दुदाराम….क्या दिया पिता जी ने

by Dhanraj Jat, Pindwara

dudaram.jpg

Dudaram’s family

ये उन दिनों कि बात है जब श्रमिक सहायता एवं सन्दर्भ केन्द्र पिण्डवाड़ा द्वारा पत्थर घडाई कार्य करने वाले श्रमिकों की लगातार स्वास्थ्य जांच करवाई जा रही थी। इस भाग दौड़ वाले काम से थोड़ा सा समय निकालकर के मैं अजारी ग्राम पंचायत के सारणी फली गांव में श्रमिक मित्र से मिलने पंहुचा। श्रमिक मित्र की दुकान पर थोडी देर बेठा] चाय पी ओर फिर उसके साथ गांव में टहलते हुऐ, एक घर पंहुचा तो मैने देखा की तीन छोटे-छोटे बच्चें लगभग आधी गेंहु की सुखी रोट जिस पर लाल मिर्च ओर पानी डालकर के बडे ही चाव से खा रहे थे। उनके पास ही एक 19 वर्ष का दुबला-पतला सा नौजवान जो कि जोर-जोर से सांस ले रहा था। वह मुझे देखकर के जैसे-तेसे टुटी खाट पर बैठ गया एवं धीमी से आवाज में पुछा आप कौन  मैने अपना परिचय दिया और फिर हमारी बातचीत शुरु हुई।

उस दुबले-पतले नौजवान ने जोर-जोर से सांस लेते हुऐ अपना नाम दुदाराम गरासिया बताया। दुदाराम ने बताया कि मेरे दादा श्री परथाराम के दो पुत्र एवं एक पुत्री थी। बडे पुत्र का नाम मानाराम एवं छोट पुत्र का नाम सोमाराम था। परथाराम के पास 6 बीघा जमीन थी। वह खेती करता एवं अपने परिवार का लालन-पालन करता। प्रथाराम के बडे बेटे मानाराम का विवाह होने पर वह भी खेती बाडी करने लगा ओर पिता का परिवार का खर्च चलाने मे हाथ बटाने लग गया। कुछ समय बाद सोमाराम का विवाह भी यहा की स्थानीय गरासिया समाज के रीती&रिवाज के अनुसार हो गया। जिससे सोमाराम पर भी परिवार चलाने की जिम्मेदारी आ गई।

परन्तु सोमाराम द्वरा अपनी पैतृक 3 बीघा जमीन पर खेती नही करते हुऐ अपने परिवार की आजीविका उपार्जन के लिए पत्थर घडाई का कार्य अजारी ग्राम पंचायत में स्थित पत्थर घडाई कारखाने मे करने लगा । सोमाराम पत्थर घड़ाई का कार्य में थोडे ही समय में इतना निपुण हो गया की उस कारखाने में सबसे अधिक मजदूरी मिलने लग गई। सोमाराम को आज से लगभग 18-20 वर्ष पहले 150-180 रुपये दिन की मजदूरी मिलती थी। सोमाराम ने पत्थर घडाई का कार्य 7-8 साल किया एवं फिर नई मशीन ग्राइन्डर आ गई।

पत्थर घडाई के कार्य में ग्राइन्डर आने से कार्य तेजी से होने लगा। सोमाराम ने भी ग्राइन्डर से काम करना आरम्भ कर दिया एवं 250-300 रुपये कमाने लग गया। इस प्रकार से सोमाराम के परिवर के आय बढ़ने से आस-पास उसके हुनर की काफी चर्चा होने लगी। इस बीच सोमाराम ने अपनी कमाई से हिरोहोण्डा की बाईक खरीद कर के सबको चौका दिया। क्योकि उस समय कुछ आर्थिक रुप से सम्पन्न व्यक्ति ही बाईक का उपयोग करते थे। सोमाराम की चारो ओर वाही&वाही होने लगी। इस सब के बीच सोमाराम के पांच बच्चे भी हो चुके थे।

     आर्थिक दौड़ में दोडते हुऐ सोमाराम द्वारा ओर 4-5 साल ग्राइण्डर से पत्थर घड़ाई का काम किया ओर उसको सांस की थोडी-थोडी समस्या होने लगी। उसने आस&पास के अस्तपताल में अपने स्वास्थ्य की जांच करवाई] परन्तु आराम नही आया। इस पर वह अपने स्वास्थ्य की जांच करवाने के लिए हमीरगढ़ पंहुचा। वहां पर डाक्टर सहाब ने कुछ दवाई दी] जिससे आराम आ गया ओर फिर से सोमाराम काम पर जाने लगा, परन्तु छ: से सात माह बाद में फिर से सांस की बीमारी हुई। इस बार सोमाराम सीधे ही हमीरगढ़ गया] फिर से डॉक्टर ने कुछ जांच की ओर दवाईया दे दी। इस बार सोमाराम को थोड़ अधिक दिन आराम करना पड़ा। इस प्रकार से सोमाराम शुरुवात में श्वास की समस्या के कारण कुछ दिन आरम करता एवं बाकी दिन अपना काम । कुछ समय और निकलने पर सोमाराम की श्वास की बीमारी ओर बढ़ गई। परन्तु इस बार वह अपने ईलाज के लिए पोसीना गया। परन्तु वहां के डॉक्टर ने सोमाराम को टी.बी की बीमारी बता दी ओर लगातार छ: माह का कोर्स लेने के लिए कहा। इस  प्रकार से सोमाराम माह मे आधे दिन काम करता एवं आधे दिन आराम करता एवं हर माह में एक बार पोसीना दवाईया लेने जाता।

क्योकि सोमाराम को टी.बी की बीमारी थी इस कारण से उसकी घरवाली को भी टी.बी हो गई। जिसके कारण दोनो पति&पत्नी को अपना ईलाज पोसीना व पालनपुर से करवाना आरम्भ कर दिया। परन्तु धीरे-धीरे सोमाराम के काम करने के दिन कम होते चले गये एवं दवाईयों का खर्च बढ़ता चला गया। जिसके कारण हालात इतने खराब हो गये की गांव में आई पहली  बाईक को सोमाराम को 40000 रुपये मे बैचना पड़ा। इसके साथ ही माता&पिता के बीमार का खर्च एवं चार छोटे-छोटे भाई-बहनों के पेट भरने की सम्पूर्ण जिम्मेदारी दुदाराम पर आ गई।

आज से लगभग तीन साल पहले दुदाराम द्वरा पत्थर घडाई का कार्य नपती पर आरम्भ किया गया। दुदाराम खुब मेहनत करने लगा ओर अपने माता&पिता के ईलाज का खर्चा एवं छोटे भाई बहन का पेट भरने लगा। परन्तु माता&पिता की बढ़ती बीमारी के खर्च के आगे उसकी कमाई ने भी घुटने टेक दिये। दुदाराम भी परेशान होकर के अपने माता&पिता के ईलाज के 20 बकरियों को 2000 रुपये एवं 1 बीघा जमीन को 50000 रुपये में बेच दिया। परन्तु माता&पिता का ईलाज नही हो सका। दुदाराम की मां का 2015 में स्वर्गवास हो गया एवं उसके एक साल बाद उसके पिता का भी । इस दौरान एक बीघा जमीन दुदाराम को मात्र 35000 रुपये में बैचनी पडी। इस के साथ ही दुदाराम स्वयं ने लगभग 3 साल पत्थर घडाई का कार्य किया होगा] उसको भी वर्तमान में सिलीकोसिस है। दुदाराम की शादी हो चुकी है एवं उसके एक छ: माह का छोटा सा बच्चा है। परन्तु सिलीकोसिस बीमारी से पीडित होने के कारण उसकी घरवाली ने भी उसको छोड दिया है एवं अपने पीहर रह रही है एवं दुदाराम के उपर वर्तमान में 40000-45000 रुपये उदार है।

दुदाराम ने बताया की अभी मेरे पडौसी आये थे, उनके घर मे जो सुबह की रोटी थी वह देकर के गये है। इस कारण से कसनी (उम्र-14)]सुरमाराम (उम्र-10 वर्ष)] बबलू (उम्र-8 वर्ष) गेंहू की सुखी रोटी] लाल मिर्च पाउडर के साथ खा रहे है। खाना बनाने एवं हमारे ध्यान रखने की पुरी जिम्मेदारी कसनी उठा रही है। कभी-कभी मेरी छोटी बहन सुगना की पति आते है] जो की शेष एक बीघा जमीन की पैदावरी का आधा हिस्सा एवं कुछ अनाज राशन की दुकान से आ जाता है। दुदाराम ने कहा की मेरे पिता भी दुसरों के पिता की तरह मुझ एवं मेरे भाई-बहन को अच्छा भविष्य देना चा​हते थे परन्तु पत्थर घडाई के काम के कारण उन्होने मुझ कर्ज] भुखमरी और बीमारी दि है।

Advertisements
This entry was posted in Migration Musings. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s