Women migrating into Idar through marriage

by Yagyashree Kumar

Idar centre of Aajeevika Bureau situated in Sabarkantha district of Gujarat, is unique among all other centres, as it provides services to migrant agricultural labourers. Farming in Idar region is underpinned by a historical relationshiIdar rocksp between farmer communities and the tribal communities of Chhota Udaipur (Gujarat) and Kotda (Rajasthan), which work as migrant labourers. Under the fellowship programme, my engagement with this centre was for three months. Through my days there, I explored the various layers of share cropping arrangements of farming in this area. Moreover, I also discovered new cultures, ethnicities, customs, mores, food and so on.

My accomodation in Idar is in one of its finest colonies. Though the area is full of native Gujaratis, there are some Hindi speaking women there as well, mostly the daughter-in-laws in those households. Given that the dominant Gujarati culture here is very conservative, I always wondered and felt confused about how these non-Gujarati women were able to adjust in such a conservative environment. I thought there might be incidences of love marriages. To quench my curiosity, I asked one non-Gujarati lady named Suneeta that how come she got married in the non-Gujarati family? She told me that it was an arranged marriage. She was happy with her life as she was going to be a mother in next few months. I wasn’t fully satisfied with her answer, and I remained perplexed by such inter-caste, inter-state marriages. However, I didn’t explore it much at that time.

After few days into the wedding season, my colleagues at the Idar centre were engaged in a discussion on the new trend of inter-caste marriages in the area. As I was quite interested in this topic and had many questions on it, one of them told me a story of a family closely related to him. He told me that the family was facing difficulty in finding a bride for his cousin from their own community, despite his cousin being well qualified and earning well. When all else failed, his family got him married to a girl from the tribal community of Chhota Udaipur region of Gujarat. My colleague told me that the girl is not good looking and there are chances that the boy might not like her. Moreover, the boy’s family is very secretive about where they keep the money in the house and do not disclose it to the daughter-in-law of the tribal background. Continuing the story, my colleague told me that the girl belongs to the same tribal community that Patel farmers (such as the cousin’s family) often employ as sharecroppers. The historical relationship between these communities is of higly unuqual power, poor treatment and even bondage. The colleague shared that there is a growing trend in the area that Patels often fail to find brides within their own community and have to depend on the tribal groups to finds girls for their progeny! Typically, the tribal family demands money and a price to marry their daughters into the Patel families. So, this was not just the story of my colleague’s cousin but many boys from the Patel farmer community in Idar who are increasingly dependent on the tribal communities for farming as well as to carry forward their lineage!

Now going back to Suneeta, who I mentioned at the beginning. Suneeta was the daughter-in-law of a well educated family, in which most members were involved in business or employed in a government job (this family was not a Patel, farmer family). Let me tell you her story as well. Suneeta was from Madhya Pradesh. She was the youngest amongst her siblings (1 brother and 3 sisters). Her father refused to marry her to an unemployed Gujarati boy. But after her father died, Suneeta’s brother married her to this boy as he viewed Suneeta, his only unmarried sister as a ‘huge responsibility’. Though Suneeta told me that she is happy and seemed to be in a positive spirit, I wasn’t fully convinced of it. I continued to view her story within the larger picture frame of the conservative Guajarati community.

Both of these stories seem to be connected to the low sex ration in Gujarat, one of India’s top economic and industrially progressive state. Sex ratio has acted as a powerful indicator to examine social responses and attitudes towards girl child in recent past. (Pandya & Bhatt, 2015). The sex ratio of Gujarat has continued to decline from 952 (1951) to 918 (2011). Though, there is a noteworthy increase in literacy rate from 69.14% (2001) to 79.31% (2011). Some research shows that there is a significant negative correlation between sex ratio and literacy rate. In order words, sex ratio is indirectly proportional to literacy rates. We can say that as literacy rate increases the sex ratio decreases. If I put the stories I narrated above within the frame of this data, they validate the fact that as literacy rate increases (patel community and sub urban educated families like that of Suneeta), sex ratio in those communities decreases. On the other hand, to carry forward the lineage of their own ‘superior’ communities and fear of being extinct these ‘educated’ communities are now dependent on communities from other states or from ‘illiterate’ tribal communities.

I am concerned that is this sex ration keep declining, the situation is likely to get worse. It is the women, tribal or from other communities, who get sold into these loveless, functional marriages that are suffering due to the trends emerging from low sex ratio. The situation is even more complicated than I showed through my stories. However, an interesting change is that the traditinal dynamics between Patel farmer families and tribal communites is now changing and going beyond just employer-employee association!

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मुम्बई छूट गई साब !!

इस बार की पहली बारिश ने मुझे पिछले साल की बारिश में मिले एक व्यक्ति की कहानी याद दिला दी।IMG-20150106-WA0056 बरसात से बचने के लिए मुझे कालू के घर में शरण लेनी पडी। बरसात इतनी तेज थी कि वहां रुके रहने के अलावा कोइ चारा नहीं था। कालुलाल मीणा दोलपुरा में पंखे की छोटी-मोटी रिपेयरिंग का काम कर रहा था। उसने मुझे चाय ऑफर की ’साब] चाय पियोगे क्या?’ चाय के साथ कालू के बारे में जानने का क्रम भी शुरु हो गया। बीच-बीच में मेरे सवालों के जरिये कालू अपनी कहानी बहुत रोचक ढंग से सुनाने लगा, किसी मंझे हुए किस्सागोह की तरह। मैं सुनता रहा। कहानी ज्यों-ज्यों आगे बढती गई कालू एक हीरो की तरह उभर कर सामने आने लगा। उसकी कहानी में वो सब था जो किसी बाॅलीवुड  फिल्म में होता है। उम्मीदें, कामयाबी, हताशा, पाश्चाताप, नाटकीयता, संघर्ष सब कुछ।

कालु, उम्र 32 वर्ष, उदयपुर जिले की सलूम्बर तहसील के दौलपुरा गांव का रहने वाला। पिता की 5 संतानों में से एक कालू 5वीं तक ही पढ पाया। गांव में मूम्बई और अहमदाबाद में रहकर काम करने वाले लोगों को देखकर उसे हमेशा अच्छा लगता था। रंग-बिरंगे कपडे, अच्छे जूते, मोबाईल और जैब में पैसा और उसका मनचाहा उपयोग। कालू को यह सब देखकर मन करता था कि वह भी  जाए कुछ कमाए और सारे शौक पूरे करे।

उसका यह सपना उसी के गांव के एक प्रवासी श्रमिक के जरिये पूरा हुआ। 14 साल की उम्र में कालू ने गांव सेUntitled बाहर कदम रखा, सीधा मुम्बई। दिल में डर और उत्साह दोनों थे। जाते ही चाय की स्टाॅल पर काम मिला। 1200 रुपया महीना की तनख्वाह और रहने-खाने की व्यवस्था सेठ की। कालू को शहर पसन्द आया लेकिन काम कुछ जमा नहीं। मन में सवाल उठता था-ये काम करने आया हूं अपने घर से इतना दूर? लेकिन उसके हाथ में ज्यादा कुछ था नहीं। पूरे 2 साल चाय की स्टाॅल पर काम करता रहा कालू। मन मुम्बई में लग चुका था। हर 5-6 माह में वह घर भी आ जाता। घर पर पैसा भी भेजने लगा। वो खुश था कि उसको भी गांव में उन्हीं नजरों से देखा जाने लगा जो उसका सपना था।

कमाने लग गया कालू तो शादी भी हो गई उसकी। घर की जिम्मेदारी बढी तो पैसा ज्यादा कमाना जरुरी था। कालु ने काम बदला। ज्यादा कमाने के लिए वह मुम्बई में ही एक सेठ के यहां घरघाटी का काम करने लगा। इस बार तनख्वाह 2500 रुपया और रहना खाना फ्री। यह काम पहले वाले से बेहतर था। थोडा मान सम्मान भी इसमें।

एक दिन किसी काम से बाहर जाते हुए कालू का एक्सीडेन्ट हो गया और उसके पैर की हड्डी टूट गई। सेठ ने ईलाज करवा के घर भेज दिया। कालु को 2 महीने बिस्तर में पडे रहना पडा। काम छूट गया और पैसों का भी नुकसान हुआ। इस बीच कालू की पत्नी गर्भवती थी। वह चाहता था कि इस दौरान वह आस-पास रहे लेकिन कमाना बहुत जरुरी था। आस-पास कोई काम मिलना मुश्किल भी था। मुम्बई ही चारा था। ठीक होते ही कालू फिर मुम्बई लौटा। हाथ-पैर मार के उसने फिर काम ढूंढा। इस बार होटल में वेटर की नौकरी मिली। तनख्वाह 3500 रुपये प्रतिमाह और रहना खाना यहां भी फ्री।

इस बीच दौरान उसकी पत्नी गर्भवती थी। काम जमने ही लगा था कि कालु को एक और झटका लगा। घर पर पत्नी को अचानक पेट में में दर्द उठा। पर उसे अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं था। सही वक्त पर ईलाज नहीं मिलने की वजह से उसके बच्चे की पेट में ही मृत्यु हो गई। यह उसके लिए जिन्दगी का सबसे बडा सदमा था। उसको आज भी यह दर्द सालता है कि काश! वो जरुरत के वक्त अपनी पत्नि के पास होता तो उसका बच्चा जिन्दा होता।

सदमे से उबरकर कालु ने फिर मुम्बई का रुख किया। वापस आकर उसने उसी होटल में काम करना शुरु किया। जिज्ञासु कालु ने अगले तीन साल इसी होटल में काम किया। पगार बढकर प्रतिदिन रु.300 हो गई और अब तक कालु बन गया था एक मंजा हुआ शेफ यानि रसोइया। सेठ की आंखों का तारा बनने के बाद भी कालू को चैन नहीं था। नौकरी करना उसकी फितरत में नहीं था।

पगार बढी तो कुछ बचत होने लगी। कालू ने खुद का धंधा शुरु किया। वह एक ठेला लगा कर खाना बनाने का काम करने लगा। काम चल पडा। कमाई 500 से 1000 रुपया दिन तक पंहुच गई। पैसा इकठ्ठा कर वह बैंक खाते के माध्यम से गांव में पत्नी भेजने लगा। कालु हंसते हुए कहता है- ’’मुझे लगा अब मेरे अच्छे दिन आ चुके है। ’’ किन्तु दिक्कतें तो कालू का पीछा नहीं छोडना चाहती थी। बूढे पिताजी अचानक चल बसे। पिताजी को खोने के सदमे के साथ की कालू का काम भी एक बार फिर बिखर गया। अपने जमे-जमाए काम की सुध लेने तक कालु वापस मुम्बई नही जा सका। पिता के नहीं रहने के चलते खेती, परिवार की जिम्मेदारी का सारा बोझ आ पडा। यह बताते-बताते वह भावुक हो गया- ’’ मुम्बई छूट गई साब!!’ मानो वह कह रहा हो बहुत कुछ छूट गया उसका। मुम्बई का शेफ जो 800-1000 रुपये दिन में कमा लेता था अब गांव के आस-पास ही 200 से 250 रुपये की मजदूरी करने लगा। मन खराब रहता था। क्योंकि गांव में उसके काम की का कोई मूल्य नहीं बचा था। इतने कम पैसे और वो भी कभी-कभी। गुजारा चलाना मुश्किल था.

कुछ महीने बहुत कठिन बीते। एक दिन कालू का सम्पर्क श्रमिक केंद्र सलूम्बर से हुआ। प्रशिक्षण की बात झट से कालु को भा गई। उसने मोटर वाइंडिंग का प्रशिक्षण लिया। रसोइया अब मोटर मिस्त्री बनने को तैयार था। वह अभी सलूम्बर कस्बे में एक दुकान पर काम करता है और घर पर भी काम करता है। कुल मिलाकर महिने में 8 से 10 हजार रुपया कमा लेता है। अब उसका काम-काज फिर जमने लगा है। गांव में अच्छे घरों में गिनती होती है उसकी।

’साब, किस्मत ने साथ दिया होता तो बात कुछ और ही होती।’ हंसते हुए कालू अपनी कहानी को विराम देने की कोशिश करता है। साथ ही यह भी कहता है अभी बहुत कुछ करना है। महज 32 साल के कालू ने सब कुछ झेला है, सहा है, लेकिन वह टूटा नहीं है। ना ही उसकी विनम्रता में कमी आई है और ना उसका आगे बढने का हौंसला कम हुआ है। उसका सपना है कि वह कस्बे में स्वयं की दुकान लगाए। उसकी आंखों की चमक बताती है कि वह जल्दी ही यह सपना भी पूरा कर लेगा। स्पष्ट है कालू की कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई। फिलहाल इतना ही अगर कालू कुछ और बतायेगा तो वो भी आप तक पंहुचाउंगा। धन्यवाद ।।

परशराम लौहार

आजीविका ब्यूरो, श्रमिक सहायता एवं सन्दर्भ केन्द्र, सलूम्बर

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“पढाई ना करके हमें मूर्ख थोड़ी रहना है”

“पढाई ना करके हमें मूर्ख थोड़ी रहना है”

2015-04-28 18.10.16-1

Sankha Sabar

“माँ बाप्पा धरीना जाऊ चंदी, कष्ट करू चंती, हैमे आजीकाली रापिला कॉस्ट काहे करीबो. पाठा ना पढ़ीले मूर्खो हेबू.” (मेरे माता पिता मजदूरी करने जाते हैं, बहुत कठोर काम करते हैं, हम आजकल ऐसे कठोर काम नहीं कर सकते हैं, पढेंगे नहीं तो मूर्ख रह जायेंगे. ये कहना था 11 वर्षीया किशोरी संखा साबर का जो कि 5वीं क्लास में पढ़ रही है और देव दत्ता क्लब, द्वारा चलाये जा रहे दादन शिशु शिक्षा केंद्र[1] में भी पढाई करने आती है. जोगीमठ गाँव के हरिजन मौहल्ले में चलने वाले दादन शिशु शिक्षा केंद्र में संखा सहित 14-15 बच्चे हैं जो कि ईंट भट्टा में मजदूरी करने के लिए गए परिवारों से ताल्लुक रखते हैं. संखा अपने दादी-दादा के यहाँ अपनी छोटी बहन (8) के साथ रहती है. इसके माता-पिता हैदराबाद (तेलंगाना) के पास ईंट भट्टा में मजदूरी करने के लिए गए हुए हैं. किस जगह पर काम करते हैं इसकी जानकारी ना तो इस छोटी बच्ची को थी और ना ही उसके दादी-दादा को. खैर जब इस बच्ची से बात कर रहे थे तो उसके जवाबों में एक अलग ही आत्मविश्वास और उम्र से अधिक समझदारी झलक रही ही. जहाँ सभी बच्चे अपना नाम बताने में हिचक रहे थे वहीँ संखा पढाई के महत्व, अपने भविष्य के सपनों तथा मजदूरी करने गए माता-पिता और परिवार की कठिनाइयों जैसे जटिल विषयों के पेचीदा सवालों के फर्राटेदार (उडीया भाषा में) जवाब दिए जा रही थी. आमतौर पर इतने छोटे बच्चों से इस प्रकार की बातें कर पाना मुश्किल होता है, परन्तु उसके द्वारा दिए जा रहे उत्तरों से उत्साहित होकर हम भी उससे बातें किये जा रहे थे.

ओडीशा के बरगड़ जिले से भारी संख्या में ईंट भट्टा में काम करने के लिए प्रवास  करते हैं. अधिकतर श्रमिक पूरे परिवार के साथ जाते हैं, ऐसे में वे अपने स्कूल जाने लायक बच्चों को भी साथ ही ले जाते हैं. एक तो बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता है जिसके पास छोड़कर जाये और दूसरा पढाई के महत्व को भी दरकिनार करते हैं, बच्चे भी काम में थोडा हाथ बटा देते हैं, जिसके लालच में भी उनको साथ ले जाते हैं. यहाँ से ईंट भट्टा में काम करने वाले अधिकतर श्रमिक हैदराबाद शहर के आप-पास तेलंगाना राज्य में जाते हैं. वहां पर भाषा की भी दुविधा है कि अगर बच्चों को पढ़ना चाहें भी तो मुश्किल होता है. वहां के स्कूलों में तेलगु माध्यम होने के कारण भी अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते है. पिछले कुछ वर्षों में ‘एड इट एक्शन’ ने शिक्षा के क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है जिसमें उडीया शिक्षक भट्टों पर बच्चों को पढाते हैं, जिससे इन बच्चों को अपनी भाषा में पढाई जारी रखने का मौका मिलता है. परन्तु यह प्रयास भी बहुत ही छोटे स्तर पर व नाकाफी है.

गाँव में जब हम ईंट भट्टों में जाने वाले श्रमिकों के परिवार वालों से बात करने लगे तो उन्होंने ईंट भट्टों में काम करने वाले श्रमिकों कि समस्याओं पर गौर करें तो अनेकों प्रकार की समस्याएं सामने आती है. जिनमें ज़्यादातर ठेकेदार इन प्रवासी मज़दूरों को पूरी मज़दूरी नहीं देते। उन्हें बस किसी तरह दो जून पेट भरने लायक मज़दूरी दी जाती है, बाकी ठेकेदार अपने पास रखे रहता है कि काम पूरा होने पर इकट्ठा देगा। लेकिन अक्सर इसमें भी काफी रकम धोखाधड़ी करके मार ली जाती है. काम पर जाने से पहले कुछ राशि अग्रिम देने का प्रचलन है जो कि श्रमिकों को बंधुआ बना कर रखने और मजबूरीवश काम करने का एक तरीका है. ठेकेदार द्वारा छुट्टी नहीं देना, बीमार होने पर समय पर इलाज नहीं मिलता है, अनजान शहर में अस्पताल दूर होते हैं, गर्भवती महिलाओं को टीके नहीं लग पाते हैं. बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य का तो कोई ठिकाना ही नहीं है. निजी प्रक्टिसनर (डॉक्टर) गली के ठगों की तरह उनकी जेब से आखि़री कौड़ी भी हड़प लेने की फिराक में रहते हैं। इन श्रमिकों के साथ होने वाली समस्यायों की लिस्ट बहुत लम्बी है परन्तु आजीविका के अन्य साधनों के अभाव में मजबूरीवश उनको इस काम में जाना पड़ता है.

इस प्रकार के हालत में ‘देव दत्ता क्लब’ द्वारा चलाये जाने वाले ‘दादन शिशु शिक्षा केंद्र’ बच्चों की शिक्षा को बढ़ावा देने और उनको बालश्रम से दूर रखने का एक कारगर तरीका है. इससे बच्चे अपने ही गाँव में, अपने रिश्तेदारों के साथ रहते हैं व स्कूली शिक्षा से जुड़ पाते हैं. इस कार्यक्रम के तहत बच्चों के पोषण पर भी ध्यान दिया जाता है जिसमें भत्ता स्वरुप उस परिवार को कुछ राशि संस्था द्वारा दी जाती है. वर्तमान में 10 दादन शिशु शिक्षा केन्द्रों में लगभग 200 बच्चे आते हैं. इनमें से अधिकतर बच्चे ऐसे हैं जो कि पहले अपने माता-पिता के साथ काम पर जाते थे और अब एक दो वर्षों से यंही रूककर स्कूल जाने लगे हैं. संस्था के इस प्रयास को सरकार ने भी अपनाया है और इसी तर्ज पर बच्चों को रोकने के प्रयास किये जा रहे है. वास्तव में सरकार ही बड़े स्तर पर इस प्रकार के नीतिगत बदलाव कर ईंट भट्टा में कार्य करने वाले श्रमिकों के बच्चों को बालश्रम के दलदल से बचने और शिक्षा की अलख जगाने में का कार्य कर सकती है.


सन्तोष पूनियां

कार्यक्रम प्रबंधक, आजीविका ब्यूरो, उदयपुर

[1] दादन शिशु शिक्षा केंद्र ‘देव दत्ता क्लब’  द्वारा चलाये जाने वह केंद्र हैं जो ईंट भट्टों में मजदूरी करने के लिए जाने वाले श्रमिकों के बच्चों को गाँव में ही रोक कर पढाई कराते है. इस केंद्र के माध्यम से बच्चों को उनके गाँव में ही रिश्तेदारों के साथ रुकने के लिए प्रेरित किया जाता है और उसकी पढाई को जारी रखने के लिए स्कूल के बाद इस केंद्र में अतिरिक्त पढाई कराई जाती है. उसी गाँव के एक वालंटियर द्वारा जो कि केंद्र संचालक होता है, बच्चों को होमवर्क करने, कठिन विषय जैसे इंग्लिश, गणित, विज्ञान आदि की पढाई में मदद की जाती है. एक केंद्र में लगभग 15-18 बच्चे होते हैं. ‘देव दत्ता क्लब’ ओडिशा के बरगड जिले में काम करने वाली स्वयं सेवी संस्था है जो कि टाटा ट्रस्ट्स के प्रवासी श्रमिक कार्यक्रम के तहत CMLS के साथ कार्य करती है.

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In Search of Road No. 13, Shivajinagar

After recovering from a long break from field visits for medical reasons, today I had a meeting scheduled with a union of rag pickers in Mumbai. And, I was excited. My colleague Rupal gave me directions and asked me to come to road no. 13 in Shivajinagar. The address had an abstract ring to it and sounded just perfect for my first expedition.

It took me a while to find my destination. We are so used to the classical Indian nomenclature of streets that suddenly having a street number to locate was odd. I had Google maps at my disposal but then after a while it gave up as well. Streets in India are not really amenable to a high order of electronic specificity. I got down a little ahead and sought my way around.

The lazy street (number 13) emerged from a huddle of houses rather suddenly; it was difficult to make out where its origin was. On one of its diffused edges was a small 50m road connecting it to number 12. As I walked on I realized that it was not a road but a mound of old garbage perfected into a permanent structure. On the sides of the “garbage-road” were two choked nallahs full of plastic and junk. The stench, however, was miss-able as the life around was far more engaging.

For some time I was plain overwhelmed to be there. I have been living in Mumbai for a few years now but my visits to its subaltern corners are not that frequent. I was conscious for I could feel the eyes on me. I did not belong there and people must be curious. Waiting for my colleague to join, I stood there trying to absorb my surroundings. I looked around at the small decrepit houses/tenements and tried stealing a peek into the lives they hosted – a mother-daughter pair oiling their hair; a hen fussing over her chicks and a man lying on a steel cot toying with his mobile phone. On an under-construction stretch of the road, some workers lazed around while the earnest ones squabbled with children playing cricket to protect the fresh cement and concrete. I could see that children were drawing more thrills out of the squabble than cricket. They would strike a shot towards the under-construction patch; wait for the workers to react and then run dropping their bats with a loud cheer. This went on for a while. I thought about the limited narratives on the lives of the poor. As a student of development I never did look at the content, joyous sides of their lives. We are almost conditioned to look at them as “deprived” and I wonder if it limits our ability to communicate and work with them.

I looked around and wondered what I could do to change the lives of those around me on that road. It appeared to me a complete world, in peace with itself. Where was the need for any intervention?

We finally met the union of rag pickers we had come to see – Kachra Vahtuk Shramik Sangha (KVSS). KVSS was promoted by Apnalaya, a well-respected CSO in Mumbai, working to address the travails of the rag-picking community and advocate for its rights. We met Shalini, the chairperson and two more members from the core committee of the Sangathan and learnt about their pursuit and concerns. They were vocal about the contribution they made to keep the city going by picking, sorting and recycling the lakhs of tonnes of garbage it produced every day. It was fascinating to hear how specialized the work was–some collected only wood, some only old jute bags while some rag-pickers specialized in collecting broom-sticks and making new brooms out of the reject which was then sold in the market.

Recycling brooms, that is the order of sustainable living this informal industry enabled. The city administration however did not recognize its work.

One of the biggest struggles for this community was to claim a worker’s identity. Rag picking remained at the fringes of urban policy and I guess some of it had to do with the multi-crore grey economy that it helped thrive. Our sources recounted how the industry was infested with mafia and there were bloody fights over “premium” garbage coming from hospitals/certain affluent localities. I was reminded of the telling account of the life and times of a garbage trading family in Katherine Boo’s Behind the beautiful forevers. Most of us in Mumbai live so oblivious of such narratives. The city indeed inhabits multiple worlds.

KVSS issued identity cards for its members and helped them avail insurance. It ran crèches for the children of its members and struggled for access to drinking water, toilets for women, a canteen and health services. We learnt that the identity card gave KVSS members an access to the Chembur dumping ground, which the government had recently handed over to a private company for administration. The company employed boxers to keep rag-pickers out. KVSS members, however, had an entry by virtue of owning the membership card. I was again reminded of how the informal spaces in India were governed, not by rules but through bargaining. Legitimacy was up for negotiation. Owning the ID card made some rag pickers legitimate and in turn excluded others.

The recent most threat to this collective came from BMC’s decision to move part of the garbage traffic from Chembur to Kanjurmarg. It was likely to deprive hundreds of workers of their livelihood. Shalini, the chair of KVSS was planning to meet the BMC officials and was hopeful that the decision would be reconsidered. Her dream was to get BMC recognition for KVSS members and along with it social security benefits and the dignity that they deserved but rarely received.

We left after a two hour stimulating conversation. The degree of ownership exuded by the women leaders of the cause and their organization – the Union – was inspiring. As we left, the street assumed a new character for me and I thought of the lives that Shalini and her collaborators led. I thought of their struggles as women, as workers, as community leaders and of their successes. Another part of Mumbai had come to life for me. From now whenever I would take the SCLR I know that street number 13 would be special …

Amrita Sharma, Aajeevika Bureau

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नहीं तो बेघर हो जाती धापू

  नहीं तो बेघर हो जाती धापू

आर्थिक सहायता दिलवाने व वित्तिय प्रबंधन में धापू का सहयोगी बना केंद्र

Dhapu Bai

Dhapu Bai

धापू बाई की श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्र द्वारा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ दिलवाने में मदद की गई। योजना के अंतर्गत मिली सहायता राशि से उसे मजबूती मिली, उसने अपने परिवार को बेघर होने से बचा लिया।

उस दिन को याद करते हुए धापू बाई ईश्वर को धन्यवाद देती हैं, जिस दिन उसने भवन निर्माण एवं संनिर्माण कर्मकार मण्डल से पंजीकृत होने के लिए आवेदन किया। जब आवेदन किया तब उसे नहीं पता था कि वो उसके लिए कितना लाभकारी होगा। उसे तो कर्मकार मण्डल के अस्तिव में होने की जानकारी भी नहीं थी। वह कहती है भला हो मजदूर ऑफिस (श्रमिक सहायता एवं संधर्भ केंद्र गोगुन्दा) वालों का जिन्होंने उसे कर्मकार मण्डल से जुड़वाया।

अत्यंत गरीब परिवार में पली बढ़ी धापू बाई को स्कूल की चौखट पर पैर रखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका। वर्तमान में उसके 7 संतानें हैं। बड़ी बेटी का विवाह करवा दिया, जो अब ससुराल रहती हैं। वर्तमान में धापू बाई के परिवार में 8 सदस्य हैं। उसके पति की पूर्व पत्नि, 4 बेटियां, 2 छोटे बेटे और वह स्वयं। इन सबका पालन पोषण धापू बाई ही करती हैं। परिवार की आय का स्त्रोत धापू बाई की मेहनत हैं। कभी-कभी उसकी दो बेटियां भी मजदूरी करने जाती हैं। जमीन का एक छोटा टुकड़ा हैं जिसमें महज खरीफ की फसल हो पाती हैं। मकान के नाम पर एक कच्चा कवेलूपोश कमरा हैं।
पिछले वर्ष उसके पति देवाराम गमेती की मृत्यु हो गई। लम्बे समय तक गंभीर बीमारी से पीडि़त रहे देवाराम का उसने खूब ईलाज करवाया लेकिन वो नहीं बच पाया। पति जब बीमार हुआ तब घर में फूटी कौड़ी तक नहीं थी। बैंक खाता होना तो दूर की बात, परिवार में से किसी ने बैंक में पैर तक नहीं दिया था। पति के ईलाज के लिए पैसे नहीं थे तो उसने सबसे पहले 20,000 रूपए में अपने गहने गिरवी रखे। गोगुन्दा व उदयपुर के अस्पतालों में ईलाज करवाया लेकिन पति का स्वास्थ्य सुधरने की बजाए बिगड़ता ही गया। परिवार की आय एकदम ढप्प हो गई थी। पति की हालत में दिनों दिन गिरावट आती जा रही थी। किसी ने उसे बताया कि गुजरात के ऊंजा के एक अस्पताल में अच्छा ईलाज होता हैं। उसने पति का ईलाज ऊंजा के अस्पताल में करवाने का निर्णय किया, मगर ऊंजा ले जाने के लिए उसके पास रूपए नहीं थे। मां व भाई से उधार लिए 17,000 रूपए तथा उसके पास जो रूपए थे वो पति के ईलाज व बच्चों के पालन-पोषण में खर्च हो गए थे। उसने कईयों के आगे हाथ फैलाए लेकिन किसी ने उसकी आर्थिक मदद नहीं की। तब उसे अपने खेत को गिरवी रखने का ख्याल आया। उसने 10,000 रूपए में खेत गिरवी रख दिया। ऊंजा के अस्पताल में भी बीमारी का ईलाज नहीं हो सका तब वह बीमार पति को लेकर पुनः घर लौटी।

गोगुन्दा, उदयपुर, अहमदाबाद, ऊंजा सहित कई शहरों के अस्पतालों में ईलाज करवाया लेकिन सब सिफर रहा और अंततः जून 2014 में उसके पति की मृत्यु हो गई। धापू बाई ने बताया कि उसका पति 2 वर्ष तक बीमार रहा। इन दो वर्षों में परिवार की आय नाम मात्र रही। पति के ईलाज व बच्चों के लालन पालन में उसने अपने जेवर, खेत व आबादी भूमि को गिरवी रख दिया। यही नहीं रिश्तेदारों से भी कर्जा ले लिया।

पति की मृत्यु के बाद सामाजिक कुरीति (मृत्युभोज) मुंहबाय खड़ी थी। उसे पति का मृत्युभोज करना पड़ा। पति की मृत्यु के दिन से लेकर 12 दिन तक परिवार व समाज के लोगों ने रीति रिवाजों के नाम पर खूब खर्चा करवाया। गम से थोड़ी उबरी धापू बाई ने आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान दिया तो आंखों से नीर टपकने लगा। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि बच्चों का पेट भरना भी मुश्किल हो गया। अब उस आस तो महज भवन निर्माण एवं संनिर्माण कर्मकार मण्डल से मिलने वाली आर्थिक सहायता की। बकौल धापू बाई ‘‘घर वाला री मौत फचे ऑफिस वाला म्हारो फॉर्म भरवायो हो, वे मने बतायो क 45,000 रूपया पास वई सकेगा।’’ (पति की मौत के बाद ऑफिस वालों ने मेरा फॉर्म भरवाया और बताया कि 45,000 रुपया मिल सकते हैं.)

आर्थिक तंगी के दौर में धापू का कोई सहारा बना तो वह था श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्र। केंद्र के लोगों ने आवेदन करने में पूरी मदद की और उसे हौंसला बंधाया। उसके बैंक खाता नहीं था, केंद्र के कार्यकर्ता ने ही सहयोग कर खाता खुलवाया। 7 जुलाई 2014 को उसके बैंक खाते में 45,000 रूपए की सहायता राशि आई। केंद्र से जुड़े राजमल कुलमी ने उसे वित्तिय प्रबंधन का पाठ पठाया। वित्तिय प्रबंधन सीख इस राशि से उसने सबसे पहले अपनी मां व भाई से उधार लिए रूपए चुकाए। उसके बाद गिरवी रखे खेत को छुड़वाया और छोटे-मोटे कर्ज से छुटकारा पाया।

राजमल कुलमी कहते है कि ‘‘धापू बाई आत्मविश्वास से लबरेज एक संघर्षशील महिला हैं। उसकी खासियत यह है कि वो मुश्किलों से तनिक भी घबराती नहीं है। उसके पति की मृत्यु के बाद मैंनें उसकी हालत देखी, उसके बाद कई बार धापू बाई के बारे में सोचने पर मजबूर हुआ। उस पर बहुत कर्जा था और 7 लोगों को पालने की जिम्मेदारी भी। इसलिए मैं हर उस योजना का लाभ उसे दिलवाना चाहता था, जिसकी वो पात्र थी। क्योंकि आर्थिक प्रकोप से बचाने के लिए सरकारी सहायता ही एक मात्र उपाय मुझे नजर रहा था।’’
धापू बाई की एक बेटी व दो बेटे गांव के ही उच्च प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं। राजमल कुलमी का ध्यान पालनहार योजना की ओर गया, उन्होंने धापू बाई के तीनों बच्चों को पालनहार योजना से जुड़वाया। 20 अप्रेल 2015 को धापू बाई की बैंक डायरी का अवलोकन किया तो पाया कि उसके बैंक खाते में कोषाधिकारी कार्यालय ने इस वर्ष 36000 रूपए जमा कराए हैं।
गरीबी के थपेड़ों से पक चुकी धापू बाई के सामने नित नई बाधाएं आन खड़ी होती हैं। एक तो कच्चा कवेलूपोश कमरा उपर से ओलावृष्टि। घर के आधे से अधिक केलु फूट चुके हैं। किसी ने बताया कि ग्राम पंचायत में आवेदन करने पर मुआवजा राशि मिलेगी। उसने आवेदन किया तो ग्राम पंचायत से कहा गया कि वह बीपीएल श्रेणी में शामिल नहीं है इसलिए उसे मुआवजा नहीं मिलेगा। बैंक खाते में जमा रूपयों की उसे जानकारी नहीं थी। उसने गांव के एक व्यक्ति से ब्याज पर 3000 रूपए उधार लेकर घर पर नए केलु डलवाए हैं। लेकिन केलु कम पड़ गए, अभी भी रात में चांद सितारे उसके घर में झांक रहे हैं।

बालिग हो चुकी एक बेटी का विवाह 24 अप्रेल 2015 को होने वाला हैं। उसने बताया कि मेरे ऑफिस  (केंद्र को वह अपना ऑफिस बताती हैं।) वालों ने बेटी के विवाह पर मिलने वाली सहायता राशि के लिए मेरा आवेदन करवाने में सहायता की। डेढ़ माह पहले ही मैंनें विवाह आवेदन करवा दिया हैं। मुझे उम्मीद है कि बेटी के विवाह के लिए मुझे सरकार से 51,000 रूपए की सहायता जरूर मिलेगी।

बहरहाल संघर्ष की प्रतिमूर्ति धापू बाई संघर्षों का सहर्ष सामना करते हुए, स्वाभिमानी से जीवन जी रही हैं। हाल ही में उसने प्राकृतिक प्रकोप ओलावृष्टि का सामना किया। अब बेटी का विवाह करवाना उसके लिए बड़ी चुनौती हैं लेकिन आत्मविश्वास व केद्र के सहयोग के बूते वह इस चुनौती को भी पार कर ही लेगी।

उसे मलाल है कि वह गिरवी पड़े अपने चांदी के आभूषणों को नहीं छुडवा पाई हैं। वह कहती है कि मजदूर ऑफिस नहीं होता तो मैं इन चुनौतियों का सामना नहीं कर पाती। कर्ज चुकाने में मेरा घर व खेत बिक जाते, मुझे बेघर होना पड़ता। मैं ताउम्र ऑफिस वालों की आभारी रहूंगी।

केंद्र से जुड़ने के बाद धापु बाई और अधिक जाग्रत हुई हैं। उसने अपने हकाधिकारों को जाना हैं। आज वह सशक्त महिला के रूप में पहचानी जाती हैं। सरकारी दफ्तरों से लेकर गोगुन्दा कस्बे के आस-पास के क्षेत्रों के विभिन्न समुदायों के लोग उसके नेतृत्व और बेबाकी से वाकिफ  हुए हैं। वह बजरंग निर्माण श्रमिक संगठन की सक्रिय महिला नेत्री हैं। हाल ही में संगठन के लोगों ने उसे सर्वसम्मति से अरावली निर्माण सुरक्षा संघ के सदस्य के रूप में मनोनित किया हैं।
(नोट: धापू बाई से मेरी मुलाकात जुलाई 2014 में राजमल जी कुलमी ने करवाई। उसके बच्चों के पालनहार के आवेदन करवाने राजमल जी कुलमी के साथ मेरा भी जाना हुआ था। राजमल जी कुलमी ने धापू बाई की पीड़ा को गहराई से समझा था और केवल मानवीय संवेदनाएं व्यक्त की बल्कि एक कदम आगे आकर उसकी मदद भी की। कर्मकार मण्डल की योजना, पालनहार योजना का लाभ दिलवाना, उसे वित्तिय प्रबंधन सिखाना, उसके उलझे हुए आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप कर सुलझाने जैसे सहयोग राजमल जी कुलमी ने किए। मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं . प्रसंगवश – लेख का सोंर्दयबोध से युक्त अथवा शब्द अलंकृत होना आवश्यक नहीं हैं, जरूरी यह है कि वो तथ्यपरक हो। )

अंत में . . . धापू बाई के संघर्षों को सलाम। आप सभी से गुजारिश है कि धापू बाई के लिए दुआएं मगफिरत फरमावें, खुदा धापू बाई को सारी नेमतों से नवाजें . . .  आमीन . . .


लखन सालवी

(Lakhan Salvi (Laxmi Lal) works with Aajeevika Bureau, oldest center at Gogunda, Udaipur. Lakhan has been with the organization for one years now and brings in great dynamism and will to learn, reflect and do better. Happiness and positivity personified, that’s how his team knows him. He is a good team member, creative writer, a journalist. Writing his passion and he is enjoy the writing.)

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विकलांगता नहीं आई आड़े….बन ही गया टेलर-मास्टर

मोहन बना गाँव वालो के लिए एक मिसाल

चार माह बाद जब मैं मोहन से मिलने उसके घर गया तो देखा कि उसके घर पर 4-5 लोग कपड़े सिलवाने के लिए तैयार खडे थे और मोहन उन सभी का नाप ले रहा था। मैं खुश हो रहा था, कि स्टेप से निकला हुआ हमारा प्रशिक्षणार्थी आज अच्छा कार्य कर रहा है। दोनों पैरों से विकलांग होते हुए भी कड़ी मेहनत और परिश्रम से मोहन अब टेलर-मास्टर बन गया और 300-400 रुपया प्रतिदिन कमा लेता है।

कुछ देर बाद मोहन और मेरा बातों का सिलसिला शुरु हुआ। मैने मोहन के परिवार के बारे में जानना चाहा। 2014-09-23 13.44.36मोहन ने बडे ही दुख के साथ बताया की जब वह 7 वीं कक्षा में पढ रहा था, तब उसकी माँ और पिताजी का देहान्त हो गया। उसका पालन-पोषण उसकी दादी माँ ने किया। घर में छोटा भाई, भाभी और एक भतीजा है। भाई-भाभी खेती और घर का काम करते है। उसकी शारीरिक अक्षमता की पेंशन से दादी घर का गुजारा कर रही थी। मोहन कक्षा 7वीं से आगे अपनी पढ़ाई नहीं कर पाया।

गांव देवला, तहसील धरियावद, जिला प्रतापगढ़ के मोहन लाल मीणा ने मेट के अनियमित काम से आर्थिक-जीवन की शुरुआत की। 2014-09-23 13.29.37 इस आय से स्वयं का खर्च उठाना भी मुश्किल था, तब सलुम्बर के भबराना श्रमिक केन्द्र से जुड़ी उजाला किरण (महिला आगेवान) ने आजीविका ब्यूरो द्वारा करवाए जाने वाले प्रशिक्षणों के बारे में बताया। मन में संकोच और डर के बावजूद हिम्मत जुटाकर एक दिन भबराना श्रमिक केन्द्र जाना हुआ। केन्द्र के कार्यकर्ता ने उदयपुर स्थित स्टेप एकेडमी के माध्यम से जारी प्रशिक्षणार्थियों की जानकारी दी। मोहन की शारीरिक अक्षमता को देखते हुए उन्हें पूरी संतुष्टि दिलाते हुए टेलरिंग-मेंस वियर प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में बताया। मोहन ने स्टेप के एक माह के हुनर प्रषिक्षण को करने का विचार बनाया। मोहन ने बताया कि उसके मन में उस समय अलग तरह के विचार चल रहे थे, 2013-10-24 13.16.33 कि कैसे वह उदयपुर जाएगा? एक माह अपने घर से दूर रह पाएगा आदि? उसने घर जाकर भाई और दादी माँ से बात की। घर के सदस्य भी तैयार हो गए। आखिरकार मोहन दोनों हाथों से चलता हुआ स्टेप एकेडमी उदयपुर पहुंचा और फरवरी 2013 में आरंभ हुए सिलाई प्रशिक्षण के बैच में शामिल हुआ। बड़ी मेहनत और लगन से उसने पूरे एक माह प्रशिक्षण प्राप्त किया।

मोहन ने बताया कि स्टेप एकेडमी के बारे में जितना सुना था उससे काफी अच्छा महसूस हुआ। वहाँ सभी प्रशिक्षणार्थियों को प्रायोगिक और सैद्धान्तिक रुप से काम सिखाया गया, बड़ा मजा आता था। मोहन ने हंसते हुए बताया कि एक महीना कब बीत गया, पता ही नहीं चला। वहाँ से घर आने का भी मन नहीं कर रहा था। लेकिन गांव आने के बाद कुछ अलग-सा महसुस हो रहा था, मुझमें बहुत आत्मविश्वास आ गया था।

कुछ समय तक मोहन सूई की मदद से ही कपड़े मरम्मत करने लगा। लेकिन इतनी कमाई नहीं थी, अब मशीन की जरूरत महसूस हुई। मशीन के लिए पैसों की जरूरत थी, और मोहन के पास पैसे नहीं थे। इन सभी बातों के बावजुद मोहन ने अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया। एक दिन स्टेप एकेडमी से उनका फोलोअप हुआ, और कार्यकर्ता ने काम बढ़ाने में आ रही चुनौतियों के बारे में जाना। मोहन ने अपने घर की सारी स्थिति के बारे में बताया, इसके बाद जूलाई 2013 में मोहन को स्टेप में बुलाकर अमेय फैलोशिप (वित्तीय सहायता हेतु ऋण) के बारे में बताया। उसने अमैय फैलोशिप के लिए आवेदन किया। अगस्त में मिली फैलोशिप में 6350 रुपयों की मदद से सिलाई मशीन और अन्य सामान खरीदने के लिए मोहन एक दोस्त को लेकर आया। बस पर लोड करके मोटर वाली सिलाई-मशीन गांव ले आया, फिर क्या था, अब तो गाड़ी चल पड़ी। धीरे-धीरे लोग आने लगे और अपने कपड़े सिलने के आॅर्डर देते रहे। आरंभिक चुनौतियां का सामना करते हुए मोहन ने धीरे-धीरे अपने गाँव में अपनी पहचान बना ली। लोग कपडे सिलवाने के लिए आने लगे। कुछ समय बाद महिलाएं भी कपडे सिलवाने आने लगी। कुछ समय बाद मोहन को इंटरलाॅक मशीन की आवश्यकता महसुस हुई, और उसने कुछ पैसे एकत्र कर वह मशीन भी प्रतापगढ़ से खरीद ली।

काम के शुरुआती दौर में घर के बाहर कच्चे में से काम को शुरु किया। लेकिन आज मोहन ने अपनी कमाई का एक-एक पैसा जोडकर दुकान के लिए एक पक्का कमरा बनवाया है। उसने बताया की वह थोडे और पैसे इकठ्ठे करके काम के विस्तार के लिए एक और मशीन लाना चाहता है। काम को इस तरह जमाना चाहता है ताकि गाँव के लोगो को कपड़े सिलवाने के लिए शहर जाना नहीं पड। वह अपने समाज में एक मिसाल कायम करना चाहता है।

मोहन बहुत ही मेहनती है, दोनों पैरों से विकलांग होने हुए आज वह किसी के ऊपर निर्भर नहीं है और होकर स्वयं के बलबुते पर काम कर रहा है। उसने अमैय फैलोषिप में मिली पूरी राषि भी आजीविका ब्यूरो को चुकता कर दी है। मोहन से बातें करते-करते मुझे समय का ध्यान ही नहीं रहा, विदा लेते समय मैं मोहन को उज्ज्वल भविष्य के लिए बहुत सारी शुभकामनाएँ दी। मैने महसूस किया कि उसकी आंखों में भविष्य के प्रति एक चमक थी।

परशराम लौहार

आजीविका ब्यूरो

श्रमिक सहायता एवं सन्दर्भ केन्द्र, सलूम्बर

(Meet one of our young team members at Aajeevika – Parasram Lohar. Paras has been with the organization for one and half years now and brings in great dynamism and will to learn, reflect and do better. Happiness and positivity personified, that’s how his team knows him. This is the first blog from Paras and we wait to read many more…)

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नन्ही जान और परिवार के परवरिश की चिंता !!

जिंदगी की आपाधापी में मासूमों का क्या हश्र हम कर रहे हैं, कई बार इसके बारे में हम शायद ही कभी सोचते हैं। परिवार के भरण-पोषण की हमारी चिंता कब उन्हीं के खिलाफ हमारी साजिश का रूप ले लेती है, हम जानते भी नहीं और जानते भी हैं तो अनजान बने रहने में ही भलाई समझते हैं। शोषण हमेशा वही नहीं होता जो दूसरों के हाथों होता है। हम अपनों के हाथों भी शोषित होते हैं। इस बात को थोड़ा और आगे बढ़ाएँ तो हम यह कह सकते हैं कि माँ-बाप के हाथों भी बच्चों का शोषण होता है। हो सकता है कि यह बात बहुतों को नागवार गुजरे और इसे वो विकृत मानसिकता की उपज बताएं। पर विशेषकर गरीब और वंचित तबकों का एक बड़ा वर्ग है हमारे देश में ,जो भले ही आर्थिक मजबूरी में यह कर रहा हो, पर अपने मासूमों के नाज़ुक कंधों पर असमय जवाबदेही का भारी बोझ डाल चुका है। वह यह सब करता है परिवार के भरण-पोषण के नाम पर। वह इस बात की दुहाई देता है कि वह उन्हीं मासूमों का पेट भरने के लिए यह सब करता है । पर अपने इस बयान की सच्चाई जाँचने की हिम्मत वह शायद ही कभी जुटा पाता है। वह इस बात से भलीभांति परिचित है कि वह क्या कर रहा है। वह यह जानता है कि वह उसीको जीवन की भट्ठी में असमय झोंक रहा है जिसके जीवन को बचाने की दुहाई वह दे रहा है। इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि जिसकी भलाई की बात की जा रही है, दरअसल वही इसका शिकार बन रहा है।

सड़कों पर भीख मांगते बच्चे। कूड़ों की उस ढेर में रोटी के टुकड़े तलाशते बच्चे जिसके नजदीक तो अमूमन हम जाते नहीं पर अगर चले भी गए तो अपनी नाक दबाके उसके पास से निकलते हैं। होटलों में हमारी जूठन साफ़ करते बच्चे। चाय की दुकान पर कप साफ करते बच्चे। मोटर गराज में ग्रीज और मोबिल ऑइल से तर गाड़ियों के कल पुर्जों को साफ करते बच्चे। हमारे घरों में काम करते हमारे बेटे-बेटियों की उम्र के बच्चे जिन पर जुल्म तक करने में हम कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं करते। हमारे कई लाख के कारों की सफाई करते बच्चे जिनको हम उनकी थोड़ी चूक के लिए भी प्रताड़ित करने से बाज नहीं आते और उसका मेहनताना तक गटक जाते हैं। कहाँ नहीं हैं ये बच्चे! ये हर जगह हैं। और ये सबके सब किसी न किसी के बच्चे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनके सिर के ऊपर अपनों का साया नहीं होता। पर इनमें से अनेकों के पीछे उनका भरा पूरा परिवार होता है। जरा इन बच्चों से इस बाबत पूछिए कि ये क्या कहते हैं? ये बच्चे अपने उसी भरे पूरे परिवार का पेट भरने के लिए अपने बचपन की आहुति चढ़ा रहे होते हैं। पर ये कहीं भी और किसी से भी यह कहते नहीं फिरते कि वो अपने परिवार को पाल रहे हैं। और अगर कहें भी तो भला कौन इन पर विश्वास करेगा! उल्टे कहेगा – “बड़ा आया शेख़ी बघारने वाला, अपने परिवार को पालने के लिए यह सब कर रहा है”! पर सच में है तो ऐसा ही। चलिये आपको मिलवाते हैं 7 साल के सोनू (नाम बदला हुआ) से।

उदयपुर में बेदला से फतेहपुरा की ओर जाने वाली सड़क। शाम के वक़्त इस रोड पर काफी भीड़भाड़ रहती है। हम और सोनू – हम दोनों ही इस भीड़ के हिस्सा थे – अपने अपने तरह से। मैं अपने कमरे की ओर जा रहा था और सोनू तेल में डूबे शनि महाराज की थाली अपने हाथ में पकड़े उस सड़क पर हर आने जाने वालों को दिखा रहा था। कुछ देर बाद हम दोनों आमने-सामने थे। उसने तेल में डूबे काले पत्थर के बने शनि महाराज की थाली को मेरे सामने कर दिया। मैंने देखा उस थाली में एक रुपये के 2-3 सिक्के पड़े थे। मैंने उस थाली को उसके हाथ से लेने की कोशिश की, पर उसने मुझे ऐसा नहीं करने दिया। वह मेरी ओर देख रहा था। दूधिया दांतों की अग्रिम पंक्ति का एक दाँत वह खो चुका था। दुबला पतला सोनू एक हाथ में थाली संभाले था और दूसरे हाथ में प्लास्टिक के एक झोले को। मैंने कहा चलो मेरे साथ। वह थोड़ा सहमा। मैंने कहा – कुछ खाओगे? वह हाँ में सिर हिलाया। वह एकबारगी सब कुछ भूलकर फुदकते हुए मेरे साथ हो लिया बिलकुल वैसे ही जैसे बचपन में हम भी अपने बड़ों के ऐसा कहने पर इसी तरह साथ हो लेते थे। हम दोनों ने सड़क पार किया और पहुँच गए सामने के बीकानेर स्वीट में। मैंने उससे पूछा, “क्या खाओगे – समोसे, कचोड़ी”। “कचोड़ी खिला दो” – वह बोला। कचोड़ी लेकर दुकान के बाहर हम दोनों ही बैठ गए। वह कचोड़ी तो कम खा रहा था पर चटनी ज्यादा चाट रहा था। कारण शायद यह था कि उसकी नन्ही उँगलियाँ कचोड़ी तोड़ नहीं पा रही थी सो वह चटनी ही चाट रहा था। वह जल्दबाज़ी में दिखा। मैंने उससे बात शुरू की। उसने बताया वह 5 भाई है। बाप बाहर काम करता है और काफी दिन पर घर लौटता है। उसने बताया, उसका एक भाई ट्रक चलाता है। दूसरे भाई भी काम करते हैं। वह तीसरी क्लास में पढ़ता है। उसने एक मैला उजला शर्ट और खाकी पतलून पहन रखा था। पतलून कई जगह से फटा था और कई जगह उसको हाथ से सिला गया था। पैर में कोई चप्पल नहीं। यह पूछने पर कि उसको यह काम करने के लिए कौन कहता है, उसने कहा – “मम्मी”। मैंने पूछा, “क्या तुमको यह सब करते अच्छा लगता है, उसने कहा – “नहीं, मुझे अच्छा नहीं लगता”। उसके दूसरे भाई इस काम के लिए नहीं आते – सिर्फ वही आता है। उसने बताया – “अभी तो हम मम्मी के साथ दिल्ली गेट पर यही कर रहे थे”। मैंने पूछा – “तो क्या तुम्हारी मम्मी खुद घर चली गई और तुमको अब यहाँ यह सब करने के लिए कह गई”? बोला – “नहीं। मैं तो घर जाकर आया हूँ। घर जाकर मुझे लगा कि अभी बैठकर क्या करूंगा, तो मैं यहाँ आ गया”। यह स्तब्ध करने वाला जवाब था। 7 साल का बच्चा यह सब कह रहा है जो घर के बड़े-बुजुर्ग कहा करते हैं। इस कच्ची उम्र में दायित्व का इतना बड़ा बोध! क्या यह बच्चा है? क्या इसमें बचपन बचा हुआ है? उसने मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर एक वयस्क की तरह दिया। कचोड़ी से चटनी को चाटते हुए एक बार भी उसने अपनी बाल सुलभ चंचलता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। मेरी ओर देखते हुए कहा, “अब मैं इसे नहीं खाऊँगा” और पेपर के जिस प्लेट में वह खा रहा था उसी में बचे हुए कचोड़ी को लपेटकर उसने अपने झोले में रख लिया। अपने शर्ट की बाजू से अपना मुंह और हाथ को अपने पतलून में पोछते हुए वह उठ खड़ा हुआ। बोला, “अब मैं जाता हूँ”। सड़क पर अब भी काफी भीड़ थी – सोनू एक बार फिर इस भीड़ का हिस्सा बन चुका था।

अशोक झा

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सपने, मंजिलें और रोजगार की बातें …

मैं बहुत मेहनती लड़का हूं, लेकिन मेरे पास ढंग का काम नहीं है। मेरे पिछले छः माह अहमदाबाद में काम करते हुए बीते। वहां से अभी-अभी अपने गांव निठाउवा आया हूं। सोचता हूं कब तक अहमदाबाद में मजदूरी के लिए जाता रहूंगा? काम तो मिल जाता है और पैसा भी। गांव वाले सोचते हैं कि सोनाराम अच्छे पैसे कमा रहा है। परन्तु सच कहूं तो मुझे काम के साथ सम्मान भी चाहिए जो अभी तो मुझे मिलता हुआ नहीं दिखाई देता। बडा शहर, बहुत सारे लोग लेकिन सोनाराम को कोई नहीं पहचानता।

मुझे अच्छा काम मिले तो मैं उसे अच्छे से कर लूंगा, यह मुझे पूरा भरोसा है। मेरे मन में यह उलझन है कि अपने सपने के बारे में किसे बताऊं? मेरी काबिलियत को कौन समझेगा? कौन मेरे सपने और जरुरत में तालमेल बिठायेगा?

मैं 9वीं पास हूं। होली पर आया था आज 10 दिन हो गये हैं। अहमदाबाद से सेठ का दो बार फोन आ गया है बुलावे के लिये। तय नहीं कर पा रहा हूं वापस जाना है या नहीं। जब गांव में होता हूं तो दिन में एक चक्कर साबला के मार्केट का जरुर लगाता हूं। आज भी सुबह-सुबह निकला ।

मन ही मन सोचता हुआ जा रहा था। अचानक बस स्टेण्ड पर लगे एक शिविर पर मेरी नजर पड़ी। शिविर के बाहर लगे बैनर पर लिखा था- “युवा मेला सपने, मन्जि़लें और रोजगार की बातें”। जो मेरे दिमाग में चल रहा था वो बातें मुझे बेैनर पर दिखाई दी। मन में उत्सुकता बढ़ी कि अन्दर क्या हो रहा है देखकर आता हूं। मेले के अन्दर मेले जैसा कुछ नज़र नहीं आया। 8-10 टेबल पर लाईन से लोग बैठे हुए है और कुछ बातें कर रहे हैं। पहले तो मैं घबराया। लगा गलत तो नहीं आ गया मै? मैंने गैट पर खड़ी एक मैडम से पूछ ही लिया- अन्दर कुछ टेन्शन जैसा तो नहीं है ना।”मेडम ने हंस कर कहा- “आपके लिए ही है।”  मैं संकोच करते हुए अन्दर गया।

पहले टेबल पर मेरा नाम-पता और मोबाईल नम्बर लिखा गया और मुझे एक फार्म दिया गया। आगे खडे भाईसाहब ने मुझे 4 रिंग दी और कहा – निशाना लगाओ। पहले तो समझ नहीं आया। उन्होंने समझाया कि अपने हिसाब से दूरी तय करो और उस पर रिंग से निषाना साधो। मैने सोचा की 8 फीट पर लगा दूंगा। सेट किया और फेंकी रिंग। पर ये क्या? दो चांस में एक भी निषाना नहीं लगा पाया। मन में सोचा इतना भरोसा था लेकिन वार तो खाली गया। भाईसाहब ने कहा दूरी बदलोगे? मैं अपना टारगेट 8 से 6 पर ले आया। और आखिर में 5 पर मेरा निशाना लग पाया। मन में खुशी हुई पर विचार भी आया कि जितना सोचा उतना नहीं कर पाया। इस पर आगे बैठे सर ने खुलकर बात की। बहुत अच्छा लगा अपने बारे में यह जानकर।

आगे वाली टेबल पर मुझे चार्ट और रंग दिये गये। कहा गया कि जो मेरे मन में चल रहा है उसका चित्र बनाउं। मैने चार्ट पर किताब का और मार्बल का चित्र बनाया। चित्र के बारे में पूछने पर मेने बताया कि मैं आगे पढ़ना और मार्बल फिटिंग का काम चाहता हूं। अब आखिरी टेबल पर एक सर ने मेरे हाथ से फार्म लिया और बाकी  की जानकारी ली। यहां पर मेने अपने मन की स्थिति बता दी। मुझे सलाह मिली कि घर की जिम्मेदारी को देखते हुए प्राईवेट पढ़ाई जारी रखनी चाहिए। साथ में रूची अनुसार काम सीखना चाहिए। मेने अपनी रूची मार्बल फिटिंग के लिए दिखाई। मेरा फार्म जमा किया गया। आगामी ट्रेनिंग की तारीख बताई गई साथ ही सम्पर्क नम्बर और ट्रेनिंग सेन्टर का पता दिया गया।

अब मुझे मालूम हो गया है कि मैं क्या कर सकता हूं और मैं किस लायक हूं। अब मेरा लक्ष्य मार्बल फिटिंग का काम सीखकर, इस लाईन में आगे बढ़ना है। अगले महने साबला मे शुरू हो रही ट्रेनिंग के लिए मैंने फीस जमा करवा दी।

ये मेला और मेलों से बहुत अलग था। मेले से बाहर निकला तो ताजगी महसूस हुई। सुबह मन में जो द्वंद था अब उसकी जगह कुछ नये विकल्पों और स्पष्टता ने ले ली। इस मेले से मिठाई, खिलौने नहीं लेकर जा रहा हूं लेकिन अब सपने, मजिंले और रोजगार की बातें जरुर मेरे साथ है। 


युवा मेला: सपने, मन्जि़ले और रोजगार की बातें………. एक परिचय

स्टेप एकेडमी आजीविका ब्यूरो द्वारा आयोजित होने वाला एकदिवसिय कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम चार-पांच पंचायतों के बीच किसी कलस्टर में किया जाता है। सघन प्रचार-प्रसार से युवाओं को एक जगह आमंत्रित किया जाता है। युवाओं के लिए आयोजित परामर्श शिविर को ही युवा मेले का नाम दिया गया है। इस युवा मेले में अपनाये गये परामर्श का क्रम एक निष्चित पद्धति पर आधारित है जिसे वाल्कर साईकल (Walker Cycle) कहते हैं। इस गतिविधि में प्रमुख पांच चरण होते हैं: दिमागी कसरत, व्यक्तिगत/निजी जुड़ाव, जानकारी का आदान-प्रदान, जानकारी को लागू करना और वास्तविक दुनिया से जुड़ाव। इस युवा मेले में ये चरण निम्न प्रकार से रहते हैः

  1. दिमागी कसरतः रिंग वाला खेल, लक्ष्य निर्धारण के साथ
  2. व्यक्तिगत जुड़ावः खेल के दौरान तय किये गये लक्ष्यों पर चर्चा
  3. जानकारी का आदान-प्रदानः प्रशिक्षण एवं नियुक्तियों की जानकारियां
  4. जानकारी को लागू करनाः युवा से चित्र बनवाना जो उसके दिमाग में चल रहा है
  5. वास्तविक दुनियां से जुड़ावः युवा द्वारा लिया गया निर्णय

इस वाल्कर साईकल (Walker Cycle) को एक और नाम दिया जा सकता है टोल, खेल, मोल, गोल। जिसमें युवा अपने आप को टोल से आगे निकाल रहा है। फिर खेल रहा है। मोल कर रहा है। अन्त में अपना गोल निर्धारित कर रहा है। इस मेले की डिजाईन निम्न प्रकार से होती हैः



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यह कैसी बारिश आई कि सब कुछ बहा ले गई…..

अहमदाबाद में जो लोग रहते हैं,वो इस शहर के मूड को बखूबी जानते होंगें। अगर कहें की यह शहर अचानक ही अपना मूड बदलने में माहिर है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसके मूडियल होने का पूरा पता रविवार को लगा। अभी तो यह शहर पिछले लगभग एक माह से गर्मी से तप रहा था और पारा 42 डिग्री के आसपास मंडरा रहा था। पर रविवार को मौसम ने अचानक ही अपना मूड बदल लिया। उस दिन शाम को तेज तूफानी हवाएँ चलीं, बिजली की गड़गड़ाहट से सारा नगर दहलता रहा और फिर तेज बारिश शुरू हो गई। मौसम के मिजाज में आये इस बदलाव से सभी हैरान थे। लोगों को कहाँ उम्मीद थी की मौसम इस कदर करवट बदलेगा की उनको संभलने का भी मौका नहीं मिलेगा। पर प्रकृति के साथ जुड़ी यही अनिश्चितता तो उसकी सुंदरता है और यही उसे रहस्यमय भी बनाता है। ये ऐसे ही मौके होते हैं जब हमें अपने बौनेपैन का एहसास होता है और अपनी दरिद्रता पर क्षोभ। वरना,पक्की और आलीशान इमारतों की खिड़कियों से बारिश का आनंद लेना किसे अच्छा नहीं लगेगा।

तो शहर में रविवार को अचानक बारिश हुई। इस बारिश की वजह से गर्मी से तो थोड़ी राहत मिली पर कुछ लोगों पर यह कहर बरपा गई। Image

बारिश जब थमी तो मेरा मन हुआ की चल कर देखें की बाहर में बारिश का क्या हाल है। जैसा की अमूमन होता है,सड़कों पर ट्रैफिक जाम । वाहनों की लंबी कतारें लगी थीं, बारिश के दौरान आई आँधी कितनी जोरदार थी, सड़कों पर गिरे पेड़ और उनकी टूटी टहनियाँ इसका गवाही दे रही थी। सड़कों पर तो पानी का सैलाब उमड़ आया था और सड़कें इठलाती हुईं बरसाती नदी बन गई थी। बारिश के बाद के इन मंजरों को देखते हुए मैं अपने घर के नजदीक पहुंची तो मेरी नज़र वासणा नाके पर खुले में रह रहे राजस्थान के बांसवाड़ा के कुशलगढ़ आदिवासी श्रमिक पर पड़ी। इस नाके पर 200 से ज्यादा महिला, बच्चे और पुरुष रहते हैं। पर इस समय वहाँ से सब नदारद थे। इधर-उधर नज़रें दौड़ायी तो देखा की कुछ लोग पुलिस चौकी के पटरों के नीचे बैठे हैं। पास के बस स्टैंड का मंजर तो बहुत ही अजीब था। अचानक ही यह बस स्टैंड एक पूरे परिवार आश्रयस्थल बन गया था। एक परिवार के सात लोग अपने बच्चों के साथ बस स्टॉप पर शरण लिए हुए थे। बस स्टैंड में साड़ी को झूले की तरह बांधकर एक बच्चे को उसकी माँ सुला रही थी। दो-तीन बच्चे जिनको बैठने की जगह नहीं मिल रही थी, कुछ देर खड़े रहते तो कभी अपने पिता की गोद में जाकर बैठ जाते। बस स्टॉप पर ही एक कोने में एक माँ अपने एक बच्चे को दूध पिलाकर सुलाने की कोशिश करती नज़र आई। इस बस स्टैंड के हर कोने में बेबसी पसरी हुई थी। ज़िंदगी का हर पल संघर्ष की एक दास्तां बनती जा रही थी। नहीं,कोई आँख नम नहीं थी। किसी के चहरे पर गुस्सा या रोष नहीं था। पर हाँ, अगर कुछ था इन चेहरों पर तो वो थी बेबसी और प्रकृति की थोड़ी भी नाराजगी नहीं झेल पाने की निराशा।

आंधी शाम को 5 बजे शुरू हो गई थी। यह समय श्रमिकों के काम से लौटने का नहीं होता। पर जब वे लौटे तो उनके आशियाने का बुरा हाल था। कहीं कुछ नहीं था। उनका घर, उनका सामान – उन्हें कुछ भी तो नहीं मिल रहा था। प्लास्टिक की छत के नीचे बसा उनका संसार उजड़ चुका था। कई बार ज़िंदगी की दूसरी मुश्किलें पेट की आग से ज्यादा भयानक हो जाती हैं। आज तूफान से बचने के लिए बस स्टॉप में शरण लिए इस परिवार के लिए भूख ज्यादा अहम नहीं थी। और वैसे भी, भूख से तो उनका वास्ता पड़ता ही रहता है। उनको अगर इंतज़ार था तो रात के सकुशल कट जाने का ताकि सबेरे पौ फटने के बाद जब तूफान का मिजाज शांत हो चुका होगा, एक बार फिर वो तिनका तिनका जोड़कर अपना नशेमन तैयार करेंगे और एक बार फिर शुरू जो जाएगी जिंदगी की वही जद्दोजहद।

बहरहाल, इन श्रमिकों ने तो जैसे तैसे वह रात काट ली और वे एक नया सहर देख पाये। पर कुछ श्रमिक ऐसे भी थे जिनको यह नसीब नहीं हुआ। सुबह के अखबार में खबर थी कि चार प्रवासी मजदूर रविवार की शाम आए तूफान की भेंट चढ़ गए।


Rina Parmar

Aajeevika Bureau, Ahmedabad

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Women Workers at the Forefront!


Daad village in Khudarda panchayat is located around 15 kilometres  from the Aspur block headquarters in Dungarpur district of south Rajasthan. Towards the end of 2012, 45 workers worked under the MNREGS scheme to construct a concrete cement road that led to their village.  Each of them worked for 90 days under the scheme and completed the construction in February 2013. They were collectively owed Rs. 5,58,000 for the work they had performed. However inspite of repeated enquiries with the village sachiv and met the payment was never processed. 3 months passed without any news of their due payments.

Aajeevika Bureau had worked intensively in Khudarda panchayat for over 3 years. Several of the 45 workers were also members of the labour collective at the centre. At first, they patiently tried to resolve the matter by speaking to the local administration; however after 3 months of being overlooked, they decided it was time to demand their payments.  On May 1st – Labour Day, the collective members mobilized 400 workers from nearby panchayats and marched to the Block Development Officer’s (BDO) office in Aspur. 50% of those workers were women who had never before raised their voices to demand their entitlements.

When the workers calmly began explaining the matter, the BDO dismissed it, demanded proof and even tried to forcefully throw out workers from his office. At this point the women in the group raised their voices and latched the gate of the Panchayat Samiti refusing to let the BDO leave until the matter was resolved. While the BDO was locked up in his own office, the women workers told him that even workers deserve the same dignity and respect as anyone else and their voices too need to be heard. The BDO finally gave in and within a week each worker received his/her dues amounting to a total compensation of Rs. 5,58,000.


This was a watershed event in the region. The courage shown by women workers in particular had spill-over effects in other panchayats and let to other incidents of workers holding the local administration accountable. For instance women’s groups in Rincha panchayat now demand receipts each time they apply for work under MNREGS. They also check the muster rolls to ensure that no fake names have been added to the list.

Furthermore, it has also made the local administration more responsive. In another incident in Rincha panchayat, the met collected 50 rupees each from 200 women who had applied for work, assuring them that he would pay them for a whole day’s work even if they did not show up to work. All they had to do was show up for a political rally organized by the Chief Minister. Sagar bai the local ujala kiran and two of her friends, refused to make such a deal. They immediately approached the sarpanch and the sachiv who ensured that the women were refunded their money and that the met was brought to justice.

Several of the 400 workers who participated in the Labour Day march now feel confident to approach the BDO with matters related to their entitlements. As a result of this, several members of the panchayat administration have also opened up new communication channels. They insist that workers approach them first with their problems rather than the BDO and in several instances cases have been resolved swiftly at the panchayat level. Banks in Aspur have also become more sensitive. Earlier, they would make workers run around in circles each time they went to collect their NREGS payments. However workers report that since the Labour day incident, they quickly process all payments and treat them with greater respect.

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