैसा उसे मिलेगा या नहीं?

धर्मराज गुर्जर

Dharmraj Gurjar is a spirited young team member at Aajeevika with an experience of leading Shramik Kendra operations at source, organizing skill training for young migrants, and incubating destination programmes in Jaipur and Mumbai. Presently, Dharmraj is working in Mumbai setting up Aajeevika’s newest field centre. He reflects and recounts his experiences as a new comer to the city, of entering this complex migrant destination and engaging with migrants from Rajasthan in Pathanwadi – one of the largest slums of Mumbai.

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